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Sunday, May 31, 2020

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सियासत के खेल में।

राजनैतिक उतार-चढ़ाव के बीच चुनावी प्रतिस्पद्र्धा की दौड़ में आगे बढ़ने के लिऐ भाजपा भी चली तुष्टीकरण की राह पर।

हिन्दुत्व के नाम पर केन्द्र एवं कई राज्यों की सत्ता पर काबिज हुई भाजपा ने अपने मतदाताओं को एकजुट करने के उद्देश्य से इस चुनावी वर्ष में दलित तुष्टीकरण का बड़ा दाॅव आज़माने का फैसला लिया है और सत्ता के उच्च सदनो से पारित होने के बाद अब राष्ट्रपति की भी मोहर लगने से यह तय हो गया है कि सरकार माननीय उच्चतम् न्यायालय के आदेशों की अवहेलना करते हुऐ दलित उत्पीड़न से जुड़े मामलो में आरोपी की सीधी गिरफ्तारी के पक्ष में है। खबर तो यह भी है कि सरकार इसी तरह का एक अध्यादेश पदोन्नति में आरक्षण व्यवस्था को लागू किये जाने के सदंर्भ में भी लाने वाली है और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के इस दावे को देखकर ऐसा लगता है कि विपक्ष की एकता व अपनी सरकार के पाॅच वर्षो के कार्यकाल में विकास सम्बन्धी दाॅवो को झुठलाये जाने से घबरायी केन्द्र सरकार अब पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के नक्शेकदम पर चलते हुऐ अपनी कमजोरियों को छिपाने व वोट बैंक की ताकत के दम पर अपनी स्थितियों को मजबूत करने के मूड में है। हाॅलाकि यह कहना अभी मुश्किल है कि केन्द्र सरकार के माध्यम से भाजपा द्वारा उठाये गये उक्त कदम चुनावी राजनीति में इस राजनैतिक विचारधारा को एक मजबूती प्रदान करेंगे और भाजपा के गठन से वर्तमान तक इस विचारधारा के साथ खड़ा नज़र आने वाला सवर्ण समाज का एक बड़ा हिस्सा अपने नफे-नुकसान पर विचार किये बगैर ही भाजपा के साथ जुड़ा रहेगा लेकिन कर्नाटक व अन्य राज्यों के चुनाव नतीजों तथा पिछले तमाम चुनावों में दलितों की राजनीति करने वाले क्षेत्रीय राजनैतिक दलो के वोट-बैंक की स्थिति पर एक नज़र डालने व देश भर के स्थापित दलित नेताओ के बयानो पर गौर करने के बाद यह कहना आसान है कि इतना सबकुछ करने के बावजूद इस बार भाजपा के लिए दलित वोट-बैंक पर संेधमारी कर पाना आसान नही है और न ही भाजपा की केन्द्र सरकार हाल-फिलहाल इस स्थिति में है कि देश की जनता का दूसरा बड़ा हिस्सा माना जानेे वाला पिछड़ा समुदाय व अल्पसंख्यक चुनावी मोर्चे पर उसके समर्थन में खुलकर खड़े दिखाई दे। इसलिऐं यह हो सकता है कि केन्द्र की भाजपा सरकार आगामी लोकसभा चुनावों से पहले अपने परम्पंरागत् मतदाताओं को रिझाने के लिऐ कुछ नयी घोषणाऐ करे अथवा भाजपा के तमाम अनुषांगिक संगठन व समर्थको की टोली पूरे देश के भीतर ऐसा माहौल बनाने की बड़ी कोशिश करें जिससे चुनावी मौको पर मतदाताओं का ध्रुवीकरण जातिगत् आधार पर न होकर धार्मिक आधार पर हो और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिऐ कतिपय संगठनो द्वारा स्थानीय स्तर पर माहौेंल बनाने का काम शुरू भी कर दिया गया है जिसका भाजपा का शीर्ष नेतृत्व मूक समर्थन करता महसूस होता है लेकिन सवाल यह है कि समाज के आरक्षित वर्ग को लेकर लिये गये कतिपय फैसलो से नाराज़ सवर्ण समुदाय अथवा हाल ही में किये गये कानूनी बदलाव की जद में आने वाली आबादी सरकार से अपना विरोध