बदलती नीतियों व सिद्धान्तों के साथ | Jokhim News

Thursday, October 19, 2017

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बदलती नीतियों व सिद्धान्तों के साथ

व्यापक जनहित से हटकर सत्ता पर कब्जेदारी तक सीमित हुई राजनीति को हिंसा से परहेज नहीं।
यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि वामपंथ माओ और लेनिन की विचारधारा को आगे कर फलता-फूलता है तथा गरीब व मजलूम तबके की बात करने वाले या फिर मानवाधिकारों को लेकर चिंतित बुद्धिजीवी खुद को वामपंथी विचारधारा के नजदीक पाते हैं लेकिन इस सबके बावजूद भारत के तमाम वामपंथी विचारधारा वाले राजनैतिक दलों व बुद्धिजीवियों ने बंदूक के दम पर लड़कर सत्ता हथियाने का प्रयास करने के स्थान पर चुनावी जंग के मैदान में उतरने को ज्यादा सुरक्षित व न्यायसंगत माना है और देश की आजादी के शुरूआती दौर से ही वामपंथी विचारधारा के राजनैतिक दलों व नेताओं की देश के लगभग हर चुनाव में बराबर भागीदारी देखी जाती रही है। यह ठीक है कि देश भर में फैले श्रमिक संगठनों व विश्वविद्यालय कैम्पसों के अलावा लगभग हर जनान्दोलन में भागीदारी देने के बावजूद वामपंथी सरकारों व नेताओं का राजनैतिक आधार लगातार सिकुड़ता सा दिख रहा है और तथाकथित रूप से उग्र विचारधारा के नाम पर भ्रमित वामपंथ द्वारा आम आदमी की लड़ाई के नाम पर होने वाले हिंसक संघर्षों की चारों ओर निन्दा हो रही है लेकिन इस सबके बावजूद वामपंथी चूके नहीं हैं और न ही उन्होंने अपना लड़ने का तरीका बदला है। जब तक कांग्रेस भारतीय राजनीति के शीर्ष पदों पर काबिज रही तब तक वामपंथियों को सरकार के जनविरोधी फैसलों के खिलाफ आवाज उठाने अथवा श्रमिकों व मजलूम वर्ग के हितों की लड़ाई लड़ने के अलावा और कोई काम नहीं था क्योंकि कांग्रेस के नेता वामपंथ से सैद्धांतिक सहमति रखने के चलते उसके कामकाज के तौर-तरीकों में बहुत ज्यादा टांग नहीं फंसाते थे तथा कांग्रेस के नेतृत्व में बनने वाली लगभग सभी सरकारों को लोकहितकारी प्रदर्शित करने के लिए विभिन्न सामयिक मुद्दों पर वामपंथी नेताओं की सैद्धांतिक सहमति आवश्यक समझी जाती थी। शायद यही वजह रही कि वामपंथी नेताओं व राजनैतिक दलों ने देश की आजादी के इन सत्तर वर्षों में अपने राजनैतिक कैडर को बहुत ज्यादा फैलाने का प्रयास नहीं किया और कुछ राज्यों की राजनीति तक सीमित रहने के अलावा देश के अन्य हिस्सों में यह सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए ही चुनाव मैदान में उतरे। वामपंथी राजनीति के शीर्ष पर काबिज तमाम भारतीय नेताओं के इस कांग्रेसीकरण का समय-समय पर कभी दबी जुबान से तो कभी खुलेआम विरोध भी हुआ और सरकार के कई फैसलों से नाराज बुद्धिजीवी तबके ने अलग-अलग नामों से वामपंथी राजनीति को आगे बढ़ाने की कोशिश भी की लेकिन नतीजे वहीं ‘ढाक के तीन पात’ वाले रहे और सरकारी तंत्र के फैसलों से नाराज तमाम वामपंथी बुद्धिजीवियों ने सामाजिक बदलाव लाने के नाम पर दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों व वनवासी समुदायों के बीच जो संघर्ष शुरू किया, कालान्तर में उसके गलत हाथों में पड़ने के चलते एक सैद्धांतिक लड़ाई चैथ वसूली की गुण्डागर्दी व आतंकवादी गतिविधियों तक सीमित होकर रह गयी और यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि अपने स्पष्ट विचारों, लक्ष्य के प्रति समर्पण एवं सतत् संघर्ष के बाद भी वामपंथ भारतीय राजनीति के शीर्ष को छू नहीं पाया। यह माना कि वामपंथी राजनैतिक दल एक लंबे अर्से तक कुछ राज्यों की सत्ता पर काबिज रहे या फिर अपने इस कब्जे को बनाये रखने के लिए वह अभी भी संघर्ष कर रहे हैं लेकिन इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि खुद को वैचारिक धरातल पर मजबूत मानने वाले वामपंथी नेताओं ने छात्रों, श्रमिकों व रोज कमाकर खाने वाली जनता के एक बड़े तबके के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के प्रयास ही नहीं किए या फिर वह इस जनशक्ति को जनमत में बदल पाने में नाकाम रहे क्योंकि देश की जनता ने