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Friday, April 19, 2024

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले लोकसभा चुनाव को लेकर अति आत्मविश्वास में है या घबराहट में हैं?


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले लोकसभा चुनाव को लेकर अति आत्मविश्वास में हैं या घबराहट में हैं? यह एक ऐसा सवाल है, जिसके जवाब को लेकर इस समय देश भर में बहस हो रही है। सोशल मीडिया ने ऐसी बहसों के लिए अच्छा प्लेटफॉर्म मुहैया कराया है। पारंपरिक मीडिया में चलने वाली एकतरफा चर्चाओं के बीच सोशल मीडिया में दोनों तरह के नैरेटिव के लिए जगह बनी है। एक तरफ ऐसा मानने वाले लोग हैं कि प्रधानमंत्री अति आत्मविश्वास में हैं इसलिए उन्होंने चार सौ पार का नारा दिया है। उन्होंने लोकसभा में खड़े होकर कहा कि देश की जनता भाजपा को 370 सीटें तो दे ही देगी और एनडीए को चार सौ के पार पहुंखाया है, जिससे विपक्ष का आत्मविश्वास निश्चित रूप से हिला होगा।
इस भरोसे और चार सौ के पार के नैरेटिव के बीच एक दूसरा पक्ष है, जो भाजपा की ओर से किए जा रहे माइक्रो मैनेजमेंट को उसकी घबराहट के तौर पर देख रहा है। अनेक लोग ऐसे हैं, जो नीतीश कुमार को एनडीए में शामिल कराने के राजनीतिक घटनाक्रम को भाजपा चा देगी। अपने इस भाषण से पहले ही उन्होंने अपने तीसरे कार्यकाल की बात शुरू कर दी थी और उसका एजेंडा तय करने लगे थे। यह विपक्ष के खिलाफ मनोवैज्ञानिक युद्ध की एक रणनीति भी हो सकती है लेकिन उन्होंने ऐसा भरोसा दिकी घबराहट या बेचैनी के रूप में देख रहे हैं। उनको लग रहा है कि कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत भारत रत्न  देकर भाजपा अंतिम समय में अति पिछड़ा वोट आधार को साधने की राजनीति कर रही है। ऐसे लोग चौधरी चरण सिंह को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित करने और उनके पोते जयंत चौधरी की एनडीए में वापसी को भाजपा का डेस्परेट अटेम्प मान रहे हैं। तमिलनाडु के रहने वाले महान कृषि वैज्ञानिक व अर्थशास्त्री एमएस स्वामीनाथन और आंध्र प्रदेश के रहने वाले पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव को मरणोपरांत भारत रत्न देने को दक्षिण भारत में पैर जमाने की कोशिश के तौर पर देख जा रहा है। एक सामान्य नैरेटिव यह बना है कि मोदी ने कर्पूरी ठाकुर के जरिए मंडल को, लालकृष्ण आडवाणी के जरिए मंदिर को, पीवी नरसिंह राव के जरिए मार्केट को और स्वामीनाथन व चौधरी चरण सिंह के जरिए मंडी को यानी किसानों को साधने का प्रयास किया है।

