नौ जन चले अढ़ाई कोस | Jokhim News

Monday, December 11, 2017

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नौ जन चले अढ़ाई कोस

अलग-अलग राजनैतिक विचारधाराओं व राजनैतिक क्षमताओं वाले व्यक्तित्वों के सत्ता में आने के बावजूद राज्य के हालात जस के तस
राज्य में अभी जारी है सतत् रूप से चल रही मुख्यमंत्री पद की कब्जेदारी की जंग

उत्तराखंड राज्य निर्माण के इन सत्रह वर्षों में हमने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं और पल-प्रतिपल बदल रहे राजनैतिक समीकरणों व चुनावी आंकड़ों के बीच हमने कई बार उन आकांक्षाओं को मरते-सुलगते देखा है जो राज्य आन्दोलन के दौरान इस राज्य के लगभग हर नागरिक के मन में हिलोरे मार रही थी। ऐसा नहीं है कि राज्य निर्माण के बाद हालात नहीं बदले या फिर नवगठित राज्य की जनपक्षीय सरकारों द्वारा व्यापक जनहित को ध्यान में रखते हुए फैसले नहीं किए गए लेकिन कहीं न कहीं कुछ ऐसा जरूर है जो दिल को कचैटता है और राज्यहित को निजी हित से ऊपर मानने वाली हर सोच को मजबूर करता है कि वह लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के नाम पर चल रही इस ‘लूट की खुली छूट’ के खिलाफ मोर्चा संभालें। हालांकि एक व्यापक जनान्दोलन खड़ा हो पाना अब मुश्किल काम है और राजनीति के बदलते हालात अब यह इशारा कर रहे हैं कि लोकप्रियता व राजनैतिक जनाधार अब बीते दिनों की बात हो चुकी है क्योंकि इनकी जगह मतलबपरस्ती व जोड़तोड़ ने ले ली है लेकिन इस सबके बावजूद जनमत से चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकारों से यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वह देश, काल और परिस्थिति को मद्देनजर रखते हुए अपने फैसले लेगी तथा आम आदमी को यह अहसास बना रहेगा कि उसके नेताओं व चुनाव जीतकर आने वाले माननीयों के दिल में जनभावनाओं का सम्मान व जनता का डर बना हुआ है। यह माना कि बहुमत के आधार पर चुनाव जीते किसी जनप्रतिनिधि की योग्यता को नकारा नहीं जा सकता और न ही यह माना जा सकता है कि राजनीति के मैदान में लगातार खुल रहे नये मोर्चों के बावजूद किसी एक ही दल या क्षेत्र से बार-बार चुनाव जीतने वाले व्यक्ति को अपने क्षेत्र में लोकप्रियता हासिल नहीं है लेकिन इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि उत्तराखंड में जनप्रतिनिधि एक बार चुनाव जीतने वाला हो या फिर बार-बार चुनाव जीत चुका, उसकी लोकप्रियता का दायरा सीमित होता जा रहा है और मंत्री या विधायक बनने के बाद अधिकांशतः नेता इस दायरे से बाहर निकलने की कोशिश नहीं कर रहे। नतीजतन पूरा का पूरा राज्य एक असंतुलित विकास की ओर जा रहा है और मंत्रियों के काम करने के तरीके व रूझान से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानो उन्हें एक क्षेत्र विशेष के विकास को ध्यान में रखकर नियुक्त किया गया हो या फिर एक चुनाव के निपटते ही सत्ता की बागडोर संभालने के बाद अगले चुनाव की तैयारी शुरू हो गयी हो। मजे की बात यह है कि इस तरह की तैयारी करने वाले लोग अधिकांशतः चुनावी हार का स्वाद चख चुके हैं और वह यह भी अच्छी तरह जानते हैं कि बीते चुनाव में उनकी हार