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Tuesday, March 31, 2020

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सवालो के घेरे में।

आस्था के नाम पर भोले भक्तो के जमावड़े व उद्ण्डता से फिर सहमी देवभूमि।

आस्था और धर्म के सड़क पर प्रदर्शन का एक दौर कावड़ यात्रा के रूप में समाप्त हो गया और बहुत कुछ अस्त-व्यस्त करने के बाद काबड़ियें अपने-अपने घरो की ओर वापस कूच कर गये लेकिन उनके पीछे छूट गया गन्दगी और कचरे का एक ढ़ेर जिसे वह परम् पावनी गंगा के किनारो पर छोड़ गये या फिर यों कहिये कि आधुनिक परिवेश व रहन-सहन के साथ धार्मिक परम्पराओ के इस मिलन में धर्म नगरी हरिद्वार व ऋषिकेश समेत देवभूमि उत्तराखण्ड के हिस्से जो कुछ भी आया वह निष्प्रयोज्य प्लास्टिक के कचरे के सिवा कुछ भी न था और धरती की उर्वरता को बर्बाद करने के साथ ही साथ आम आदमी के सामान्य जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित करता प्लास्टिक का यह धीमा ज़हर देश की सरकार के स्वच्छ गंगा अभियान जैसे दावो की पोल खोलता नज़र आया। हाॅलाकि धर्म व आस्था के नाम पर हर तरह के आंडबर को स्वीकार करने वाली एक विचारधारा विशेष से जुड़े लोगो का मानना है कि अगर घर में कोई विवाह या अन्य बड़ा आयोजन हो तो इस अवसर पर आने वाले मेहमानों व आगन्तुकों की संख्या देखते हुऐ आयोजन के बाद व्यवस्थाओं का चरमरा जाना व स्थितियों के नियन्त्रण में आने में दस-पाॅच दिन लगना सामान्य सी बात है और यह आयोजन वैश्विक स्तर का हो जिसमें करोड़ो की संख्या की भागीदारी हुई हो तो स्थानीय जनता को एक मेज़बान की तरह हालातों का सामना करने के लिऐ तैयार रहना चाहिऐ तथा नगर निगम व अन्य निकायो के सहयोग से स्थितियाॅ सामान्य होने का इन्तज़ार करना चाहिऐ।यह ठीक भी है क्योंकी आम आदमी इससे ज्यादा कुछ कर भी नही कर सकता। भोले के भक्तो को हरिद्वार से आगे गंगा के उद्गम् स्थल व अन्य शान्त इलाकों तक पहुॅचने से रोकने में जब स्थानीय प्रशासन ही नाकामयाब रहता है तो आम आदमी की बिसात क्या कि वह इनपर या इनके द्वारा की जाने वाली किसी भी तरह की गन्दगी को रोकने की बात भी अपनी जुबान पर ला सके और रहा सवाल इन तथाकथित शिवभक्तो के तांडव व राह चलते किये जाने वाले उंदड का तो इस परिपेक्ष्य में तो सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि सड़को पर अपना साम्राज्य समझने वाले तथा भगवा चोला धारण कर लूट-पाट, अभ्रदता अथवा गुंडई करने वाले इन तथाकथित शिवभक्तो की संख्या भले ही थोड़ी हो लेकिन यह सच है कि इनके आचरण व निरकुंश तौर-तरीके ने शान्त भाव से कावड़ ले जाकर गंगा के प्रति आस्था व्यक्त करने वाले पूरे समाज को ही बदनाम कर रखा है तथा यह कहने में भी कोई हर्ज नही है कि लगातार बढ़ती जा रही संख्या के बावजूद आर्थिक स्मृद्धि व बाज़ार पर इनके आगमन का कोई विशेष प्रभाव न पड़ने के कारण स्थानीय व्यापारी व जनता भी इनको लेकर उत्साहित नही दिखती। कावड़ यात्रा के नाम पर डाक कावड़ जैसी खुराफात का जन्म कैसे हुआ इसका कोई निश्चित इतिहास तोे नही है और न ही इसके कारण सड़को पर होने वाली बेवजह की उछल कूद व दौड़-भाग को तर्कसंगत ही कहा जा सकता है लेकिन धार्मिक अस्थाओं के नाम पर सरकारी तन्त्र न सिर्फ इस तरह की तमाम ज़ोर-ज़बरदस्ती के आगे बेबस दिखता है बल्कि सालो-साल से चली आ रही इस व्यवस्था को देखते हुऐ सरकार द्वारा इस संदर्भ में नियम बनाये जाने, उन्हे कड़ाई से लागू करने अथवा अलग से निर्मित आस्था के पथो तक ही कावड़ यात्रा को सीमित रखने के प्रयास ही नही किये जाते। नतीजतन लगभग एक पखवाड़े तक या फिर कभी-कभी तो इससे भी अधिक पहाड़ो पर आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित हो जाती है जिसका सीधा असर व्यापार व कृत्रिम मॅहगाई के रूप में महसूस किया जा सकता है और ईश्वर न करे कि बरसात के मौसम में होने वाली इस कावड़ यात्रा के दौरान पहाड़ो पर कभी कोई आफत की बारिश हो गयी तो एक धार्मिक आयोजन के नाम पर सड़को पर हफ्तो तक चलने वाली भोले के भक्तो की यह कब्जेदारी स्थानीय जनता को बहुत भारी पड़ सकती है। हालाॅकि अगर चाहे तो कावड़ यात्रा के बहाने एकत्र इस अथाह श्रम शक्ति का उपयोग कर कई तरह की व्यवस्थाओं