जताने के लिऐ किस ओर रूख करेगी क्योंकि सक्रिय राजनीति के क्षेत्र में ऐसी कोई राजनैतिक ताकत अथवा समूह नही है जो खुलकर सरकारी नौकरियों में जाति के आधार पर आरक्षण दिये जाने अथवा पदोन्नति पर आरक्षण व आरोपी की तत्काल प्रभाव से गिरफ्तारी वाले मामलो में सरकार द्वारा रखे गये पक्ष का खुला विरोध करने का साहस रखता हो। यही वजह है कि जो, मौजूदा सरकार को वीपी सिंह वाले दौर से बिल्कुल प्रथक करती है और इन कयासो पर विराम लगाती है कि आरक्षण व्यवस्था का विरोध अथवा आरक्षित वर्ग को दी जाने वाली कुछ विशेष सुविधाओ की घोषणा वर्तमान सरकार के लिऐ खतरे की एक घन्टी हो सकता है। मौजूदा सरकार व भाजपा के रणनीतिकार यह अच्छी तरह जानते है कि इन पिछले पाॅच वर्षो में सामाजिक वैमनस्यता व परस्पर प्रतिद्वन्दी दिखाई देने वाले धार्मिक समूहो के आपसी संघर्ष को इतना ज्यादा बढ चुके है कि सामान्य मतदाता अपनी सुरक्षा से जुड़े सवालातों से बाहर ही नही निकल पा रहा तथा भय के इस माहौल में संघर्ष की एक छोटी सी चिंगारी के माध्यम से छिटक रहे अपने परम्परागत् वोट-बैंेक को साध पाना भाजपा को कठिन नही लगता लेकिन यह भी सच है कि भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व आरक्षण की व्यवस्था का विरोध करने वाली जातियों की अपंेक्षा उन जातीय समूहो से ज्यादा घबराया हुआ है जो अपने संगठित वोट-बैंक का भय दिखाकर खुद को आरक्षण के दायरे में रखे जाने की मांग के साथ हिंसक आन्दोलन अथवा शक्ति प्रदर्शन से किसी तरह का गुरेज नही कर रहे और जिन्हे यह लगता है कि चुनावी मौके पर सरकार को झुकाने अथवा राज्य व राष्ट्र के उच्च सदनो तक अपनी आवाज पहुॅचाने के लिऐ यह एक बेहतर अवसर है। अगर नौकरियों में आरक्षण के मददे्नज़र बात करे तो हम पाते है कि जनसामान्य का एक बड़ा हिस्सा यह समझ रहा है कि सरकारी तन्त्र द्वारा अंगीकृत किये गये उदारवादी ढ़ाॅचे के लागू किये जाने के तत्काल बाद से ही सरकार अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कोंशिशो को कम करते हुऐ सरकारी नौकरियों के अवसरों को लगातार कम कर रही है तथा पूॅजीवाद पर निर्भर बाजारवादी अर्थव्यवस्था के इस दौर में योग्य व प्रतिभाशाली व्यक्तित्वों के आगे बढ़ने की राह अभी इतनी कठिन भी नही है कि रोजगार जैसे महत्वपूर्ण विषयों को सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी समझ इस मुद्दे पर खुलकर अपनी नाराजी जाहिर की जाये लेकिन यह भी सच है कि केन्द्र सरकार द्वारा अपने मौजूदा कार्यकाल में लिये गये नोटबंदी व जल्दबाजी वाले अन्दाज़ में जीएसटी लागू करने के फैसले से देश का मध्यम वर्ग डरा हुआ है और मध्यम वर्ग के रूप में मौजूद देश की आबादी के इस बढ़े हिस्से में सवर्ण समुदाय की भागीदारी सर्वाधिक है। मध्यम वर्ग का यह बड़ा हिस्सा अर्थात सवर्ण समुदाय मानकर चल रहा है कि सरकारी नौकरियों के अवसर गॅवाने के बाद सरकारी तन्त्र उसके व्यापार व जमापूॅजी पर भी अपनी निगाह गड़ा रहा है तथा दलित समाज की शिकायत पर किसी भी तरह की जाॅच करने के पूर्व आरोपी की गिरफ्तारी किये जाने के आदेश का पुर्नजीवित कर सरकार ने उसकी मुश्किलें बढ़ा दी है लेकिन हाल-फिलहाल किसी अन्य राजनैतिक दल के पास भी इन समस्यायों का कोई समाधान नही है और शायद यही वजह है