का प्रमुख कारण जनता की महत्वाकांक्षा बढ़ना रहा है लेकिन सब कुछ जानने व समझने के बावजूद वह व्यापक दृष्टिकोण से काम करने या फिर अपने कामकाज के तरीके के तरीके में सुधार लाने को तैयार नहीं है क्योंकि जनता का नेता बनना विधायक या सांसद बनकर मंत्री बन जाने से कहीं ज्यादा कठिन है और एक व्यापक जनाधार वाले नेता के आगे आते ही जनसामान्य के बीच कई अपेक्षाएं व आकांक्षाएं कुलबुलाने लगती हैं। शायद यही वजह है कि जनता अपने तमाम दिग्गज नेताओं को इस छोटे से राज्य का मुख्यमंत्री बन जाने के उन्हें मिले असफल मुख्यमंत्री के तमगे के बावजूद उन्हें याद करती रहती है। यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि अपने साधारण जीवन व सादगी भरी राजनीति के दम पर उत्तराखंड की राजनीति में अपनी एक अलग पहचान रखने वाले तथा प्रदेश के लगभग हर हिस्से में भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच पैठ रखने वाले भगत सिंह कोश्यारी जब नित्यानंद स्वामी की जगह कामचलाऊ सरकार के मुखिया बने तो यह माना गया कि संगठन के माध्यम से जनता के बीच गहरी पैठ रखने वाले इस नेता को सत्ता में वापसी के लिए ज्यादा पापड़ नहीं बेलने पड़ेंगे लेकिन प्रदेश की जनता ने कोश्यारी के लगभग एक-डेढ़ साल के कार्यकाल को नकारकर एक विखंडित सा जनादेश दिया जिसमें बसपा व उक्रांद समेत अन्य क्षेत्रीय दलों व निर्दलीय विधायकों को भी राज्य की पहली जनता के माध्यम से चुनी गयी विधानसभा तक पहुंचने का मौका मिला। कांग्रेस ने स्थितियों का आंकलन कर अनुभव को तजरीह देते हुए इस क्षेत्र के लोकप्रिय व अनुभवी नेता पं. नारायण दत्त तिवारी को सत्ता के शीर्ष पद से नवाजा और यह माना गया कि वयोवृद्ध नेता पं. तिवारी अपने अनुभव व लोकप्रियता का लाभ उठाते हुए एक ऐसे राज्य की आधारशिला रखेंगे जो न सिर्फ आत्मनिर्भर व विकसित राज्य होगा बल्कि प्रदेश के अंतिम छोर पर रहने वाले सामान्य व्यक्ति को भी वह तमाम सुविधाएं व व्यवस्था प्राप्त होगी जिनकी कमी या मांग ने एक अलग राज्य की आवश्यकता को बल दिया था। यहां पर यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि तिवारी सरकार के दौर में नवगठित राज्य ने चहुंमुखी प्रगति की और राज्य की जनता की आय भी तेजी से बढ़ी लेकिन अपनी कई कमजोरियों के चलते तिवारी जी न तो नौकरशाही पर अंकुश रख पाए और न ही अपनी पार्टी के नेताओं पर। या फिर यह भी हो सकता है कि राज्य गठन के बाद तेजी से गिरे प्रदेश की राजनीतिक के स्तर व बढ़ी नेताओं की महत्वाकांक्षा ने इस नेता को त्रस्त करके रख दिया और उसने अगले चुनाव के लिए जनता के बीच जाने से पहले ही हार मानने वाले अंदाज में न सिर्फ अपना सरकारी आवास खाली कर जनता को एक निराशापूर्ण संदेश दिया बल्कि खुद चुनाव न लड़कर और न ही किसी प्रत्याशी के पक्ष में चुनाव प्रचार कर उन्होंने एक तरह से अपनी राजनैतिक नाराजी का ही परिचय दिया। यह एक अलग चर्चा का विषय है कि राज्य आंदोलनकारियों का चयन तथा संतुष्टिकरण के नाम पर लाल बत्तियों का वितरण कर उन्होंने प्रदेश के सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक हालातों को किस तरह बिगाड़ा लेकिन इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि अगर अपने शासनकाल में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान तिवारी कुछ चुनिन्दा विधानसभा क्षेत्रों की ओर रूख करते या फिर खुद नैनीताल अथवा ऊधमसिंहनगर की किसी भी विधानसभा से चुनाव लड़ने मात्र में तैयार हो जाते तो अगली विधानसभा की सूरत बदली हुई होती। खैर तिवारी के इस यादगार कार्यकाल के बाद एक बार फिर हुए चुनाव में भाजपा, उक्रांद व कुछ अन्य निर्दलीय विधायकों की मदद से सत्ता में आयी और खुद को राज्यहितों की पैरोकार कहने वाली उत्तराखंड क्रांतिदल की विचारधारा को पहली बार सत्ता में शामिल होने का मौका मिला। इस बार सत्तापक्ष के रूप में भाजपा हाईकमान ने अपने सांसद व पूर्व सैन्य अधिकारी मे. जनरल भुवनचन्द्र खंडूरी को सत्ता की कमान सौंपने का निर्णय लिया। खंडूरी जनता से सीधे सम्पर्कों वाले नेता नहीं रहे लेकिन इनकी ईमानदारी के चर्चे इन्हें एक लोकप्रिय नेता के रूप में स्थापित करने में कामयाब रहे और अपने शासनकाल में लोकपाल के गठन व स्थानान्तरण विधयेक जैसे मुद्दों को हवा देकर उन्होंने अपनी ईमानदारी को जनता के बीच रखने का प्रयास भी किया। यही वजह रही कि अपने पहले कार्यकाल में मिली तमाम तरह की असफलताओं के बावजूद भाजपा हाईकमान ने उन्हें न सिर्फ विधानसभा चुनावों का चेहरा बनाया बल्कि सरकार के कार्यकाल के अंतिम दौर में वह एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी हथियाने में कामयाब रहे। इस विषय पर भी अलग से चर्चा की जाना चाहिए कि तथाकथित रूप से ईमानदार खंडूरी किन कारणों के चलते लोकप्रियता को बरकरार रखने में सफल नहीं हुए और ‘खंडूरी है जरूरी’ का नारा दिये जाने के बावजूद विधानसभा चुनावों के दौरान उनकी पार्टी ही नहीं बल्कि उन्हें भी मिली चुनावी हार के क्या कारण रहे लेकिन इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि जनता के बीच सीमित लोकप्रियता के बावजूद बड़े हो-हल्ले के साथ प्रदेश की राजनीति में लाए गए खंडूरी जनता की नब्ज पहचानने में पूरी तरह असफल रहे। उनकी या तत्कालीन सरकार की चुनावी हार की वजहें चाहे जो भी रही हो लेकिन इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि अपने आधे-अधूरे कार्यकाल में सत्तापक्ष के विधायकों से तालमेल स्थापित कर विकास कार्यों को अंजाम देने की जगह उन्होंने अपनी कार्यशैली से उत्तराखंड की राजनीति को कुछ ऐसे जख्म दिये जिनकी भरपाई आसानी से हो पाना संभव नहीं है। भाजपा को सरकार बनाने के लिए मिले इसी मौके में लोकसभा चुनावों में करारी शिकस्त के बाद प्रयोग के तौर पर एक युवा मुख्यमंत्री के रूप में रमेश पोखरियाल को लाया गया और यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि इस समय तक मुख्यमंत्री रह चुके तमाम चेहरों के मुकाबले कम उम्र व अनुभवहीन कहे जा सकने वाले निशंक से स्थानीय जनता को बहुत आशाएं थी लेकिन सुयोग्य साथियों के आभाव में निशंक भी हालातों से पार नहीं पा सके और उन्हें उ.