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Monday, May 25, 2020

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जिम्मेदारी के अहसास पर

पीड़ित परिवार के लिए आर्थिक सहायता के रूप में एक बड़ी धनराशि जुटा इन्दिरा हृदयेश ने खड़े किए राजनीति के नये आदर्श
उत्तराखंड की राजसत्ता पर पूर्ण बहुमत के साथ काबिज हुई भाजपा अपने कार्यकाल का एक वर्ष पूरा करने के करीब है और इस एक वर्ष के दौरान सरकार ने कई तरह के राजनैतिक प्रतिरोध व जनान्दोलनों का सामना किया है लेकिन इसके बावजूद भाजपा के नेता व सरकार के जिम्मेदार मंत्री यह मानने को राजी नहीं हैं कि इस एक वर्ष के दौरान प्रदेश में भाजपा की लोकप्रियता में कोई कमी महसूस की गयी है और इसके लिए प्रमाण के रूप में भाजपा के कार्यकर्ताओं द्वारा प्रदेशभर से वसूली गयी ‘आजीवन सहयोग निधि’ के आंकड़ों को प्रस्तुत किया जाता है। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि उत्तराखंड जैसे संसाधनविहीन राज्य से पच्चीस करोड़ के निर्धारित लक्ष्य से कहीं अधिक वसूली कर भाजपा के नेताओं व कार्यकर्ताओं ने एक कीर्तिमान स्थापित करने का काम किया है और अगर भीतर से छन-छन कर आ रही खबरों को सही मानें तो भाजपा के रणनीतिकार इस धनराशि की मदद से राज्य के तमाम जिलों मे हाईटेक व सुविधायुक्त कार्यालयों की अवस्थापना की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं लेकिन यहां पर यह सवाल अहम् है कि क्या राज्य की जनता ने भाजपा को जिलास्तरीय हाईटेक कार्यालय बनाने के लिए सत्ता की कुंजी सौंपी थी और स्थानीय जनता के विकास व पहाड़ों पर जनसुविधाएं जुटाते हुए पलायन पर प्रभावी रोक लगाने की चाह रखने वाली राज्य की अधिकतम् आबादी सत्ता के शीर्ष पर काबिज नेताओं के इस फैसले से सहमत नजर आ सकती है। हमने देखा कि राज्य में किस प्रकार किसानों एवं सरकारी नियमावली से क्षुब्ध व्यवसायियों द्वारा आत्महत्या की खबरें आ रही हैं और सरकार सब कुछ जानते-बूझते हुए भी इन तमाम मुद्दों के साथ ही साथ राज्य में भुखमरी से होने वाली मौत या फिर अन्य तमाम जन समस्याओं पर मूक बनी हुई है। यह ठीक है कि विपक्ष अपनी राजनैतिक मजबूरियों व कमजोरियों के चलते इन तमाम विषयों को ज्वलंत मुद्दों के रूप में उठाकर सरकार का ध्यान इस ओर खींचने में असफल है या फिर यह भी हो सकता है कि आगामी विधानसभा चुनावों को काफी देर में होता जान विपक्ष के नेता व तमाम पदों के दावेदार इन तमाम विषयों पर आंदोलन खड़ा करने में व्यय होने वाले श्रम व आर्थिक सहयोग से बचना चाह रहे हों लेकिन राज्य कांग्रेस के कुछ नेताओं व जनप्रतिनिधियों विभिन्न घटनाक्रमों में पीड़ित परिवारों व उनके आश्रितों के लिए अपने स्तर पर कुछ धनराशि जुटाकर एक मिसाल कायम करने की कोशिश की है और इस क्रम में हल्द्वानी विधानसभा क्षेत्र की विधायक व नेता प्रतिपक्ष इन्दिरा हृदयेश की हालिया पहल के बाद तो एक इतिहास ही कायम हो गया लगता है। हमने देखा और महसूस किया कि राजनीति के इस दौर में भाजपा के नेताओं व कार्यकर्ताओं द्वारा अपने-अपने स्तर पर व निजी प्रयासों द्वारा संगठन का कोष एकत्र करने के लिए चन्देबाजी कर एक बड़ी धनराशि एकत्र की गयी और चंदे के इस धंधे का उनमुक्त प्रदर्शन करने के लिए सरकार व संगठन ने अपने बड़े नेताओं की उपस्थिति में एक भव्य आयोजन भी किया लेकिन इस तमाम आमोद-प्रमोद के बीच भाजपा के प्रादेशिक कार्यालय में चल रहे सरकार के जनता दरबार के दौरान आत्महत्या करने वाले प्रकाश पांडे के परिवार से सरकार द्वारा किए गए वादे को नेताओं ने पूरी तरह बिसार दिया या फिर यह भी कहा जा सकता है कि इस दिल दहला देने वाले घटनाक्रम के बाद पीड़ित परिवार व आक्रोशित जनता को तात्कालिक सांत्वना देने की नीयत से की गयी घोषणा से सरकार पूरी तरह मुकर गयी और अपनी रोजी रोटी को मोहताज दिवंगत प्रकाश पाण्डे के परिवार को सरकार की इस कार्यवाही के खिलाफ संघर्ष करने के लिए सड़कों पर आना पड़ा। यह महसूस किया जा सकता है कि अपने पति