भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेन्स | Jokhim News

Thursday, October 19, 2017

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भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेन्स

जनता को भ्रमित कर मूल मुद्दों से ध्यान हटाना चाहती है भाजपा
उत्तराखंड के चारों ओर भ्रष्टाचार पर जीरो टाॅलरेन्स का हल्ला है और अपने छह माह के शासनकाल में पूरी तरह असफल करार दे दी गयी प्रदेश की वर्तमान सरकार इसी हल्ले के दम पर विपक्ष की ओर से मिल रही चुनौती का सामना करना चाहती है लेकिन सरकार की इस मंशा पर पूरी तरह पलीता लगाने में जुटी नौकरशाही की मंशा इन तमाम विषयों को लेकर ठीक नहीं है या फिर सत्ता पक्ष इस प्रकार बिना वजह के हल्ले के बलबूते विपक्ष पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहा है और सरकार की असल कोशिश मुख्य मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने की है। हमने देखा कि लगभग पूरे प्रदेश में सस्ता गल्ला विक्रेता, सरकार द्वारा गरीबों तक सस्ता राशन पहुंचाने व्यवस्था में किए गए अमूलचूल परिवर्तन के खिलाफ आन्दोलन कर रहे हैं और व्यवस्थाओं की समझ रखने वाले सरकारी तंत्र का भी मानना है कि बिना किसी पुख्ता इंतजामात के एक सुव्यवस्थित तंत्र में इतना बड़ा फेरबदल उन तमाम गरीबों व दूरस्थ क्षेत्रों में वास करने वाले ग्रामीणों को नुकसान पहुंचा सकता है जिन्हें इस व्यवस्था के सीधे लाभ के रूप में रियायती दरों पर सस्ता अनाज मिलने के चलते न सिर्फ आर्थिक दुश्वारियों से निजात मिलती थी बल्कि अन्न की कमी के चलते इनका चूल्हा ठण्डा भी नहीं पड़ता था लेकिन अब सरकार द्वारा किए गए व्यवस्था परिवर्तन के क्रम में इस बात की कोई गारंटी नहीं दिखती कि जनता को बाजार में सरकार द्वारा निर्धारित दरों पर राशन मिल भी पाएगा या नहीं या फिर परिवार का मुखिया सरकार द्वारा दी जाने वाली रियायत अथवा सरकारी अनुदान का उपयोग राशन व अन्य जरूरती सामान की खरीद के लिए ही करेंगा। हालातों के मद्देनजर यह तय है कि अगर जनता को यह तमाम खामियां और सरकार की मंशा समझ आ जाती है तो वह आंदोलन के माध्यम से सरकार के इस फैसले का विरोध कर सकती है तथा अपने गठन के साथ ही राज्य के लगभग सभी हिस्सों में शराब की दुकानों का विरोध झेल रही त्रिवेन्द्र सिंह रावत सरकार को एक नए मोर्चे पर जनता के सवालों से जूझना पड़ता। लिहाजा इन तमाम समस्याओं के समाधान के लिए सरकार ने एक बार फिर मोदी मंत्र का इस्तेमाल करते हुए उस पूरी व्यवस्था को ही बदनाम करने की ठानी है वर्तमान सरकार जिसमें वांछित सुधार चाहती है और इस पूरे खेल को शुरू करते वक्त हमेशा की तरह इस तथ्य को अवश्य ध्यान में रखा गया है कि सरकार के इस कदम से उन तमाम अधिकारी वर्ग को कोई परेशानी न हो जो सत्ता के शीर्ष पदों को संभालते रहे हैं। शायद यही कारण है कि सरकार द्वारा वर्तमान तक बर्खास्त बताये जा रहे कुमाऊं सम्भाग के आरएफसी को दिए गए सेवा विस्तार को उन्हें एक माह का अग्रिम वेतन देकर तत्काल प्रभाव से सेवानिवृत्त कर दिया गया और सारे मामले की गाज कुछ निचले स्तर के अधिकारियों व कर्मचारियों के सर पर मढ़कर मामले में लीपापोती की कार्यवाही शुरू हो गयी लेकिन इस सारे फेर में सरकार को विपक्ष के किसी भी प्रकार के विरोध अथवा जनता के संगठित आंदोलन से पहले यह हल्ला करने का मौका मिल गया कि पूर्ववर्ती सरकारें व सस्ता गल्ला विक्रेता आपसी तालमेल से बड़ा हेरफेर कर रहे थे और अब उस हेर-फेर की स्थिति में प्रभावी लगाम लगने के कारण विपक्ष बौखलाया हुआ है। इससे पूर्व सरकार ठीक ऐसा ही प्रयोग समाज कल्याण विभाग द्वारा पिछड़े व अल्पसंख्यक वर्ग के छात्रों को दिए जाने वाले वजीफे के संदर्भ में भी कर चुकी है और सरकारी कामकाज व पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा चलाई जा रही योजनाओं के ठीक-ठाक संचालन हेतु धन जुटाने में पूरी तरह असफल साबित हो चुकी वर्तमान सरकार छात्रवृत्ति से वंचित रह गए हजारों छात्रों के बारे में कोई भी स्पष्ट घोषणा करने के स्थान पर यह प्रचारित कर रही है कि बैंक खातों को आधार से लिंक करने समेत कई अन्य व्यवस्थाओं को दुरूस्त करने बाद एक बहुत बड़ी संख्या में फर्जी रूप से छात्रवृत्ति ले रहे छात्र सामने आए हैं लेकिन इन छात्रों की संख्या कितनी है और इनके खिलाफ क्या कार्यवाही की जा रही है, यह सब बताने से सरकारी तंत्र कतराता