प्र. में मिला अनुभव किसी काम नहीं आया। यह माना कि एक मुख्यमंत्री के रूप में निशंक ने उन तमाम दूरस्थ क्षेत्रों का दौरा किया जहां राज्य गठन से उनका कार्यकाल शुरू होने तक कोई मंत्री या नौकरशाह नहीं पहुंचा था तथा पहाड़ की पृष्ठभूमि की राजनैतिक समझ के चलते उन्होंने कई ऐसी योजनाओं पर काम करने की सोची जिनके संदर्भ में लगभग सभी सरकारें व नेता चुप्पी साधे हुए थे लेकिन नौकरशाही का प्रेम इन्हें भी ले डूबा और लगभग दो साल के कार्यकाल के बाद भाजपा हाईकमान ने इन्हें एकाएक ही कुर्सी से हटाकर इनके स्थान पर एक बार पुनः खंडूरी की ताजपोशी कर दी। हालांकि वर्तमान में निशंक हरिद्वार संसदीय क्षेत्र से सांसद हैं तथा राज्य के लगभग सभी हिस्सों में इनके समर्थकों व चाहने वालों की निजी फौज है लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बाद वर्तमान तक निशंक प्रदेश की राजनीति के पहले पायदान में आने की लड़ाई लड़ रहे हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि निशंक को पुरानी स्थितियों तक पहुंचने के लिए एक लम्बा राजनैतिक संघर्ष करना होगा। खैर जनता द्वारा ‘खंडूरी है जरूरी’ के नारे को नकारने के बाद कांग्रेस ने एक बार फिर उक्रांद, बसपा व निर्दलीयों के बलबूते सरकार बनायी और सदन में बहुमत साबित करने के लिए निर्दलीय विधायकों व सहयोगी दलों को मंत्री पद की बख्शीश देते हुए कांग्रेस हाईकमान ने इस बार विजय बहुगुणा को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया। उ.प्र. के पूर्व मुख्यमंत्री रहे हेमवती नन्दन बहुगुणा के पुत्र विजय बहुगुणा की राजनीति के क्षेत्र में एकमात्र उपलब्धि यही थी कि वह एक बड़े नेता पुत्र थे जिस कारण उनकी पहचान जगजाहिर थी और इसी उपलब्धि के चलते वह लगभग ढाई साल तक टिहरी लोकसभा क्षेत्र की सांसदी का मजा ले चुके थे। कांग्रेस हाईकमान के इस फैसले के खिलाफ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व हरिद्वार से सांसद हरीश रावत के नेतृत्व में एक लम्बा आन्दोलन चला और सरकार के शुरूआती कार्यकाल में ऐसा लगा कि मानो कांग्रेस का ही एक हिस्सा सदन के भीतर व बाहर विपक्ष की भूमिका अदा कर रहा हो लेकिन कुछ ही अंतराल में हाईकमान स्थितियों पर नियंत्रण पाने में सफल दिखा तथा हरीश रावत व उनके समर्थकों को शांत करने के लिए हरीश रावत को केंद्र सरकार में पहले राज्यमंत्री और फिर केन्द्रीय मंत्री बनाया गया। मिलनसार व खुले स्वभाव के होने के बावजूद विजय बहुगुणा बहुत ज्यादा लम्बे समय तक स्थितियों को नियंत्रण में नहीं रख सके या फिर यूं कहें कि उनका अपने पुत्र के प्रति सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित होने लगा प्रेम और नौकरशाहों से सांठ-गांठ कर सरकारी योजनाओं के अमलीकरण के परिपेक्ष्य में आने वाली खबरों ने उन्हें विशेष रूप से चर्चित बनाया। इसी दौरान पहाड़ों पर बरपा प्रकृति का कहर विजय बहुगुणा के लिए भी कष्टदायक साबित हुआ और काफी जोड़-तोड़ व प्रयासों के बावजूद वह अपनी कुर्सी बचा पाने में नाकामयाब दिखे। उत्तराखंड में लगातार चल रही मुख्यमंत्री हटाओ योजना के तहत यह पहला मौका था जब प्रदेश के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा व जनता विजय बहुगुणा के कार्यकाल से नाराज दिखा और यह माना गया कि अगर जल्द सत्ता