को खोने वाली बेवा महिला अथवा अपने जवान पुत्र को खोने वाली एक बेबस मां जब अपने परिजनों के साथ सरकार के विरोध में धरने पर बैठी तो स्थानीय जनता की सहानुभूति एवं संवेदनाएं पीड़ित परिवार के साथ जुड़ना स्वाभाविक थी और इस स्वाभाविक प्रक्रिया का राजनैतिक लाभ उठाने के लिए इस परिवार का इस्तेमाल कर सरकार के खिलाफ माहौल बनाना या फिर शहर की फिजा को खराब करना उस नेता के लिए ज्यादा कठिन भी नहीं था जो पिछले चार दशकों से न सिर्फ राजनीति के मैदान में हो बल्कि जिसकी युवाओं, अध्यापकों व छात्रों के बीच विशेष पैठ मानी जाती हो लेकिन इन्दिरा हृदयेश ने इन तमाम परम्पराओं व अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को नकारते हुए एक बुजुर्ग व अनुभवी राजनेता होने का प्रमाण दिया और इस तमाम घटनाक्रम का राजनैतिक फायदा उठाने या फिर जनभावनाओं को भड़काकर सरकार को घेरने का प्रयास करने के स्थान पर उन्होंने आपसी जन सहयोग से पीड़ित परिवार की मदद किए जाने के विकल्प को चुना। यह पहल वाकई काबिलेतारीफ है और इसके तहत जुटाये गए उन सात-आठ लाख रूपयों का महत्व भाजपा द्वारा जोर-जबरिया वसूली गयी पच्चीस करोड़ से भी अधिक की आजीवन सहयोग निधि से ज्यादा है क्योंकि इंदिरा के इस कदम में आपसी सहयोग को बढ़ावा देते हुए पीड़ित परिवार की मदद करने की भावना छुपी दिखती है और इससे भी कहीं ज्यादा यह महत्वपूर्ण है कि उन्होंने पीड़ित परिवार का इस्तेमाल सरकार पर हमला करने के लिए नहीं किया बल्कि खुद अपने दम पर सरकार को सदन में घेरने की चुनौती दी। हो सकता है कि कुछ भाजपाई समर्थक हमारे इन तथ्यों से सहमत न हों और उन्हें लगता हो कि अगर सरकार इस मामले में एक परिवार की सहायता करने के लिए आगे आती तो इस तरह के मामलों व सरकार को धमकाने वालों की संख्या में एक स्पष्ट बढ़ोत्तरी महसूस की जा सकती थी लेकिन सवाल यह है कि दिवंगत प्रकाश पाण्डे या उनसे पहले इस एक वर्ष के भीतर खुदकुशी को अंजाम देने वाले किसान व अन्य परिवारों की खुदकुशी के कारणों की सरकारी पक्ष की ओर से किसी भी तरह की समीक्षा का प्रयास किया गया और यदि नहीं तो सरकार इस फैसले तक कैसे पहुंची कि देशभर में चल रहे आत्महत्याओं के इस सिलसिले के पीछे भाजपा की नीतियों का हाथ नहीं है। वजह साफ है कि सरकार यह समझती है कि इन कठिन परिस्थितियों व तंत्र की नाकामी की वजह से आम आदमी आत्महत्या की हदों को छूने के करीब पहुंच गया है और अगर सरकारी स्तर पर पीड़ित परिवार को आर्थिक मदद देने या फिर राहत के रूप में नौकरी देने का कोई सिलसिला शुरू किया गया तो जनसामान्य में से बहुत से लोग जलालत भरी जिंदगी जीने की जगह मौत को गले लगाकर अपने परिजनों व आश्रितों के बेहतर जीवन के लिए विकल्प चुनने का रास्ता अपना सकते हैं। लिहाजा सरकार की मुश्किल बढ़ सकती है लेकिन सरकार ने इस मुश्किल का स्थायी समाधान ढूंढने की दिशा में किसी भी तरह का प्रयास करना उचित नहीं समझा और न ही प्रकाश पाण्डे के परिवार को सहानुभूति देकर ढांढस बंधाना भाजपा के नेताओं की प्राथमिकता में रहा। इस सबसे इतर भाजपा के नेताओं व सरकार का पूरा ध्यान आजीवन सहयोग निधि के रूप में चुनावी चंदा जुटाने में रहा और पार्टी हाईकमान के समक्ष अपने नम्बर बढ़ाने के लिए भाजपा के तमाम छोटे-बड़े नेताओं ने इस मुहिम में अपनी पूरी ताकत के साथ भागीदारी की लेकिन प्रदेश की जनता का दिल जीतने में नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश ही कामयाब रही और उन्होंने मौका मिलते ही यह साबित किया कि तमाम आरोपों व पिछली सरकारों के कार्यकाल पर उठाये गए सवालातों के बावजूद कांग्रेस एक बड़ी सोच वाला राजनैतिक दल है तथा वह इसकी एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में इस खाके में बिल्कुल फिट बैठती है क्योंकि व्यापक जनहित से जुड़े सवालों अथवा किसी परिवार के प्राणों की रक्षा के मामले में उनके राजनैतिक हित बहुत ज्यादा मायने नहीं रखते।

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