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Monday, February 24, 2020

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एक नये अन्दाज में

कायम परम्पराओं से हटकर मीडिया के जरिये सीधे जनता की अदालत में आये न्यायाधीश

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में यह पहला अवसर है जब उच्चतम् न्यायालय के कुछ सम्मानित न्यायाधीशों ने सीधे मीडिया के समक्ष मुखातिब होकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाया है और इस सम्पूर्ण घटनाक्रम को यूं ही किसी नाराजी का हवाला देकर या फिर न्यायाधीशों के वैचारिक मतभेद का दर्जा देकर टाला नहीं जा सकता क्योंकि जिम्मेदार पदों पर बैठे इन महानुभावों ने पूरी सांजिंदगी के साथ न्याय प्रक्रिया को प्रभावित किए जाने की ओर इशारा करते हुए इसे लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के लिए एक बड़ा खतरा बताया है। हालांकि इससे पूर्व भारत के पूर्व चुनाव आयुक्त भी सरकार पर चुनावों को प्रभावित करने के लिए ईवीएम के साथ की जा रही छेड़छाड़ की ओर इशारा करते हुए बहुत कुछ कह चुके हैं और विपक्ष तो आए दिन मोदी सरकार पर एक तानाशाह की तरह व्यवहार करने का आरोप लगाता ही रहता है लेकिन यह स्थितियाँ पहली बार पैदा हुई हैं जब इस किस्म के आरोप न्यायपालिका के जिम्मेदार पदों पर बैठे अनुभवी व गैर राजनैतिक लोगों द्वारा लगाए गए हैं। हो सकता है कि सरकार इसे चर्चा का विषय न बनाना चाहे और तंत्र पर अपनी मनमर्जी थोपते हुए न्यायपालिका में भी बड़े व प्रभावी फेरबदल कर विरोध के सुरों को दबाने का प्रयास किया जाये लेकिन सवाल यह है कि वर्तमान में जो स्थितियां सामने आ रही हैं उनका विरोध करने या फिर जनता का पक्ष रखने के लिए आम आदमी को किस मंच पर जाना होगा। अगर सरकार की कार्यशैली की बात करें तो हम पाते हैं कि अपने गठन के इन चार वर्षों में मोदी सरकार उन तमाम फैसलों को लागू करने के लिए प्रयासरत् रही है जिनका विपक्ष के रूप में भाजपा द्वारा सदन व सड़क पर पूर्ण विरोध किया गया था और हालात भी यह इशारा कर रहे हैं कि केन्द्र सरकार द्वारा लागू किए जा रहे तमाम फैसले आम आदमी की दैनिक दिनचर्या में परेशानी का इजाफा करने वाले ही साबित हुए हैं लेकिन इस सबके बावजूद भाजपा अपनी चुनावी जीत के परचम को लगातार रूप से आगे बढ़ाने में कामयाब हुई है और उसने अपने कार्यकर्ताओं व अपने पक्ष में खड़े मीडिया के एक बड़े हिस्से का उपयोग कर उन तमाम विषयों को उठाने का प्रयास किया है जिनसे व्यापक जनहित का कोई सम्बन्ध नहीं है या फिर जिन विषयों को उठाया जाना भारत की एकता एवं अखण्डता के लिहाज से खतरनाक साबित हो सकता है। यह माना कि एक राजनैतिक संगठन के रूप में भाजपा को पूरा अधिकार है कि वह अपनी वोट बैंक की ताकत को एकजुट रखने अथवा बढ़ाने के लिए तमाम तरह से प्रयास करे और वह सभी मुद्दे जो किन्हीं कारणों से वर्तमान तक सार्वजनिक चर्चाओं का विषय नहीं बन पाए थे उन्हें समाज व सरकार के समक्ष लाया जाए लेकिन एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की सर्वोच्च सत्ता पर काबिज होने के बाद भाजपा के शीर्ष नेतृत्व अथवा सत्ता के शीर्ष पर विराजमान भाजपा के नेताओं को यह अधिकार कदापि नहीं है कि वह तंत्र द्वारा प्राप्त संसाधनों व व्यवस्थाओं का उपयोग अपना वोट बैंक बढ़ाने अथवा जोर-जबरदस्ती वाले अंदाज में अपनी मनमर्जी करने के लिए करें। वर्तमान में हो कुछ ऐसा ही रहा है और बहुमत के दम पर सत्ता के शीर्ष को हासिल करने के बाद तमाम संवैधानिक पदों पर कब्जेदारी की ओर बढ़ती भाजपा के नेताओं व तथाकथित समर्थकों के बयानों से ऐसा महसूस होने लगा है कि मानो वह जोर-जबरदस्ती के बलबूते विपक्ष को नेस्तनाबूद करते हुए अपना आगे का मार्ग निष्कंटक करना चाहते हैं। इन हालातों में यह एक बड़ा सवाल है कि अगर देश की तमाम संवैधानिक व्यवस्थाएं भाजपाई विचारधारा से ओतप्रोत होकर सरकार की हाँ में हाँ मिलाने में जुट जाएंगी तो फिर सही अथवा गलत का फैसला किस आधार पर होगा और सामान्य जनजीवन में आम आदमी की परेशानी बनते जा रहे तमाम कानूनी अथवा नीतिगत फैसलों पर सवाल उठाने के लिए किस मंच का उपयोग किया जाएगा। यह भारतीय संविधान की खूबी है कि इसमें हर आदमी को अपना पक्ष रखने का अधिकार है और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं से तानाशाही की ओर बढ़ती दिख रही तथाकथित रूप से जनहितकारी सरकारें जब व्यापक जनहित को छोड़कर मनमानी की ओर बढ़ती हैं तो तंत्र के किसी न किसी हिस्से से विरोध