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Monday, May 25, 2020

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राजनीति के खेल में

दक्षिण भारत के मशहूर फिल्मी कलाकार रजनीकांत और पश्चिम बंगाल की इशरत जहां भी उतरी राजनीति के मैदान में
फिल्म अभिनेता रजनीकांत के राजनीति में आने की घोषणा में कुछ भी नया नहीं है क्योंकि दक्षिण भारत में फिल्मी सितारों के राजनीति में आने व सफल होने की एक लम्बी परम्परा रही है और रजनीकांत भी उसी परम्परा का अनुपालन कर रहे हैं। हालांकि यह कयास बहुत पहले से लगाये जा रहे थे कि रजनीकांत राजनीति में अपना भविष्य तलाशेंगे और एनटी रामाराव, रामचंद्रन, करूणानिधि व जयललिता आदि नेताओं की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए तमिलनाडु को एक नया नेता मिलेगा लेकिन वर्ष 1996 में जयललिता सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर बड़ा अभियान चलाने के बावजूद रजनीकांत चुनाव मैदान में नहीं उतरे और अब इस घटनाक्रम के लगभग ग्यारह-बारह वर्ष बाद उन्होंने एक बार फिर राजनीति की ओर रूख करने की सोची है। अगर वर्तमान हालातों पर गौर करें तो हम पाते हैं कि वर्तमान में करूणानिधि काफी बुजुर्ग होने के कारण राजनीति के मैदान से दूर हैं जबकि जयललिता के मृत्यु के बाद खाली हुए राजनैतिक स्थान को भरने के लिए उनकी जेल में बंद सहेली हर तरह से प्रयास कर रही है लेकिन द्रमुक या अन्नद्रमुक में से कोई भी राजनैतिक ताकत उनके साथ नहीं है। लिहाजा हम यह कह सकते हैं कि इस वक्त तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़ा शून्य नजर आ रहा है और रजनीकांत ने बड़ी ही चालाकी के साथ इस शून्य को भरने का इशारा किया है लेकिन अगर राजनीति के मोर्चे पर चल रही चर्चाओं पर गौर करें तो ऐसा प्रतीत होता है कि रजनीकांत के राजनीति में उतरने की इस घोषणा से सबसे ज्यादा खुश भाजपा है और रजनीकांत के वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों को लड़ने के ऐलान तथा वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर बाद में घोषणा करने के कई राजनैतिक निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। हो सकता है कि रजनीकांत चुनावों के लिए मैदान में उतरने से पहले प्रदेश के राजनैतिक हालातों की थाह लेना चाहते हों और इसके लिए उन्होंने तीन वर्ष का वक्त तय किया हो लेकिन स्थानीय राजनीति की थाह रखने वाले राजनैतिक पंडितों का मानना है कि कोई भी बड़ा कदम उठाने से पहले रजनीकांत हालातों व भाजपा के साथ सहयोग की संभावनाओं पर पूरी तरह विचार कर लेना चाहते हैं क्योंकि मैदान में उतरने के बाद उनका सीधा मुकाबला दशकों से जारी द्रविण राजनीति एवं द्रमुक या अन्नाद्रमुक से होने वाला है और इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि उनसे पहले ही राजनीति में उतरने की घोषणा कर चुके एक अन्य फिल्म स्टार कमल हासन भी उनके लिए राजनैतिक खतरा पैदा कर सकते हैं। खैर नतीजा जो भी हो लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि 67 वर्ष की उम्र में राजनीति के मैदान में उतरकर एक नयी पारी खेलने को तैयार रजनीकांत एमजीआरआर व जयललिता की तरह राजनीति में सफल रहते हैं या फिर शिवाजी गणेशन की तरह असफल। इससे भी कहीं ज्यादा दिलचस्प होगा कि राष्ट्रीय राजनीति के परिपेक्ष्य में भाजपा की उन्नीस राज्यों पर कब्जेदारी के बाद अब दक्षिण भारत के राज्यों में भी भाजपा की आमद की खबर रजनीकांत के बहाने साफ सुनाई देगी। हालांकि भाजपा हाईकमान अथवा अन्य किसी शीर्ष नेता ने अभी तक इस बारे में कोई खुलासा नहीं किया है और न ही फिल्म स्टार से राजनेता बनने को बेताब रजनीकंात ने ऐसे कोई संकेत दिए हैं लेकिन यह कयास लगाए जा रहे हैं कि टूजी मामले में ए राजा व कानीमोझी के दोषमुक्त होने और रजनीकांत व कमलहासन जैसे नामचीन व्यक्तित्वों के राजनीति में आने के बाद दक्षिण भारत की राजनीति के समीकरण तेजी से बदलेंगे जिसका केन्द्र की सत्ता पर काबिज भाजपा को सीधा फायदा होगा। इसके ठीक दूसरी तरफ अगर पश्चिम बंगाल की बात करें तो हम पाते हैं कि यहां के स्थानीय निकाय चुनाव में वाममोर्चा व कांग्रेस को पीछे धकियाकर तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख प्रतिद्वन्दी के रूप में सामने आयी भाजपा ने इशरत जहां को अपने पक्ष में खड़ा कर एक बड़ा दांव खेला है। हालांकि इशरत कोई बड़ी फिल्मी या राजनैतिक