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Tuesday, December 07, 2021

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गुरू तेग बहादुर शहीदी, दिवसभारत की विविधता ही उसकी शक्ति-स्वामी चिदानन्द

ऋषिकेश। सिख सम्प्रदाय के नौवें  गुरू तेग बहादुर जी के शहादत दिवस के अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले तथा भारत और भारतीय संस्कृति के लिये अपना सिर कलम कराने वाले सिख सम्प्रदाय के नौवें गुरू तेग बहादुर जी की शहीदी दिवस पर उनकी राष्ट्रभक्ति को नमन। स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी राष्ट्रभक्त और भारतीय संस्कृति से प्रेम करने वाले थे। वे त्याग और बलिदान के प्रतीक थे, उन्होंने भारतीय संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया था। भारतीय संस्कृति के आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी। गुरू तेगबहादुर जी ने धर्मांन्तरण के विरूद्ध आवाज उठायी थी। वास्तव में धर्मांन्तरण आज भी विकट समस्या है। भारत एक बहुधार्मिक एवं पंथनिरपेक्षता  राष्ट्र है तथा धर्म तो आत्मा से स्वीकार किया जाता है। जबरन धर्मान्तरण से राष्ट्र की एकता और अखंडता को भी खतरा है इसलिये ऐसी संविधान विरूद्ध गतिविधियां न करें और न किसी को भी इसके लिये प्रेरित करें। स्वामी जी ने कहा कि भारत को अखंड और अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये हमारे पूर्वजों ने अपना सर्वस्व बलिदान कर विविधता में एकता को बनाये रखा। भारत की विविधता ही उसकी शक्ति है, जिसे बनाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी है। सम्पूर्ण विश्व के लिये ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की दिव्य कामना करने वाली भारतीय संस्कृति अद्भुत शक्ति और पूर्ण विश्वास के साथ वसुधैव कुटुम्बकम् के सूत्र को आत्मसात कर शान्ति के साथ जीवन में आगे बढ़ने का संदेश देती है। भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है जिसमें इन्द्रधनुषीय विविधता, विशालता और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत समाहित है और यह सम्पूर्ण मानवता के लिये है।
स्वामी जी ने कहा कि मानव जीवन के अस्तित्व के साथ ही भारतीय संस्कृति ने सम्पूर्ण मानवता को जीवन के अनेक श्रेष्ठ सूत्र दिये और आज भी निरंतर उन सूत्रों और मूल्यों की ओर अग्रसर है, जिनकों आत्मसात कर न केवल जीवन व्यवस्थित होता है बल्कि ‘आत्मिक और आध्यात्मिक उन्नति भी होती है। भारतीय संस्कृति मानव को अपने मूल से; मूल्यों से, प्राचीन गौरवशाली सूत्रों, सिद्धान्तों एवं परंपराओं से जोड़ने के साथ ही अपने आप में निरंतर नवीनता का समावेश भी करती है। भारतीय संस्कृति सनातन संस्कृति से लेकर इंद्रधनुषीय संस्कृतियों का महासंगम है। जिस प्रकार अलग-अलग नदियां जिनके नाम अलग होते हंै, उनके जल का स्वाद भिन्न होता है परन्तु जब वह समुद्र में जाकर मिलती है तो  उन सब  का एक नाम हो जाता है और उस जल का स्वाद भी एक ही होता है, केवल खारा स्वाद हो जाता है, इसी तरह से भारतीय संस्कृति में भी विभिन्न संस्कृतियों का संगम होकर एकता की संस्कृति का जन्म होता है। गुरू तेग बहादऱ जी सिख सम्प्रदाय के नवें गुरु थे, जिन्होंने सिख सम्प्रदाय के प्रथम गुरु नानक जी की शिक्षाओं का अनुसरण करते हुये अपने जीवन का बलिदान किया। बलिदान न केवल धर्म रक्षण के लिए बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिये किया था। धर्म उनके लिए सांस्कृतिक मूल्यों और जीवन विधान का नाम था। आईये मानवता के लिये जीवन जीने का संकल्प लें यही गुरू तेग बहादुर जी को सच्ची श्रद्धाजंलि होगी।

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