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Sunday, May 31, 2020

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जनसुरक्षा के नाम पर।

दो पहिया वाहनो में दोनो ही सवारियों के हैलमेट लगाने की व्यवस्था को लागू करने से पूर्व सरकार ने नही किया आम आदमी की समस्याओ पर गम्भीरता से विचार।

उत्तराखण्ड के विभिन्न शहरी व कस्बाई इलाको में जनसुरक्षा के लिए मुस्तैद पुलिस आज कल दोपहिया वाहनो पर सवारी करने वाले सवारो के चालान करने में जुटी हुई है और सबसे ज्यादा धड़पकड़ इन दोपहिया वाहनो में पीछे की सीट पर बैठने वाली सवारी के हैलमेट न पहनने के कारण हो रही है क्योंकि यह व्यवस्था ताज़ा-ताज़ा ही लागू की गयी है और अपनी रोजमर्रा की जरूरतो में कटौती कर एक नया हैलमेट खरीदने का जुगाड़ कर रहा मध्यम वर्ग जाने-अनजाने में सरकार द्वारा लगाये जा रहे इस अर्थदण्ड को भुगतने के लिऐ मजबूर है। हाॅलाकि सरकार के पास बहाना है कि वह न्यायालय के आदेशो पर इस कार्यवाही को अंजाम दे रही है और यातायात को सुरक्षित करने व दुर्घटनाओं कें दौरान होने वाली जन हानि को रोकने के लिए इस तरह के कदम उठाये जाने जरूरी है लेकिन सरकारी तन्त्र के पास इस सवाल का कोई जबाव नही है कि वह सड़क दुघर्टनाओं के दौरान होने वाली सम्भावित मानवीय क्षति को कम करने के उपाय करने से पहले सड़क दुघर्टनाओं में कमी लाने के प्रयास क्यों नही करती और वह कौन से कारण है जिनके चलते आपदा व बरसात के इस माहौल में पुलिस अपने तमाम काम छोड़कर हैलमेट को मुद्दा बना दो पहिया वाहन चालको का चालान करने में जुटी हुई है। क्या इस समस्त प्रक्रिया के पीछे किसी व्यवसायिक मानसिकता वाले व्यक्ति अथवा कम्पनी का दिमाग काम कर रहा है और न्यायालय के फैसलो की आड़ लेकर किसी व्यक्ति अथवा कम्पनी विशेष को फायदा पहुॅचाने की कोशिश की जा रही है या फिर सरकार इस तरह के दोयम दर्जे के टोटको का इस्तेमाल कर अपने राजस्व में बढ़ोŸारी करना चाहती है। खैर वजह चाहे जो भी हो लेकिन सच यह है कि बरसात के मौसम में आम आदमी की जान को आफत मची हुई है और एक तरफ टूटी-फूटी सड़को व नालियों के सड़को पर बहने के खतरें से जूझ रहा जनसामान्य पुलिसिया डर से अपने पड़ोसी की मदद करने से भी कतरा रहा है। कुल मिला कर देखा जाये तो दोपहिया वाहनो में दोनो ही सवारियों के हैलमेट पहने जाने के आदेश के बाद पुलिस जिस सजगता के साथ इसे लागू करने में लगी हुई है उससे तो ऐसा प्रतीत होता है कि मानो सड़क दुघर्टनाओं व इनके चलते होने वाली अकाल मृत्यु का सबसे बड़ा कारण हैलमेट का इस्तेमाल न किया जाना है और ओवरलोड चलती गाड़ियों या सड़क पर बहते पानी, गढ़्ढ़ो या फिर दुघर्टनाओं के अन्य करणों की सरकार को कोई चिन्ता नही है। यह तथ्य किसी से छिपा नही है कि शहरी व कस्बाई क्षेत्रो में वैध-अवैध रूप से चलने वाले सवारी वाहन पुलिसिया मिलीभगत से किस प्रकार अवैध सवारियाॅ ढ़ोते है और इस पहाड़ी क्षेत्र में होने वाली अधिकांश सड़क दुघर्टनाऐं इन वाहनो को गलत तरीके से दी जाने वाली फिटनेस व क्षमता से अधिक सवारियाॅ भरने के साथ ही साथ इनकी अनियन्त्रित गति के चलते होती है लेकिन इन तमाम विषयों पर प्रशासन अक्सर मौन रहता है और इनके अधिकारो की रक्षा के नाम पर बने इनके संगठन गलत कार्यो