हस्ती नहीं है और न ही उन्हें चुनावों को लेकर कोई विशेष अनुभव ही है लेकिन इन दिनों तीन तलाक के मामले में सामने आए राजनैतिक दलों के रूख को देखते हुए यह उम्मीद जरूर की जा सकती है कि इस मुद्दे को लेकर कानून बने या न बने किंतु इशरत का बड़ा नेता बनना तय है। पश्चिम बंगाल की कुल आबादी में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या प्रभावी है और इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि यहां के चुनावी समीकरण भाजपा के लिए बहुत उलझे हुए हैं क्योंकि जहां एक ओर मुस्लिम मतदाता भाजपा के विरोध में एकजुट हैं वहीं दूसरी ओर हिन्दू मतदाता वामपंथ, कांग्रेस व तृणमूल के बीच बंटा हुआ है लेकिन इधर मोदी के सत्ता में आने के बाद भाजपा ने पश्चिम बंगाल में तेजी से बढ़त बनायी है और अब इशरत जहां को भाजपा में शामिल कर संगठनात्मक स्तर पर यह संदेश देने की कोशिश भाजपा द्वारा की जा रही है कि वह मुस्लिम विरोधी नहीं है। यह तो वक्त ही बतायेगा कि तमिलनाडु समेत पूरे दक्षिण भारत व पश्चिम बंगाल में अंदरखाने की जा रही इस जद्दोजहद का भाजपा को क्या फायदा अथवा नुकसान होता है लेकिन हालात यह इशारा कर रहे हैं कि सत्ता के शीर्ष पर काबिज होने के बावजूद भाजपा के कुछ नेता व कार्यकर्ता पूरी मेहनत के साथ इस मिशन को पूरा करने में जुटे हैं और सम्पूर्ण भारत वर्ष में भगवा पताका को लहराना ही उनका एकमात्र लक्ष्य है। यह माना जा सकता है कि सत्ता के शीर्ष पर कब्जेदारी के इन चार वर्षों में भाजपा की नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार लीक से हटकर फैसले लेने या फिर कुछ नया कर दिखाने में असफल रही है और चुनावी घोषणाओं के अनुरूप बेरोजगारी, भ्रष्टाचार या महंगाई जैसे मोर्चों पर भी आपेक्षित सफलता नहीं दिखाई दी है लेकिन इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि देश की जनता के एक बड़े हिस्से को भाजपा के कार्यकर्ताओं व नेताओं पर पूरा भरोसा है या फिर यह भी हो सकता है कि दशकों पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा तत्कालीन भावी पीढ़ी की शिक्षण व्यवस्था को प्रभावित करते हुए शिशु मंदिरों की स्थापना एवं शाखाओं को लगाए जाने से संबंधित जो भी फैसले लिए गए थे उनके आपेक्षित परिणाम सामने आने लगे हैं और नई पीढ़ी के मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा यह मानने लगा है कि भारत की राजनैतिक व्यवस्था में अभूतपूर्व परिर्वतन लाने के लिए भाजपा को लोकसभा के साथ ही साथ राज्यसभा में भी बहुमत दिया जाना जरूरी है। खैर वजह चाहे जो भी हो लेकिन इतना स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि राजनीति के इस खेल में भाजपा का शीर्ष नेतृत्व एक माहिर खिलाड़ी की तरह मोहरों का इस्तेमाल कर रहा है और हर अलग दांव में उसकी चाल व खेलने का अंदाज बदला हुआ नजर आता है जबकि इसके ठीक विपरीत भाजपा के मुकाबले में खड़ा दिख रहा एकमात्र राष्ट्रीय राजनैतिक दल कांग्रेस अपने युवा अध्यक्ष के नेतृत्व में असहाय सा प्रतीत हो रहा है और उसके जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच संगठन के प्रति समर्पण एवं निष्ठा का आभाव स्पष्ट दिखाई देता है। हालांकि गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने भी स्थानीय स्तर के कुछ युवा चेहरों को जुटाकर चुनाव परिणाम बदलने की भरसक कोशिश की थी और गुजरात चुनाव के नतीजे आने से ठीक पहले हुई राहुल की ताजपोशी के बाद उत्साहित कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा विभिन्न स्तरों पर आंदोलन चलाने के प्रयास भी किए जा रहे हैं लेकिन इन तमाम प्रयासों में समग्रता का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है या फिर यह भी हो सकता है कि एक साथ कई राज्यों की सत्ता से बेदखल हुए कांगे्रसी एकजुट होने व सत्ता संघर्ष के लिए तैयार होने से पहले कुछ अन्य मोर्चों पर निपटना चाहते हों। उपरोक्त तथ्यों के आधार पर हम यह स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि रजनीकांत का राजनीति में पदार्पण हो या फिर ए राजा और कानीमोझी का टू जी घोटाले से दोषमुक्त होना, भाजपा हर मौके का फायदा उठाना अच्छी तरह जानती है और इशरत जहां द्वारा तीन तलाक के मुद्दे पर शुरू की गयी लंबी लड़ाई को भी उसने कुछ इस तरह का रंग दे दिया है कि इसका पूरा श्रेय अब भाजपा को ही मिल रहा है।

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