दिखता है और यह सब अपने आप में कोई अकेला मामला नहीं है बल्कि सरकार के कामकाज के तरीके या फैसलों से यह प्रतीत होता है कि अपनी पूर्ववर्ती सरकारों को बदनाम करते हुए भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेन्स के नाम पर सरकार एक अलग तरह का हव्वा खड़ा करने की कोशिश कर रही है। अगर शासन व्यवस्था पर गौर करें तो हम पाते हैं कि ठीक सरकार बनते वक्त सामने आए एनएच-74 घोटाले पर सीबीआई जांच को आगे बढ़ाए जाने की बात पर मुख्यमंत्री झूठे साबित हो चुके हैं और कुछ निचले क्रम के अधिकारियों व कर्मचारियों के निलम्बन व घेराबंदी के बावजूद तत्कालीन जिला अधिकारी को सूचना महानिदेशक जैसे महत्वपूर्ण पद से सुशोभित कर सरकार ने यह साबित कर दिया है कि वह अपने फायदे के लिए सिर्फ जनता या विपक्ष के नेताओं पर ही नहीं बल्कि नौकरशाहों पर भी दबाव डालने से पीछे नहीं हटेगी। अपने वर्तमान पद को संभालने के बाद यह पूर्व जिलाधिकारी व वर्तमान महानिदेशक सूचना किस अंदाज में काम कर रहे है यह एक अलग से चर्चा का विषय है लेकिन अगर हालातों, माहौल और कार्यशैली के अवलोकन के आधार पर गौर करें तो यह साबित हो जाता है कि अपनी उपलब्धियों को बढ़-चढ़कर बता रही सरकारी व्यवस्था की कोशिश भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेन्स की कतई नहीं है क्योंकि अगर ऐसा होता तो मुख्यमंत्री नयी सरकार के गठन के तत्काल बाद ही आहूत पहले विधानसभा सत्र में लोकपाल विधेयक को प्रवर समिति के विचार हेतु भेजने की सत्तापक्ष की आवाज को ठुकरा देते लेकिन वर्तमान सरकार ने अपने पहले विधानसभा सत्र के दौरान विपक्ष की सहमति के बावजूद न सिर्फ लोकपाल विधेयक को प्रवर समिति के विचार हेतु भेजा बल्कि सरकार द्वारा आहूत बजट सत्र के दौरान इस समिति हेतु निर्धारित अवधि पूरा होने के बावजूद भी इसे एक बार पुनः सदन के समक्ष विचार हेतु नहीं लाया गया। हमने देखा कि सत्ता पक्ष ने बड़ी ही चालाकी के साथ विपक्ष के विरोध को दरकिनार करते हुए एकाएक ही सत्र समाप्ति की घोषणा कर दी जिस कारण लोकजनहितकारी व राजनैतिक भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में सक्षम लोकपाल विधेयक पर कोई चर्चा ही नहीं हो सकी। यह तय दिखता है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बड़ी-बड़ी घोषणाएं करने वाली सरकारी व्यवस्था इस बार फिर नवम्बर माह में प्रस्तावित विधानसभा सत्र के दौरान लोकपाल व स्थानान्तरण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रस्तावित विधेयकों को सदन में खुली चर्चा के लिए रखने से बचने का प्रयास करेगी और अगर किन्ही विशेष कारणों से इन्हें सदन पटल पर प्रस्तुत करना भी पड़ा तो इनके पारित होने पर बनने वाले कानून को पहले ही नख-दंत विहीन कर दिया जायेगा। हम सबने देखा कि राज्य सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठे एक जनप्रतिनिधि ने खुद को सर्वशक्तिमान साबित करते हुए बिना कोई स्पष्ट कारण बताये एक वरिष्ठ नौकरशाह को उसकी अवकाश प्राप्ति की तिथि से लगभग नौ साल पहले स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति देते हुए उसे एक अन्य महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थमा दी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के आगमन पर पूरी चालाकी के साथ अपने एक चर्चित नौकरशाह व राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव को लम्बी छुट्टी पर भेजकर अपने ही दल के कार्यकर्ताओं की जुबान बंद कर दी। हालात यह इशारा कर रहे हैं कि जनतंत्र की आड़ में राजकाज कुछ वरिष्ठ नौकरशाह व उनके चमचे और दलाल चला रहे हैं तथा जनता के बीच से चुनकर आए जनप्रतिनिधियों को कुछ विशेष पाबंदियों के साथ लूट की छूट प्रदान की गयी है। इन हालातों में अगर सरकार या उसके समर्थक यह कहें कि भ्रष्टाचार के मामले में वह जीरों टालरेंस हैं तो यह मामला कुछ जमता हुआ सा प्रतीत नहीं होता क्योंकि अपने इन छह माह के कार्यकाल में सरकार अभी उन स्थितियों से एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी है जहां पूर्ववर्ती नेताओं या राजनैतिक दल ने छोड़ा था। लिहाजा बिना किसी काम के भ्रष्टाचार के किस्से सामने आने की कोई गुंजाइश ही नहीं है और रहा सवाल सरकार की नेकनामी का तो उसके चर्चे तो हम ढैंचा घोटाले को लेकर पूर्व में ही खूब कर चुके हैं।

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