उन्हें कभी कांग्रेस के विकल्प के रूप में स्वीकार ही नहीं किया किंतु इधर स्थितियां तेजी से बदली हैं। हम देख रहे हैं कि सत्तापक्ष के नेताओं ने अपना जनाधार बढ़ाने के फेर में विश्वविद्यालयों तक सीमित वामपंथ को एकाएक ही चर्चाओं में ला दिया है और नोटबंदी व जीएसटी लागू किए जाने के बाद तेजी से बढ़ी बेरोजगारी व बाजार में छायी मंदी ने आम आदमी का ध्यान बरबस ही उन बातों और नारों की ओर खींचा है जो अभी तक सिर्फ वामपंथियों की सीमित संख्या वाली कार्यकर्ताओं की भीड़ अथवा विभिन्न जनान्दोलनों के दौरान श्रमिक वर्ग व पीड़ित पक्ष द्वारा लगाये जाते रहे। नतीजतन कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों को सत्ता पक्ष पर हमलावर होने का न सिर्फ बहाना मिला बल्कि देश के इतिहास में शायद पहली बार है कि राजनैतिक विरोध के बावजूद कांग्रेस व अन्य कई विपक्षी ताकतें विश्वविद्यालयों में दिख रही वामपंथी विचारधारा के साथ एकजुटता से खड़ी दिखाई दी। यहां तक तो सब ठीक था लेकिन सत्ता पर काबिज होने के बाद किसी भी कीमत पर अपना जनाधार बढ़ाने व बुद्धिजीवी वर्ग को अपनी पाले में खींचने को बेचैन भाजपा ने ठीक मौके पर शक्ति प्रदर्शन के बलबूते सब कुछ हासिल कर लेने की जिद कर एक बार फिर वही गलती कर दी जो सत्ता के मद में चूर नेता अथवा शासक अक्सर ही कर जाते हैं। सत्तापक्ष की इस गलती का राजनैतिक फायदा उठाने में वामपंथी नेता कोई चूक नहीं कर रहे और हर छोटे-बड़े मुद्दे को कुछ इस तरह जनता के बीच ले जाया जा रहा है कि मानो सरकार व देश के हर हिस्से में जो कुछ भी चल रहा है उसे मोदी व भाजपा के वैचारिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पूरा समर्थन प्राप्त है। हो सकता है कि इस तथ्य में कुछ हद तक सच्चाई भी छिपी हो और भाजपा के रणनीतिकारों को यह लगता हो कि राजनीति की इस शैली से वह आक्रामक विचारों व जनवादी ताकतों का सामना करने में कामयाब होंगे और भाजपा का तथाकथित हिन्दू राष्ट्रवाद, जनसामान्य के अधिकारों की बात करने वालों या फिर रोजी-रोटी के संघर्ष और बढ़ती महंगाई के साथ ही साथ सामाजिक व्यवस्था के विकास का नारा देने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों पर भारी पड़ेगा लेकिन भाजपा के नेता यह भूल रहे हैं कि इस देश की जनता राजनीति के हिंसात्मक तौर-तरीकों पर विश्वास नहीं रखती क्योंकि अगर ऐसा होता तो व्यापक जनसंघर्ष के जरिये अधिकार छीन लेेने की बात करने वाले माओवादी व नक्सलवादी कबके देश की सत्ता के शीर्ष पर काबिज हो चुके होते और देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था कबकी छिन्न-भिन्न हो जाती। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि धार्मिक व साम्प्रदायिक मुद्दे उठाकर भावावेश में मिले जनमत को जनसमर्थन समझने की भूल कर रही भाजपा राजनीति के मैदान में लंबी कब्जेदारी के लिए बुद्धिजीवी तबके को अपने पक्ष में खड़ा करना चाहती है और इसके लिए पद एवं सम्मान का लोभ देने के अलावा भाजपा व संघ का नेतृत्व हर उस तौर-तरीके पर विचार कर रहा है जिसके माध्यम से आम आदमी के दिलोदिमाग में छाया जा सके। इस स्थिति तक पहुंचने के लिए एक निश्चित वक्त और समयानुकूल मेहनत की जरूरत तो है ही साथ ही साथ सरकारी तंत्र की मिलीभगत से चल रहे इस खेल का भंडाफोड़ होने की स्थिति को सत्ता पक्ष के नेताओं को पासा उल्टा पड़ने की भी संभावना है। इसलिए भाजपा व संघ का नेतृत्व पूरे रणनैतिक अंदाज में जनता का ध्यान मूल मुद्दों से न सिर्फ भटकाने की कोशिश कर रहा है बल्कि समय-समय पर दंगा खड़ा करने की कोशिश या फिर सुनियोजित अराजकता के जरिए पूरे देश में डर का एक माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि यह कहना मुश्किल है कि डर का यह खेल भाजपा को क्या नुकसान अथवा फायदा पहुंचायेगा लेकिन सत्ता के मद में चूर भाजपा के तमाम नेता अपनी नीतियों व राजनीति के आपेक्षित तौर-तरीकों का त्याग कर भय का माहौल बनाने में लगे हैं।

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