के लिऐ अपने राजनैतिक प्रभाव का उपयोग करने के साथ ही साथ भ्रष्टाचार के खेल में वाहन स्वामियों व सरकारी अधिकारियों के बीच एक सेतु की तरह कार्य करते है। क्या सरकार की यह जिम्मेदारी नही है कि वह दोपहिया वाहनो से सफर करने वाली निम्न मध्यम वर्गीय जनता पर किसी भी तरह का दबाब बनाने से पहले उन तमाम व्यवस्थाओं को दुरूस्त करे जो न सिर्फ उसकी नैतिक जिम्मेदारी है बल्कि जिन्हे पूरा करने के नाम पर सरकार जनता से विभिन्न प्रकार के कर भी वसूलती है और बड़ी से बड़ी दुघर्टना की स्थिति में भी सिर्फ मुआवजा घोषित करने के अलावा जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ किसी भी तरह की कार्यवाही को अंजाम नही दिया जाता। हो सकता है कि कुछ अभिवावक अपनी दौलत की नुमाइश करने के चक्कर में अपने नौनिहालों को मंहगी व तेज़ रफ्तार वाली दो-पहिया गाड़िया दिलाकर कानून तोड़ने की जुर्रत करते हो और स्कूलो की छुट्टी वाले समय सड़क पर वाहनो का बढ़ता दबाव व तेज़ रफ्तार दो-पहिया वाहन दौड़ाते युवा या किशोर यातायात के नियमो को धता बताकर पुलिसिया परेशानी का सबब बनते हो लेकिन क्या किसी सरकार अथवा जिम्मेदार निकाय ने गम्भीरता से यह गौर करने की कोशिश की है कि भागमभाग वाले इस दौैर में स्कूली शिक्षा के लगातार गिर रहे स्तर के कारण हर विषय की अलग से ट्यूशन लेने को मजबूर छात्र समुदाय के पास कानून को तोड़ने के अलावा अन्य क्या विकल्प है और फिर आधुनिक तकनीक के इस दौर में किशोरों को बालिग होने से पूर्व वाहन चलाने का अधिकार न दिया जाना किस हद तक तर्कसंगत है। यह तथ्य किसी से छिपा नही है कि सूचना व संचार की बड़ी क्रान्ति के रूप में मोबाइल व इसमें चलने वाला इंटरनेट आज युवाओं की पहली पंसद व जरूरत बन गया है और इसके सामाजिक जीवन पर पड़ रहे तमाम तरह के दुष्प्रभावो के बावजूद इसके इस्तेमाल व बिक्री को रोके जाने को लेकर किसी भी तरह के प्रतिबन्ध भी नही है लेकिन सरकार न्यायालय के एक आदेश का सहारा लेकर दोपहिया वाहनो की पिछली सीट पर बैठायी जाने वाली सवारी पर अघोषित रूप से प्रतिबन्ध लगा तथाकथित रूप से सभ्य समाज के एक बड़े हिस्से को वक्ते जरूरत दूसरे की सहायता करने से रोकने का पूरा दुस्साहस कर रही है और इस फैसले को कड़ाई से लागू करने के लिऐ काली वर्दी धारी पुलिस के जवान पूरी तत्परता से जुटे हुऐ है। यह माना कि कानून की अपनी मजबूरियाॅ है और कानून व्यवस्था को कायम रखने व राजस्व एकत्र करने के निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने के लिऐ जुर्माना वसूलना पुलिस की मजबूरी है लेकिन यह तथ्य भी काबिलेगौर है कि जुर्माने के माध्यम से वसूली गयी इस धनराशि को सरकार द्वारा किस मद में खर्च किया जा रहा है और व्यापक जनहित में चलायी जाने वाली योजनाओ अथवा सड़क यातायात सुधार के क्रम में इस धनराशि का कितना हिस्सा व्यय किया जा रहा है, सरकार इस विषय में मौन दिखती है और जनता के पास यह जानने का कोई साधन नही है कि सरकार इस धनराशि को कैसे खर्च कर रही है? यह तथ्य किसी से छिपा नही है कि न सिर्फ उत्तराखण्ड में बल्कि देश के लगभग सभी हिस्सों में सरकार द्वारा व्यापक जनहित के उद्देश्यों से चलाये जाने वाले पब्लिक ट्राॅसपोर्ट की हालत लचर है और राजधानी देहरादून समेत देश