के स्वर उठने लगते हैं लेकिन इस बार यह पहल न्यायपालिका के एक हिस्से द्वारा की गयी है जो स्वयं में आश्चर्यजनक कर देने वाली है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस पहल को किस तरीके से लेती है और मीडिया के सम्मुख सम्मानित न्यायाधीशों द्वारा दिए गए बयानों पर सरकार की क्या प्रतिक्रिया आती है लेकिन इस सम्पूर्ण घटनाक्रम के बाद इतना तो तय हो ही गया है कि मौजूदा हालातों में किसी भी सरकार के लिए यह संभव नहीं है कि वह सत्ता पर कब्जेदारी के बाद एक निरंकुश राजा की तरह व्यवहार करने लगे और सरकार के विरोध में उठने वाले विपक्ष के तमाम सुरों को डंडे के बल पर चुप करा दिया जाये। यह ठीक है कि निवेश में एफडीआई लागू करने या फिर बैंकिंग सुधार के नाम पर जनता को कई तरह के करों से नवाजने के बावजूद मौजूदा सरकार को जमीनी स्तर पर उस विरोध का सामना नहीं करना पड़ा है जिसकी उम्मीद एक सर्वहारा समाज से की जानी चाहिए लेकिन इस सबके बावजूद यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि सदन में पर्याप्त संख्या बल के आभाव में अपनी बात सरकार के समक्ष रख पाने में पूरी तरह असफल रहा गरीब व मजबूर तबका जब धीरे-धीरे कर इन व्यवस्थाओं को समझने व झेलने की स्थिति में आएगा तो सरकारी व्यवस्थाओं का अंग बनकर लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए जिम्मेदार कुछ ताकतें आम आदमी की परेशानी व भावनाओं को समझेंगी और उसकी न्याय के प्रति उम्मीद बनी रहेगी। हाल ही में सामने आया सम्मानित न्यायाधीशों का मुद्दा इसी कड़ी की एक शुरूआत माना जा सकता है। हालांकि सम्मानित न्यायाधीशों ने अपने बयान में कहीं भी आम आदमी की पीड़ा को नहीं छुआ है और न ही उनके कथनों में सरकार के हालिया फैसलों का विरोध ही झलकता है लेकिन उन्होंने जिस अन्दाज में व्यवस्था को लेकर अपनी नाराजी सार्वजनिक रूप से जाहिर की है उसे कमतर करके नहीं आंका जा सकता और न ही यह माना जा सकता है कि उनके बयान निजी विषयों को लेकर आधारित थे। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह अच्छे संकेत हो सकते हैं क्योंकि वर्तमान में जब विपक्ष अपनी राजनैतिक मजबूरियों के चलते जनपक्षीय मुद्दों पर खुद को मजबूती के साथ प्रस्तुत नहीं कर पा रहा या फिर विभिन्न आपराधिक व भ्रष्टाचार के मुद्दों में फँसे विपक्ष के नेता अपनी गर्दन बचाने के लिए खुद को चुप्पी साधने अथवा सत्ता पक्ष के साथ जाकर खड़े हो जाने के लिए मजबूर पा रहे हैं तथा मीडिया के एक बड़े हिस्से पर उद्योगपतियों की कब्जेदारी के चलते उसका इस्तेमाल सरकारी भोंपू की तरह किया जा रहा है तो क्षीण होते विरोध के सुरों के चलते सत्ता पक्ष के मनमानी पर उतारू होने या फिर लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को अपनी बपौती समझने का खतरा लगातार बना हुआ है। ऐसी स्थिति में न्यायपालिका से जुड़े कुछ विश्वसनीय चेहरे मजबूती के साथ आगे आए हैं और उन्होंने देश के पीड़ित व शोषित जनता को नयी राह दिखाने का काम किया है। हमें ध्यान है कि ऐसी ही कुछ स्थितियाँ भारतवर्ष पर लादे गए आपातकाल के दौरान भी पैदा हुई थी और खुद को अजेय मान चुकी कांग्रेस पर न्याय व जनता के विश्वास का शिकंजा कसने के लिए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन भी कुछ इसी अंदाज में जनता के बीच अवतरित हुए थे। इस दौर की जनता का एक बड़ा हिस्सा चुनाव आयोग नामक किसी संवैधानिक संस्था तथा चुनाव आयुक्त के संवैधानिक अधिकारों के बारे में बहुत कम जानकारी रखता था और तत्कालीन हालातों व निरंकुशता के साथ बूथ कैप्चरिंग या जोर-जबरदस्ती के बूते बहुमत हासिल करने वाली राजनैतिक ताकतों को यह विश्वास ही नहीं था कि सरकार का ही एक अंग माना जाने वाला चुनाव आयोग कुछ इस अंदाज में जनपक्ष को संवैधानिक व्यवस्थाओं के बीच रख सकता है। वर्तमान में कुछ ऐसी ही हालत सर्वोच्च न्यायालय की भी है और न्याय व्यवस्था को काला कोट धारण करने वाले वकीलों के बूते खरीद-फरोख्त की आसान विषय वस्तु मानने वाली अधिसंख्य जनता अभी यह विश्वास करने को तैयार ही नहीं है कि व्यवस्थागत् सुधार व बदलाव की आवाज संविधान के इस कोने से भी उठ सकती है लेकिन वरिष्ठ न्यायाधीशों के एक गुट ने सीधे मीडिया के माध्यम से जनता के बीच अपनी बात रखकर इस विश्वास को बढ़ाने की दिशा में अपना पहला कदम आगे बढ़ाया है और अब देखना यह है कि देश की जनता व व्यापक जनहित के प्रति जवाबदेह सरकार इस कदम को किस तरीके से लेती है।

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