के शीर्ष पदों पर बड़ा फेरबदल नहीं किया गया तो जनता सड़कों पर दिख सकती है। लिहाजा कांग्रेस हाईकमान ने भी इस बार अपने फैसले में बदलाव लाते हुए हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाया और इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि हरीश रावत ने भी कुर्सी सम्भालते ही कुछ ऐतिहासिक फैसले किए और एकबारगी ऐसा लगा कि मानो उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के दौरान देखा गया दिवास्वप्न अब पूरा होने के करीब है। इसमें कोई दोराय नहीं कि हरेला व फुलदेई जैसी विलुप्त हो रही सामाजिक परम्पराओं को एक बार फिर जिन्दा करने तथा पहाड़ के कृषि उत्पादों को अंतर्राष्ट्रीय पहचान देते हुए उत्तराखंड की लोकसंस्कृति व साहित्य शैली को देश-दुनिया के सामने लाने की दिशा में भी हरीश रावत ने कुछ प्रयास किए लेकिन हरीश रावत के इकला चलो वाले अंदाज व उनके सहयोगी या सलाहकारों की दबंगई सत्ता पक्ष के ही एक खेमे को पसंद नहीं आयी। नतीजतन उत्तराखंड के इतिहास में पहली बार किसी राजनैतिक दल में बगावत का ऐलान हुआ और पहले सतपाल महाराज और फिर विजय बहुगुणा समेत सत्ता पक्ष के तमाम नौ विधायकों ने सरकार से अपना समर्थन वापस लेकर हरीश रावत सरकार को गिराने का प्रयास किया। यह ठीक है कि इस सारे झंझावात के अंत में हरीश रावत को एक बार फिर बा-जरिया न्यायालय, सरकार में बने रहकर बहुमत हासिल करने का आदेश मिला और उन्होंने इसे साबित कर लोकतंत्र की रक्षा भी की लेकिन इस सारे जोड़तोड़ में प्रदेश को न सिर्फ गंभीर आर्थिक संकट से जूझना पड़ा बल्कि कई सरकारी योजनाओं को बीच में ही छोड़ देना पड़ा। यह माना जा रहा था कि इस पूरे घटनाक्रम के बाद जनता की सांत्वना हरीश रावत को मिल सकती है और वह पुराने सभी नतीजों को नकारते हुए एक बार फिर सरकार बनाने का जनादेश प्राप्त कर सकते हैं लेकिन बहुमत साबित करने के बाद हरीश रावत ने जनादेश के लिए जनता के बीच जाने से सरकार में बने रहना ज्यादा नीतिकर माना और इस बार उनके सहयोगी व समर्थक कुछ ज्यादा ही निरंकुश दिखाई दिये। इसे सरकार का जमीनी स्तर पर विरोध कहें या फिर मोदी और अमित शाह का जादू लेकिन यह आश्चर्यजनक है कि चुनाव से पूर्व लगाई जा रही अटकलों से हटकर भाजपा उत्तराखंड में न सिर्फ भारी बहुमत से चुनाव जीती बल्कि उन तमाम पूर्व विधायकों व मंत्रियों को भी चुनावी जीत हासिल हुई जो ठीक चुनावों से पहले विभिन्न कारणों से कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे। इन चुनावों में प्रदेश के मुखिया हरीश रावत खुद भी दो विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव हार गए और विधानसभा में दस का आंकड़ा भी न छू सकी कांग्रेस एकाएक ही मुख्यधारा की राजनीति से कटती दिखाई दी। हालांकि यह कहना कठिन है कि भाजपा की इस जीत के पीछे वह कौन सी आश्चर्यजनक ताकत रही कि उसका कोई भी उम्मीदवार इस बार दस-पांच हजार के अंतराल से कम पर नहीं जीता और जीतने वाले उम्मीदवारों में अधिसंख्य संख्या अनुभवहीन नौजवानों व नये प्रत्याशियों की रही या फिर लगभग दस ऐसे लोग चुनाव जीते जिनका भाजपा की विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं था बल्कि कुछ राजनैतिक कारणों के चलते भाजपा ने उन्हें टिकट दिया था लेकिन इस सबके बावजूद इस तथ्य को नहीं नकारा जा सकता कि वर्तमान में भाजपा उत्तराखंड के सदन के भीतर न सिर्फ सबसे बड़ी ताकत है बल्कि उसे सदन में दो-तिहाई से ज्यादा बहुमत प्राप्त है और त्रिवेन्द्र सिंह रावत को हाईकमान ने इस सरकार का मुखिया नियुक्त किया है। यह ठीक है कि उपरोक्त सरकार अपने कार्यकाल के शुरूआती दौर से ही विपक्ष के निशाने पर है और एक कमजोर मुख्यमंत्री माने जा रहे त्रिवेन्द्र सिंह रावत के सम्मुख हरीश रावत के अलावा अपनी पार्टी के भीतर भी कई चुनौतियां हैं लेकिन इस सबके बावजूद त्रिवेन्द्र अपनी कुर्सी को लेकर ज्यादा चिंतित नहीं दिखते क्योंकि उन्हें मालूम है कि सत्ता के शीर्ष के लिए चल रहे घमासान को देखते हुए पार्टी हाईकमान द्वारा भी उन्हें हटाया जाना आसान नहीं है। शायद यही वजह है कि त्रिवेन्द्र सिंह रावत न तो अपने विरोधी गुटों को लेकर संजीदा हैं और न ही राज्य के विभिन्न हिस्सों में चल रहे कर्मचारियों, पंचायत प्रतिनिधियों, महिलाओं व समाज के अन्य वर्गों के आंदोलनों को सुलटाने में उनकी कोई दिलचस्पी नजर आ रही है। यह माना कि त्रिवेन्द्र अनुभवहीन है और उनके खिलाफ तमाम ऐसे लोग राजनैतिक मोर्चा साधे खड़े हैं जो किसी भी कीमत पर सत्ता के शीर्ष पद पर काबिज होना चाहते हैं लेकिन इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि मुख्यमंत्री बनने की चाहत पाले अन्य तमाम नेताओं का भी जनापेक्षाओं या जनाकांक्षाओं से कुछ लेना-देना नहीं है और न ही एक मुख्यमंत्री के रूप में कुछ विशेष कार्ययोजना पारित कर इतिहास में अमर हो जाने की चाहत उनके मन में हिलोरे मार रही है। अगर नेताओं के बयानों, काम करने के तरीकों या फिर उनके समर्थकों के अंदाज पर गौर करते हुए बात करें तो यह साफ हो जाता है कि सत्ता के शीर्ष पर काबिज होने की चाहत रखने वाले यह तमाम नेता प्रदेश के संसाधनों की लूट में अपनी भागीदारी चाहते हैं और यह तय हो चुका है कि प्रदेश की राजनीति में वर्तमान जंग सिर्फ और सिर्फ आर्थिक संसाधनों पर कब्जेदारी को लेकर लड़ी जा रही है। इसलिए इन तमाम नवोदित या अनुभवहीन नेताओं को अपनी लोकप्रियता या बदनामी की कोई चिंता भी नहीं है और न ही वह इस सोच के साथ पद पर काबिज हैं कि वर्तमान कार्यकाल में उन्हें मिली किसी भी तरह की राजनैतिक सफलता अथवा उपलब्धि उनके भविष्य के राजनैतिक उद्देश्यों का निर्धारण करेगी। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि उत्तराखंड के राजनैतिक क्षितिज में नित्यानंद स्वामी का सितारा डूबने के साथ ही साथ जनप्रिय एवं चर्चित नेता पं. नारायण दत्त तिवारी विलुप्त हो चुके हैं और भगत सिंह कोश्यारी व भुवनचन्द्र खंडूरी जैसे दिग्गजों को पार्टी हाईकमान ने राजनैतिक बनवास पर भेजने का मन बना लिया है। निशंक और हरीश रावत एक बार फिर अपनी आक्रामक पारी खेलने के मूड में तो नजर आ रहे हैं लेकिन यह निर्णय होना अभी बाकी है कि पार्टी हाईकमान द्वारा इन्हें यह मौका दिया भी जाएगा अथवा नहीं।

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