जो सवर्ण मतदाताओं को अभी हाल-फिलहाल चुप्पी के साथ स्थितियों पर नज़र बनाए रखने के लिऐ मजबूर कर रही है। हमें यह याद रखना होगा कि वीपी सिंह सरकार के कार्यकाल में देश भर में हुऐ आरक्षण विरोधी आन्दोलन की मुख्य वजह सवर्ण वर्ग के बीच रोज़गार जैसे विषयों को लेंकर फैली अनिश्चितता नही थी बल्कि देश भर के छात्रो व नौजवानो के समूह एकजुटता के साथ सरकार के विरोध में इसलिऐं सड़को पर उतरे थे क्योंकि उन्हे लगा था कि सरकार मण्डल आयोग की सिफारिश लागू करने के नाम पर उनसे शिक्षा का अधिकार छीन लेना चाहती है लेकिन कालान्तर में यह विरोध क्षीण पड़ गया क्योंकि बाज़ारवाद की रौ में बह रही सरकारी व्यवस्था ने निजीकरण के नाम पर शिक्षा की इतनी दुकाॅने खोल दी कि जनसामान्य विशेषकर मध्यमवर्ग का बड़ा हिस्सा माने जाने वाले सवर्ण समुदाय को उच्च शिक्षा अथवा किसी भी तरह की शैक्षणिक योग्यता की डिग्री लेने में विशेष परेशानी का सामना नही करना पड़ा। यह ठीक है कि इन तथाकथित निजी व तकनीकी संस्थानो की गुणवत्ता व शैक्षणिक क्षमताओं पर भरोसा किये जाने जाने योग्य नही है और पढ़े-लिखे बेरोज़गारो की फ़ौज बढ़ाने में अपना विशेष येगदान दे रहे यह तमाम शैक्षणिक संस्थान आज भी संदेह के दायरे में है लेकिन इस तथ्य को नकारा नही जा सकता कि शिक्षा के क्षेत्र में सीमित होते अवसरों को लेकर उत्पन्न हुई संशय की स्थिति से निकालने के लिए इन निजी संस्थानो ने एक अहम् योगदान दिया और अगर सरकारी तन्त्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को देश के भविष्य से जुड़े इस विषय से दूर रखा गया होता तो शायद वर्तमान में बेरोज़गारी के मोर्चे पर भी हम इतनी बुरी तरह पराजित नही दिखते। यह कहने में कोई हर्ज नही है कि भ्रष्टाचार से जुड़े विषयों को जन्म देने के बावजूद शैक्षणिक संस्थानो पर आरक्षण लागू किये जाने जैसे विषयों पर युवाओ के लगातार बढ़ रहे आक्रोश को कम करने के लिए शिक्षा के निजीकरण के संदर्भ में लिया गया यह तात्कालिक आधार सही फैसला था और इसे लागू करने वाले अनुभवी नेताओ ने वक्त की जरूरत व अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के बीच तालमेल बनाते हुऐ जनसामान्य के बीच शान्ति व्यवस्था को कायम रखने के लिए यह महत्वपूर्ण कदम उठाया था लेकिन अफसोसजनक है कि दलितो द्वारा की जाने वाली शिकायत पर सवर्णाे की गिरफ्तारी से बचाने के लिऐ वर्तमान सरकार द्वारा इस तरह के कोई प्रभावी उपाय किये जाते नही दिख रहे और अगर यह हालात व नाराजी ऐसी ही बनी रही तो लोकसभा चुनावी संग्राम में नतीजे चाहे जो भी हो किन्तु यह स्पष्ट दिख रहा है कि सामाजिक विषमता व अविश्वास की खाई अब ज्यादा गहरी होगी जिसका सीधा प्रभाव राष्ट्र के विकास व घरेलू मोर्चे पर आवश्यक समझे जाने वाले सौहार्द पर पड़ना लाजमी है। लिहाज़ा सरकार चलाने वाली राजनैतिक विचारधारा व सरकार के पक्ष-विपक्ष में खड़े राजनैतिक दलो को चाहिऐ कि वह इस गम्भीर विषय को सिर्फ राजनैतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने का विषय बनाने के स्थान पर हालातो की गम्भीरता पर गौर करते हुऐ कोई बीच का रास्ता निकाले जिससे राजनीति भी चलती रहे और माहौल में उन्माद भी न पैदा हो।

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