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Saturday, November 18, 2017

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आम आदमी के नजरिए से

विभिन्न परम्पराओं व धार्मिक मान्यताओं के बावजूद तीज-त्योहारों के मौसम में दिखने वाला सामाजिक उत्साह कराता है भारत के अनेकता में एकता वाले स्वरूप का अहसास।
हिन्दू धर्म की खासियत रही है कि उसने समय-समय पर होने वाले बदलाव को अंगीकार किया है तथा देश, काल व परिस्थिति के अनुसार सामाजिक मान्यताओं व पौराणिक परम्पराओं के अनुपालन के क्रम में इस धर्म के अनुयायियों ने हर सुधार व सुझाव को स्वीकारा है। शायद यही वजह है आदिकाल से वर्तमान तक कई किंतु-परंतु और धार्मिक संकट झेलने के बावजूद इस धर्म के अनुयायियों की न सिर्फ बड़ी संख्या है बल्कि दुनिया के लगभग हर कोने में इस धर्म के प्रति विशेष आकर्षण है। हालांकि जानकार लोग यह मानते हैं कि हिन्दू, समाज के सिर्फ एक हिस्से का धर्म नहीं है बल्कि जीवन जीने के एक तरीका है और जिसे यह तरीका रास आ जाए वो इसमें कई खामियां व सुधार की गुंजाइशें निकालने के बावजूद इससे जुड़ी अपनी मान्यताएं व परम्पराएं नहीं बदल पाता। व्यापक परिपेक्ष्य में देखें तो इसे कुछ इस तरह समझ सकते हैं कि विभिन्न धार्मिक व सामाजिक अवसरों पर आयोजित की जाने वाली पूजा पद्धति अथवा मान्यताओं को लेकर हमेशा अलग-अलग विचार प्रस्तुत करने वाली विचारधाराएं अपनी-अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर इन व्यवस्थाओं में बदलाव लाती रही हैं और समाज तार्किक आधार पर ठीक लगने वाली व्यवस्था को अंगीकार भी करता रहा है। ठीक इसी क्रम में यह जिक्र किया जाना भी आवश्यक है कि हमारी जीवन पद्धति बन चुके हिन्दू धर्म को भारतीय जनमानस ने कुछ इस तरह अंगीकार किया है कि मुगलकालीन हमलों या फिर ईसाई मिशनरी द्वारा मायाजाल फैलाकर किए गए धर्म प्रचार के बाद धर्म परिवर्तन करने वाला समाज त्योंहार मानने के तरीकों में बदलाव नहीं ला पाया है और भारत में ही जन्मने वाले तमाम धर्मगुरूओं व विभिन्न अन्य धर्मों या पंथों के प्रमुखों द्वारा भी इस तरह की तमाम मान्यताओं व तीज-त्योहार मनाये जाने से विरोध की कोई खबर नहीं मिलती। इधर पिछले कुछ वर्षों में धर्म को राजनीति का प्रमुख आधार बनाकर मिली सफलता से उत्साहित एक राजनैतिक विचारधारा द्वारा यह प्रयास जरूर किया जा रहा है कि वह हिन्दू धर्म में धार्मिक कट्टरवाद के नजरिए का समावेश करे और धार्मिक मान्यताओं व इस धर्म से जुड़े लोगों के सामाजिक तौर-तरीके का विश्लेषण अथवा आलोचना करने वाली विचारधारा का कट्टरता से विरोध करे लेकिन आम भारतीयों के जीवन में इस कट्टरवाद का कोई प्रभाव नहीं दिखता और त्योहारों के मौसम में या फिर मेले व सांस्कृतिक आयोजनों को लेकर वह कुछ इस तरह एकजुट हो जाते हैं कि इनमें फर्क करना मुश्किल होता है। यहां पर यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि तीज-त्योहार व हिन्दू संस्कृति से जुड़े तमाम तरह के आयोजनों को एक क्षेत्र विशेष तक सीमित रखने के स्थान पर इन्हें सर्वव्यापी बनाने व भारतीय संस्कृति पर पड़ रहे विदेशी प्रभाव के बावजूद कुछ छोटे-बड़े बदलाव के साथ इनके स्वरूप को बचाए रखने में भारतीय चलचित्र की प्रसिद्ध मुंबईया छाप फिल्मों और बाजारवाद की बड़ी भूमिका रही है और शायद यही वजह है कि संतोषी माता के वजूद या फिर करवाचैथ जैसे आयोजनों की कोई शास्त्रसंगत या तर्कसंगत मौजूदगी न होने के बावजूद भी इन्हें सामाजिक और धार्मिक मान्यता मिली हुई है तथा खुद को मार्डन अथवा आधुनिक विचारधारा से जुड़ी यथार्थवादी मानने वाली तमाम महिलाएं भी इस तरह के पर्वों व आयोजनों में खूब भागीदारी करती हैं। व्रत, परम्परा, पूजा-पाठ या फिर इस तरह के विभिन्न आयोजनों के क्या फायदे और नुकसान हैं अथवा पत्नी के भूखा रहने से पति की आयु कैसे बढ़ सकती है। इस सबके पीछे कोई तार्किक पक्ष नहीं है लेकिन बड़ी ही सुंदर कथाओं के जरिए समाज के तमाम पहलुओं को एक दूसरे से जोड़ते हुए लगातार यह बताने के कोशिश की जाती है कि रिश्तों की मधुरता को बनाए रखने के लिए