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यह सवाल भी पूछा जा रहा है कि जब अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का उद्घाटन हो गया और रामलला विराज गए और काशी व मथुरा का अभियान शुरू हो गया तो भाजपा को क्यों जयंत चौधरी की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल की जरुरत है? यह सवाल भी है कि अगर बिहार में अति पिछड़ों के मसीहा रहे कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दे दिया और गैर यादव पिछड़ा वोट भाजपा के साथ है तो फिर उसे नीतीश की जरुरत क्यों है? जब अजित पवार से तालमेल कर लिया तो मराठा वोट के लिए अशोक चव्हाण की क्यों जरुरत है? देश भर में विपक्षी पार्टियों के नेताओं पर कार्रवाई या उनको तोड़ कर भाजपा में शामिल कराने या कर्नाटक से लेकर बिहार और उत्तर प्रदेश से लेकर आंध्र प्रदेश, पंजाब और महाराष्ट्र तक के नए व पुराने सहयोगियों को एनडीए से जोडऩे की कवायद को भी इस रोशनी में देखा जा रहा है कि भाजपा में घबराहट है और वह अंतिम समय में इस तरह के उपाय कर रही है, जो कारगर नहीं भी हो सकते हैं। विकसित भारत संकल्प यात्रा, अमृत काल में भारत को विकसित बनाने, भारत के विश्व गुरू बनने, मोदी के मजबूत नेतृत्व, विपक्ष के भ्रष्ट होने के प्रचार, राममंदिर के उद्घाटन, अनुच्छेद 370 की समाप्ति और समान नागरिक संहिता के बावजूद भाजपा जिस तरह के छोटे छोटे प्रबंधन कर रही है उसको उसकी घबराहट के तौर पर देखा जा रहा है।
लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? क्या इस तरह के माइक्रो मैनेजमेंट को घबराहट माना जाना चाहिए या इसे पार्टी की रणनीति मान कर इसका विश्लेषण होना चाहिए? सोचें, प्रधानमंत्री मोदी ने एनडीए के लिए चार सौ सीट का लक्ष्य घोषित कर दिया है तो क्या वह उसी तरह चुनाव लड़ कर हासिल हो जाएगा, जैसे पिछला चुनाव लड़ा गया था? नए लक्ष्य को हासिल करने के लिए नई तैयारियां करनी होती है, नई रणनीति बनानी होती है और यह काम सारी पार्टियां करती हैं। आखिर लगातार दो चुनावों में बुरी तरह से हारने के बाद ही तो राहुल गांधी को ख्याल आया कि पूरे देश की यात्रा करते हैं! सक्रिय राजनीति में आने के 18 साल के बाद राहुल सितंबर 2022 में पदयात्रा पर निकले थे। लगातार दो चुनाव हारने के बाद ही विपक्षी पार्टियों ने साथ मिल कर भाजपा से मुकाबला करने का फैसला किया था। पिछले साल मई-जून में विपक्षी पार्टियों ने भाजपा की नींद उड़ाई थी, जब कर्नाटक में कांग्रेस जीती और उसके बाद 26 पार्टियों ने एकजुट होकर फैसला किया कि भाजपा के हर उम्मीदवार के खिलाफ विपक्ष का एक उम्मीदवार उतारेंगे। उसके बाद ही भाजपा को अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव करने की जरुरत पड़ी है।
सो, यह सवाल बचकाना है कि जब राममंदिर हो गया या जब ये सारे काम हो गए तो इतने माइक्रो मैनजमेंट की क्या जरुरत है। इस तरह के सवाल हर बार पूछे जाते हैं, तब भी जब राज्यों के भी चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी अंधाधुंध सभाएं कर रहे होते हैं या एक एक राज्य में कई कई बार रैलियां करते हैं। लेकिन किसी भी मुकाबले का कोर सिद्धांत यह है कि जब लड़ें तो पूरी तैयारी और ताकत के साथ लड़ें। आधी अधूरी लड़ाई का कोई मतलब नहीं होता है। अगर किसी के पास संसाधन हैं या ताकत हैं तो उन्हें लड़ाई में झोंकना होता है। उसे बचा कर रखने का कोई तर्क नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी इस सिद्धांत से चुनाव में उतरते हैं। वे कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। जंग जीतने के लिए साम, दाम, दंड और भेद सबका इस्तेमाल करते हैं।
इसलिए नरेंद्र मोदी की चुनावी राजनीति को निकट अतीत के इतिहास से समझने की जरुरत है। वे कोई भी चीज संयोग के भरोसे नहीं छोड़ते हैं। अपनी तरफ से सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं। हो सकता है इसमें कई बार विफलता भी मिली हो लेकिन इससे हर लड़ाई में अपना सब कुछ झोंकने की उनकी सोच नहीं बदलती है। बिहार भाजपा के नेताओं ने उनको बताया था कि नीतीश के बगैर भी 25-30 सीटें जीत सकते हैं। लेकिन उन्होंने कहा कि पिछली बार की तरह 39 या सभी 40 सीटें जीतनी हैं। इसलिए तमाम आलोचनाओं के बावजूद नीतीश कुमार की एनडीए में वापसी कराई गई। उत्तर प्रदेश में भी कहा गया कि राममंदिर की लहर और योगी के बुलडोजर न्याय से भाजपा अपनी 62 सीटें आराम से जीत जाएगी लेकिन उन्होंने सभी सीटें जीतने का लक्ष्य रखा। इसलिए चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न दिया गया और जयंत चौधरी को एनडीए में शामिल कराया गया ताकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ साथ हरियाणा और राजस्थान की जाट बहुल सीटों पर भाजपा का मुकाबला आसान हो।
कर्नाटक में भाजपा ने पिछली बार 25 सीटें जीती थी। इस बार कांग्रेस की बड़े बहुमत की सरकार बनने के बाद भाजपा को नुकसान की आशंका हुई तो एचडी देवगौड़ा की पार्टी जेडीएस से तालमेल कर लिया। इसी तरह ओडिशा में भाजपा को आठ सीटें मिली थीं लेकिन इस बार सीटें बढ़ाने या बाकी सीटों को एनडीए में लाने के लिए बीजू जनता दल के नवीन पटनायक से बात चल रही है। पंजाब में भाजपा की दो सीटें हैं और दो अकाली दल की। ये चार सीटें फिर से एनडीए में आएं इसके लिए अकाली दल से तालमेल की वार्ता चल रही है। महाराष्ट्र में भाजपा को 23 और एनडीए को 41 सीटें मिली थीं। इस बार भी एनडीए यह प्रदर्शन दोहराए इसके लिए हर तरीके का इस्तेमाल करके शिव सेना और एनसीपी को तोड़ा गया। इतने से काम बनता नहीं दिखा तो कांग्रेस के अशोक चव्हाण लाए गए और आगे कुछ उपाय हो सकते हैं।
ध्यान रहे, जहां चुनाव जीतने की बात आती है वहां विचारधारा और नैतिकता का कोई मतलब नहीं होता है। विपक्षी पार्टियां भी विचारधारा और नैतिकता को ताक पर रख कर ही चुनावी रणनीति बना रही हैं नहीं तो कोई कारण नहीं था कि कांग्रेस का शिव सेना के साथ तालमेल होता या आम आदमी पार्टी के साथ कांग्रेस गठबंधन बनाने की पहल करती। ऐसा नहीं है कि आज भाजपा का कोई नेता कांग्रेस में शामिल होना चाहे तो कांग्रेस उसे मना कर देगी। इसलिए विपक्ष को इस मुगालते में रहने की जरुरत नहीं है कि मोदी डर गए हैं और घबराहट में इस तरह के काम कर रहे हैं। विपक्ष को उनकी रणनीति समझने और मुकाबले के लिए अपनी तैयारी करने की जरुरत है।
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