को सुदृढ़ बनाया जा सकता है और नमामि गंगे जैसी योजनाओ के जरिये लाखो करोड़ो की धनराशि ठिकाने लगाने के बजाय सरकार गंगा के प्रति आस्थावान युवाओं की इस टोली का उपयोग करते हुऐ बहुत ही कम लागत व कीमत पर बेहतर नतीजे जनता के सामने रख सकती है लेकिन सरकारी तन्त्र पर हावी नौकरशाही व कमीशनखोरी का खेल इस तरह की किसी भी योजना को परवान ही नही चढ़ने देता और धार्मिक आस्था व सस्ंकार की बात करने वाले यह युवाओं के स्वतः स्फूर्त समूह स्थानीय शासन अथवा प्रशासन पर ही नही बल्कि जनता पर भी एक भार बनकर रह जाते है। यह माना कि आस्था और विश्वास पर किसी भी तरह की कानूनी पहरेदारी लगाया जाना सम्भव नही है और न ही ज़ोर-जबरदस्ती अथवा डण्डे के दम पर कावड़ यात्रियों अथवा तीर्थयात्रियों से जनसेवा अर्थात गंगा की साफ-सफाई जैसे कार्यो को करवाया जाना सम्भव है लेकिन अगर उत्तराखण्ड की डबल इंजन सरकार चाहे तो वह केन्द्र सरकार व सत्ता के शीर्ष पर काबिज राजनैतिक विचारधारा के सहयोग व तीर्थनगरी हरिद्वार के प्रति आस्था रखने वाले सन्त समाज के मदद से एक नई परम्परा की शुरूवात कर सकती थी और इस कावड़ यात्रा के मौसम में माॅ गंगा की स्वच्छता के उद्देश्यों से चलायी जा रही नमामि गंगे परियोजना में नया अध्याय जोड़कर एक कीर्तिमान कायम किया जा सकता था। अफसोसजनक है कि शासन तन्त्र का कोई भी हिस्सा इस अथाह मानव शक्ति का सही उपयोग करने पर विचार नही कर रहा है और हर कावड़ यात्रा के अवसर पर उदण्ड कावड़ियों के राह चलते लोगो से लूट-पाट करने अथवा किसी भी छोटी-बड़ी गलती पर तुनककर बलवाई अंदाज़ में सबकुछ तहस-नहस कर देने के किस्से नाहक ही समस्त धर्मपे्रमियों को आहत कर रहे है। अगर पर्यटन व अन्य आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो कावड़ यात्रा में ऐसा कुछ भी नही है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि स्थानीय जनता को कई तरह की परेशानी से रूबरू करवाने वाला भोले के भक्तो का यह काॅरवा रोज़गार के संसाधन व अवसर उपलब्ध कराता है तथा कावड़ यात्रा के दम पर आर्थिक संसाधनो की कमी से जूझ रही उत्तराखंड की सरकार को भी किसी तरह का राजस्व प्राप्त होता है लेकिन इस सबके बावजूद स्थानीय जनता व सरकार काॅवड़ यात्रियों के सम्मान व सुविधा का पूरा ख्याल रखती है और पूरी ताकत लगा व्यवस्थाओं को सुचारू बनाने में जुटी पुलिस प्रेम के साथ काॅवड़ यात्रियों की उदण्डता पर काबू पाने का प्रयास करने में जुटी रहती है। इन तमाम तरह की व्यवस्थाओं के बावजूद केन्द्र सरकार अथवा धर्म की रक्षा के लिऐ कुछ भी कर गुज़रने का दावा करने वाले सामाजिक व राजनैतिक संगठन किसी भी स्तर पर इस पुलिस बल का आत्मबल बढ़ाने अथवा इसे सम्मानित करने की बात नही करते और न ही गंगा के बहाव क्षेत्र वाले पर्वतीय इलाको में कुछ जनकल्याण्कारी योजनाऐ चलाने की ओर ही इन संगठनो का ध्यान जाता है। यह काबिलेगौर है कि नदियों का प्रदेश कहा जा सकने वाला उत्तराखण्ड देश के एक बड़े हिस्से को पेयजल व सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराता है और प्रत्येक वर्ष होने वाली बारिश व अन्य प्राकृतिक आपदाओं के चलते यहाॅ की स्थानीय जनता को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है लेकिन इन तमाम समस्याओं की एवज में इस पहाड़ी राज्य को कोई भी सुविधा केन्द्र की ओर से नही दी जाती है और न ही गंगा के प्रति आस्थावान व गंगाजल के सम्मान का दावा करने वाले शिवभक्तो के समूह अपने निजी स्तर अथवा संगठनात्मक तौर पर ऐसे कोई प्रयास करते है कि गंगा की अविरलता व सतत् प्रवाह बनाये रखने के लिऐ अपने रोजमर्रा के जीवन में कई तरह के कष्ट झेलने वाले पहाड़ी समुदाय को कोई राहत मिल सके। लिहाज़ा शिव और पार्वती का वास माने जाने वाले इस पर्वतीय प्रदेश में कावड़ यात्रा को कोई विशेष मान्यता अथवा सम्मान नही मिल पाया है तथा तथाकथित भोले के भक्तो को इस प्रदेश की अधिकांश जनता नशेड़ियों व उद्ण्डियों के समूहो से ज्यादा कुछ भी नही समझती जिस कारण इस पूरी यात्रा के दौरान राज्य के एक बड़े हिस्से में दहशत एवं जमाखोरी के चलते बढ़ने वाली कृत्रिम महॅगाई का आलम रहता है।

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