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Saturday, September 26, 2020

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असुरक्षा के माहौल में

शराब माफिया द्वारा पत्रकार पर किए गए हमले के बावजूद मौन मीडिया खड़े करता है कई सवाल
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में एक पत्रकार पर हुआ प्राणघातक हमला इन दिनों जनचर्चाओं का विषय है और इस ज्वलंत मुद्दे को लेकर खामोश दिखता मीडिया का एक बड़ा हिस्सा यह इशारे कर रहा है कि मामले में कहीं न कहीं कुछ ऐसी गड़बड़ जरूर है जो व्यापक जनहित की पत्रकारिता का दावा करने वाले समाचार पत्र-पत्रिकाएं व मीडिया के अन्य माध्यम इस विषय पर चुप्पी साधे हुए हैं। हालांकि यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकारी इशारे पर काम कर रहा है और तथाकथित रूप से बड़े कहे जाने वाले तमाम मीडिया संस्थानों पर पूंजीवादी मानसिकता का कब्जा है लेकिन फिर भी यह उम्मीद की जाती रही है कि पत्रकार बिरादरी के माध्यम से जनसामान्य तक अपनी पहुंच रखने वाला मीडिया, समाज व देश की ज्वलंत समस्याओं पर अपनी नजर बनाये रखेगा तथा सामाजिक जीवन में घटने वाली हर छोटी-बड़ी घटना पर अपनी बेबाक टिप्पणी के माध्यम से सरकारी तंत्र का ध्यान इस ओर आकर्षित करेगा। अफसोसजनक है कि इधर पिछले कुछ वर्षों में समाचारों के प्रकाशन व प्रसारण के उद्देश्य बदले हैं और इस क्षेत्र में आ रही तमाम दुश्वारियों के चलते पत्रकारों ने भी अपने उद्देश्य बदलने व जनहित को दरकिनार कर सरकारी तंत्र के साथ खड़े होने में संकोच नहीं किया है। नतीजतन न सिर्फ जनान्दोलनों व स्थानीय मुद्दो पर आधारित जनता की आवाज को मीडिया के इन तमाम प्रचलित संसाधनों में जगह मिलनी कम हुई है बल्कि अपने व्यवसायिक हितों के लिए सामान्य जनता पर माफिया वाले अंदाज में हावी होने की कोशिश करता रहा पूंजीपति व शासक वर्ग अब पत्रकारों पर भी हमलावर होने से सकुचाता नहीं दिख रहा। हालिया घटनाक्रम सरकार व पूंजीपति वर्ग के इसी आपसी तालमेल से जन्मी माफिया संस्कृति का परिणाम है और इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि अगर पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग अपने अधिकारों व सुरक्षा को लेकर इसी तरह उदासीन बना रहा तो आने वाले कल में इससे भी कई ज्यादा गम्भीर परिणाम देखने को सामने आ सकते हैं। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि उत्तराखंड में गठित होने वाली तमाम जनहितकारी सरकारें प्रदेश में होने वाली शराब बिक्री को बढ़ाने व नई शराब की दुकानें खोलने के लिए उत्साहित दिखती है तथा भारी जनविरोध के बावजूद राजस्व बढ़ाने के नाम पर शराब के कारोबारियों को अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए तमाम तरह के मौके व सुविधाएं प्रदान किए जाते रहे हैं लेकिन शराब के इस काले कारोबार में बने रहने के लिए इन तथाकथित कारोबारियों को नेताओं के वरदहस्त के साथ ही साथ नौकरशाहों व अधिकारियों की एक बड़ी फौज को भी संभालना पड़ता है तथा स्थानीय पुलिस प्रशासन के साथ मिलीभगत के बिना इनकी कई धंधेबाजियां चल ही नहीं सकती। शायद यही वजह है कि शराब के वैध कारोबार में काफी कुछ अवैध है और इस धंधे में होने वाली मोटी कमाई ने व्यापक जनविरोध के बावजूद भी इस कारोबार को पर्याप्त सरकारी संरक्षण प्रदान किया है लेकिन इधर देश में नोटबंदी लागू होने के बाद ग्राहकों के एक वर्ग में अपने अधिकारों को लेकर जागरूकता आयी है और वह शराब की दुकानों से बिल दिए जाने व प्लास्टिक मनी के जरिए भुगतान किए जाने की मांग करने लगे हैं। साधारण परिस्थितियों में ऐसे ग्राहकों को टरकाकर या धमकाकर काम चला लिया जाता है और शहर के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग कीमतों पर मिलने वाली शराब व इसकी गुणवत्ता को लेकर स्थानीय प्रशासन व विभाग भी चुप्पी साधे रहता है लेकिन जब कोई अड़ियल व्यक्तित्व अथवा हर वक्त खबर की खोेज में रहने वाला पत्रकार ऐसी जगहों पर पहुंच जाता है तो हालात अक्सर संवेदनशील हो जाते हैं। हालांकि ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए शराब व्यवसायियों ने बकायदा गुंडे पाले हुए हैं और स्थानीय पुलिस या विभागीय अधिकारी भी ऐसी परिस्थितियों में ईमानदारी से कार्यवाही करने की जगह शराब व्यवसायी के कर्मचारी की तरह व्यवहार करते हैं लेकिन कभी कभार ऐसा भी हो जाता है कि प्रदेश की राजधानी जैसे जगहों में पत्रकारों की बड़ी भीड़ के चलते कोई चेहरा पहचाना नहीं जाता या फिर उसे सबक सिखाने की ठान ली जाती है और नतीजे अपने प्राणों की बाजी लगा चुके एक जीवट साथी के रूप में हमारे सामने आते हैं। यह माना कि पत्रकार भी पूरी तरह निष्पक्ष व ईमानदार नहीं है और इस क्षेत्र में कार्यरत् ऐसे श्रमजीवियों की एक लंबी सूची बनायी जा सकती है जिनकी शाम की व्यवस्था करने की पूरी जिम्मेदारी अघोषित रूप से निकटवर्ती थानों या फिर थानाध्यक्ष की होती है लेकिन सवाल यह है कि क्या इस तरह की व्यवस्थाएं किसी भी ईमानदारी के धंधे में हो सकती हैं या फिर कुछ पत्रकारों को गलीच सुविधाओं के आधार पर खरीदने वाली व्यवस्था और मीडिया संस्थानों को विज्ञापनों के जरिए अपना गुलाम समझने वाली सरकार को यह हक है कि वह इस व्यवस्था को स्वीकार करने से इंकार करने वाले अथवा सच को सामने लाने की कोशिश करने वाले पत्रकारों को अपने गुंडों के जरिये पिटवाये। यदि पीड़ित पक्ष किसी गलत नीयत या इरादे से एक सार्वजनिक स्थल कहे जा सकने वाले प्रतिष्ठान पर गया था या फिर उसने किसी भी तरह की कोई अभद्रता की थी तो उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए थी लेकिन कानून को अपने हाथ में लेकर एक पत्रकार के साथ की गयी मार-पिटाई व उस पर किया गया प्राणघातक हमला यह दर्शाता है कि वहां कुछ न कुछ ऐसा गलत जरूर हो रहा था जिसे छिपाने के लिए व्यवसायी को यह हथकंडा अपनाना पड़ा और अब सम्पूर्ण घटनाक्रम पर पर्दा डालते हुए चंद तयशुदा लोगों की गिरफ्तारी का स्वांग रच सरकार इस सम्पूर्ण घटनाक्रम पर पर्दा डालने का प्रयास कर रही है जिसके चलते माफिया के हौसले बुलंद हैं। हम देख रहे हैं कि स्वयं को पत्रकारिता का आधार स्तम्भ कहने वाले मीडिया के तमाम तथाकथित संस्थान इस सम्पूर्ण प्रकरण पर मौन हैं जबकि शराब माफियाओं के हाथों पहले ही लुटा-पिटा व ठगा गया आम जनमानस का एक बड़ा हिस्सा आत्ममुदित स्थिति में इस सम्पूर्ण घटनाक्रम का अवलोकन कर रहा है क्योंकि उसे लगता है कि उसके आड़े वक्त में शराब माफिया व स्थानीय प्रशासन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर विरोध की खबरों को अनदेखा करने वाला पत्रकारों का यह समूह ही असली फसाद की जड़ है और अब, जबकि खुद इस वर्ग की जान सांसत में आती दिख रही है तो यह देखने का विषय है कि यह तबका क्या रूख अपनाता है। अफसोसजनक है कि इस सम्पूर्ण घटनाक्रम पर पत्रकारों के तमाम संगठन या तो मौन हैं या फिर वह रस्म अदायगी वाले अंदाज में सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों से अपने बयान जारी करते हुए अपने कर्तव्य की इतिश्री कर रहे हैं। जहां तक सरकार का सवाल है तो किसी भी स्थिति में यह नहीं लगता कि सरकार पत्रकार की पिटाई से सम्बंधित इस सम्पूर्ण घटनाक्रम या फिर इस विषय में पत्रकारों या उनके संगठनों द्वारा प्रदर्शित आक्रोश को जरा भी गंभीरता से ले रही है और पत्रकारों के सचिवालय में प्रवेश के मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से हुए विरोध के बावजूद सरकार ने जिस प्रकार हठधर्मिता अपनाते हुए कुछ निश्चिंत स्थानों पर पत्रकारों के प्रवेश पर रोक लगा रखी है, उसे देखते हुए तो यही प्रतीत होता है कि सरकारी तंत्र ने मीडिया को पूरी तरह बिकाऊ मानकर उसके एक छोटे किंतु प्रभावशाली व पूँजीपति के कब्जे वाले हिस्से से हाथ मिलाकर शेष सभी पत्रकार बिरादरी की अनदेखी करने का मन बना लिया है। इन हालातों में यह एक बड़ा सवाल है कि अगर पत्रकार स्वयं ही सुरक्षित नहीं हैं तो जनपक्ष की आवाज को कौन बुलंद करेगा लेकिन अपनी इस हालत के लिए यह वर्ग खुद भी जिम्मेदार है क्योंकि इसने सरकारी पिट्ठू व माफियाओं के दलाल की भूमिका को अपनाते हुए कई मौकों पर जनपक्ष के साथ गद्दारी की है।

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