जीवन में इस तरह के उत्सवों का आयोजन जरूरी है और आयोजन धर्मी भारतीय समाज अपनी आवश्यकता एवं देश-काल व परिस्थिति के अनुसार अपने मनोरंजन व मानसिक संतुष्टि के संसाधन ढूंढ ही लेता है। शायद यही वजह है कि राजनैतिक कारणों से चलते समाज के एक छोटे हिस्से द्वारा लगातार किए जाने वाले उग्र विरोध के बावजूद ईशू का जन्मदिन, अंगे्रजी नववर्ष पर देर रात तक होने वाले आयोजन व वेलेनटाइन जैसे समझ में न आने वाले अवसर हमारे लिए त्योहार का रूप लेने लगे हैं तथा अपने देश के ही भीतर दिखने वाले पूरब-पश्चिम के विभेद व सांस्कृतिक पक्षों में अंतर के बावजूद इंडिया, भांगड़ा या फिर वीहू का अंतर मिटने लगा है और हम अपने स्थानीय पर्वों के साथ ही साथ कुछ अवसरों व आयोजनों को लोक परम्पराओं के रूप में अंगीकार करते जा रहे हैं। भारत की एकता को प्रदर्शित करने के लिए देश की जनता द्वारा किया जाने वाला यह एक ऐसा प्रयास है जिसकी प्रशंसा की जानी चाहिए तथा देश के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में होने वाले तमाम धार्मिक व सांस्कृतिक आयोजनों को समाज के बीच लाया ही जाना चाहिए लेकिन इस तरह के प्रयोग करते समय हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि इनके मूल स्वरूप से बहुत ज्यादा छेड़छाड़ न हो या फिर इस तरह के आयोजन सिर्फ मंचीय प्रदर्शन और दिखावे की विषय वस्तु बनकर न रह जाए। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि भारतीय अर्थव्यवस्था में एक झटके से आयी तेजी और उदारवादी अर्थव्यवस्था को अंगीकार करने के बाद तेजी के साथ शहरों व कस्बों में तब्दील होते जा रहे गांवों ने हमारी दैनिक दिनचर्या, रहन-सहन व आयोजनों को बदला है तथा आधुनिकता के नाम पर विदेशी संस्कृति की ओर भाग रही हमारी नयी पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा एक बार फिर अपने देश व इसके सांस्कृतिक या सामाजिक पक्ष की ओर मुड़ने को मजबूर हुआ है क्योंकि संसाधनों के बढ़ने के साथ ही साथ हमारी लोकप्रियता भी अपने देश के भीतर ही नहीं बल्कि विदेशों तक में बड़ी है। इस अवसर पर अपनी संस्कृति के सांस्कृतिक पक्ष को मजबूती से थामे रहकर परम्पराओं में कुछ छोटे-मोटे बदलाव किए जाने की आवश्यकता महसूस हो सकती है और कुछ विशिष्ट अवसरों पर यह भी महसूस हो सकता है कि हमारे ही देश के भीतर मौजूद विभिन्न संस्कृतियां स्वयं को एक दूसरे से श्रेष्ठ साबित करने के लिए पारस्परिक प्रतिद्वंदिता की दिशा में आगे बढ़ रही हो लेकिन हमने इस द्वंद में उलझने के स्थान पर इन तमाम आयोजनों के माध्यम से मिलने वाली आत्मिक शांति को आत्मसात करना होगा और यह जानने की कोशिश करनी होगी कि अपने तौर-तरीकों में किस तरह छोटे-मोटे बदलाव लाकर हम अपनी परम्पराओं व लोकपर्वों को आगे आने वाली पीढ़ी के लिए उत्साहवर्धक बना सकते हैं। करवाचैथ का आयोजन इसी दिशा में एक प्रयास मालूम होता है तथा समाज के रणनीतिकारों ने बड़ी ही चतुरता के साथ मानव स्वभाव की कमजोरियों को परखते हुए इसे न सिर्फ महिलाओं के संजने-संवरने से जोड़ा है बल्कि व्रत रखने की एवज में उपहार देने की परम्परा को जन्म देकर पति और पत्नी के संबंधों को मजबूत करने की एक कोशिश भी की गयी है। हम देख रहे हैं कि कानूनी बाध्यताओं में बंधता जा रहा मानव जीवन एक मशीन होकर रह गया है तथा सामाजिक सरोकारों को जन्म देने वाले रिश्ते अब कानूनी बाध्यता का रूप लेते जा रहे हैं। हालातों के मद्देनजर यह जरूरी था कि मानव जीवन में एक नये उत्साह का संचार करने के लिए धार्मिक त्योहारों, पर्वों व आयोजनों को एक नया रूप दिया जाता और यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि करवाचैथ जैसे तमाम आयोजनों के पीछे कोई पौराणिक मान्यता अथवा हमारे धर्मग्रंथों में उल्लेखित कोई कहानी न होने के बावजूद इसे न सिर्फ एक लोकपर्व के रूप में स्वीकार किया गया है बल्कि सामाजिक मान्यताओं पर चलने वाली पुरानी पीढ़ी और आधुनिकता में रची-बसी नयी पीढ़ी को जोड़े रखने के लिए इस तरह के आयोजन एक धार्मिक सेतु का काम कर रहे है।

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