के लगभग सभी राष्ट्रीय राजमार्गो व राज्य सरकार के आधीन आने वाली सड़को पर सरकार की ओर से चलायी जाने वाली ट्राॅसपोर्ट ऐजेन्सियों के स्थान पर निजी मोटर मालिको का बोलबाला है जो अपने आर्थिक हितो को ध्यान में रखते हुऐ यात्रियों को न सिर्फ अपनी वाहन क्षमता से कहीं ज्यादा संख्या में ढो़ते है बल्कि यातायात के नियमों की अवहेलना करते हुऐ अन्धाधुन्ध गति से सड़को पर दौड़ने़े वाले यह तमाम निजी यात्री वाहन अधिकांश सड़क दुघर्टनाओं का कारण भी बनते है लेकिन सरकार का इस ओर ध्यान नही है और अब दोपहिया वाहनो के लिऐ लागू किये गये इस नये नियम के बाद स्थानीय जनता की परेशानी को लेकर भी सरकार द्वारा कोई तैयारी नही की गयी है। इन हालातो में यह तय है कि पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के साथ ही साथ दोपहिया वाहन धारको पर एक और आर्थिक बोझ बिना वजह व अप्रत्यक्ष रूप से लादा जाना तय है जिसके चलते न सिर्फ आम आदमी की जेब कटने की पूरी सम्भावना है बल्कि इस नयी व्यवस्था के चलते तमाम निम्न मध्यम वर्गीय परिवारो के समक्ष रोजाना के हिसाब से नये संकट आने की सम्भावना से भी इनकार नही किया जा सकता क्योकि सरकार द्वारा महिलाओं हेतु सार्वजनिक यातायात की सुविधा सुगम बनाने के उद्देश्य से की गयी महिलाओं के लिऐ प्रथक अथवा आरक्षित आधार पर तिपहिया वाहन चलाने व सार्वजनिक बसो में उनकी सीटे आरक्षित करने की घोषणाओ के बावजूद सरकार यह कहने की स्थिति में नही है कि उसने महिलाओं के साथ राह चलते होने वाली छेड़छाड़ व अन्य असमाजिक गतिविधियों पर रोक लगाने की दिशा में केाई प्रभावी कदम उठाया है और घरेलू खरीददारी व अन्य तमाम तरह के छोटे-छोटे कामो से दिन में कई-कई बार घर से बाहर जाने के लिऐ अपने दो पहिया चालक परिजनो अथवा परिचितो का सहयोग लेने वाली महिलाओं के लिए यह सामान्य रूप से सम्भव नही है कि वह हर वक्त एक हैलमेट अपने साथ रखे। लिहाजा जन सुरक्षा की दृष्टि से जन सामान्य पर जबरदस्ती लादा जा रहा यह कानून आम जनता के लिऐ जी का जंजाल बनता दिख रहा है और इस पूरी कवायद के पीछे न्यायालय का आदेश जुड़ा होने के कारण जनता द्वारा इस व्यवस्था का सार्वजनिक स्तर पर विरोध किये जाने की भी कोई सम्भावना नही दिख रही है जिस कारण से जनपक्ष का एक बड़ा हिस्सा हताश और निराश नज़र आता है। सरकार को चाहिऐं कि वह एक बार पुनः अपने इस फैसले पर विचार करे तथा दो पहिया वाहन चालको का चालान कर उन्हे परेशान करने के स्थान पर अपने अधिकारो का प्रयोग करते हुऐ व्यवस्थाओं में सुधार आने तक पुराने नियमो के ही लागू रहने का अध्यादेश लाये। यह एक व्यापक जनचर्चा का विषय हो सकता है कि जब सरकार शहर की अवैध बस्तियों को तोडे़ जाने के न्यायालयी आदेशो को दरकिनार करते हुऐ अपना वोट बैंक बचाने की नीयत से एक अध्यादेश ला सकती है या फिर राजनैतिक उद्देश्यो की पूर्ति के लिए दलितो को एकजुट करने के लिऐ उच्चतम् न्यायालय के आदेशो की अवहेलना करते हुऐ नया नियम बनाया जा सकता है तो फिर प्रदेश व देश की आबादी के एक बड़े हिस्से को राहत देने के उद्देश्य से दो पहिया वाहनो में दोनो ही सवारियों द्वारा हेलमेट लगाये जाने के नियम में शिथिलता क्यों नही दी जा सकती।

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