नीतियों के आभाव में | Jokhim News

Thursday, October 19, 2017

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नीतियों के आभाव में

छोटे समाचार पत्रों व पत्रिकाओं पर मंडरा रहा है बंदी का खतरा ।
सरकारी योजनाओं के प्रसार-प्रचार के नाम पर होने वाली विज्ञापनों की लूट तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार अथवा विभिन्न राज्यों द्वारा इस मद में खर्च किया जाने वाला मोटा पैसा शक के दायरें में है क्योंकि सरकार द्वारा इस मद में किये जा रहे खर्च को किसी नियम अथवा व्यवस्था के क्रम में नही रखा जा सकता और न ही किसी नियम के हवाले से सरकारी तंत्र को बाध्य किया जा सकता है कि वह अपने कुल बजट का इतना हिस्सा मीडिया के इस क्षेत्र में खर्च करें। लिहाजा लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया से जुड़ा यह सरकारी उपक्रम पूरी तरह नौकरशाहों की तानाशाही और मनमर्जी पर चल रहा है तथा मीडिया मैनेजमेंन्ट के नाम पर कुछ बड़े बेनरों के साथ तालमेल बनाकर रखने को मजबूर सत्तापक्ष के नेता व अधिकारी कुछ दलालों के माध्यम से काम करने के आदी हो चुके है। हांलाकि इस विभाग की परिकल्पना करते वक्त ही यह ध्यान रखा गया होगा कि सरकार पर लगने वाले आरोंपो की स्थिति में मीडिया को अपने पक्ष में रखने के लिये तथा सरकार द्वारा चलायी जा रही योजनाओं का प्रचार-प्रसार कर किस प्रकार सरकार की वाहवाही की जाये लेकिन केन्द्र व विभिन्न राज्यों की सरकारों का इतिहास इस बात का इशारा भी करता है कि अपने इन मंत्रालयों के माध्यम से प्रदेश व केन्द्र की सत्ता पर काबिज रहे विभिन्न राजनैतिक दलों ने इस तथ्य को भी हमेशा ध्यान में रखने की कोशिश की कि सरकार की विज्ञापन प्रबन्धन की नीति से छोटे समाचार पत्रों व उनसे जुड़े अखबारों का मनोबल बना रहे और जनता एवं सरकार के बीच एक मजबूत कड़ी के रूप में काम करने वाले लघु समाचार पत्र अपने दैनिक खर्चों का वहन आसानी से कर सके। शायद यहीं वजह रही कि देश की आजादी के बाद तमाम लोगों ने पत्रकारिता को व्यवसाय की तरह अपनाया और देश के लगभग हर कोने में छोटे समाचार पत्रों व पत्रिकाओं की संख्या तेजी से बढ़ी। हांलाकि समाचारों के क्षेत्र में इलैक्ट्रानिक मीडिया व सोशल मीडिया की दखलदांजी के बाद स्थितियों में कुछ बदलाव अवश्य आया लेकिन अधिकांश राज्य सरकारों व केन्द्र सरकार ने इस कमी को अपना बजट बढ़ाकर पूरा करने का प्रयास किया लेकिन इधर पिछले कुछ वर्षो में मीडिया के क्षेत्र में हावी हुऐ बड़े कार्पाेरेट घरानो ने सरकार की इस व्यवस्था को तोड़ा है और विज्ञापन प्रकाशन की दिशा में कुछ सीमित समाचार पत्रों व इलैक्ट्रानिक चैनलों का एकाधिकार बढ़ा है जिसके चलते तमाम छोटे समाचार पत्र-पत्रिकाऐं लगभग बंदी के कगार पर पहुँच चुके है। यह ठीक है कि चारण पत्रकारिता के इस दौर में किसी भी सरकारी तंत्र से यह उम्मीद नही की जा सकती कि वह अपना फायदा छोड़कर किसी नियम अथवा व्यवस्था के दायरें में बंधकर नीति के तहत सरकार द्वारा दिये जाने वाले विज्ञापनों को सभी समाचार पत्रों या अन्य प्रचार-प्रसार के माध्यमों में आबंटित करें लेकिन यह माना जाता रहा है कि सरकार छोटे समाचार पत्रों के सहारे अपना जीवन यापन करने वाले तथाकथित रूप से बुद्धिजीवी वर्ग के साथ तालमेल बनाकर चलने का प्रयास करती है और विज्ञापनों के प्रकाशन अथवा सरकार की योजनाओं व नीतियों के प्रचार-प्रसार में पत्रकार जगत के हर वर्ग की मदद ली जाती है। लिहाजा पत्रकारों व छोटे समाचार पत्रों के हितों की रक्षा करने के नाम पर गठित तमाम पत्रकार संगठनों व ऐशोसियेशनों की जिम्मेदारी अब तक सीमित ही मानी जाती रही और यह माना गया कि इस प्रकार के संगठनों से जुड़े लोग गैरराजनैतिक होेते हुऐ भी अपने-अपने सम्पर्को व संसाधनों के बूते सरकार व पत्रकार जगत के बीच तालमेल बनाने की दिशा में सेतु की तरह काम कर रहे है लेकिन इधर पिछले कुछ वर्षों में हालत तेजी से बदले है और एक राष्ट्रीय राजनैतिक दल के रूप में भाजपा के केन्द्र व तमाम राज्यों की सत्ता में आने के बाद तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सरकारी तंत्र ने तमाम छोटे समाचार पत्रों व पत्रिकाओं को बंदी की कगार पर खड़ा करने का मन ही बना लिया है। यह माना कि सूचना एवं संचार क्रान्ति की दिशा में हुऐ बदलाव के बाद जहाँ समाचार पत्रों का प्रकाशन करना कुछ आसान होने के कारण इस दिशा में भागीदारी करने वालों की संख्या बढ़ी है वही पत्र-पत्रिकाऐं पढ़ने में रूचि रखने वाले पाठकों की संख्या तेजी से कम हुई है लेकिन शिक्षा के तेजी से बढ़ रहे प्रचार-प्रसार के चलते इस बदलाव का प्रकाशन के क्षेत्र में कोई बड़ा प्रभाव नही पड़ा और छोटे समाचार पत्रों का प्रकाशन व जनहितकारी समाचारों को जन-जन तक पहुँचाने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा किन्तु सरकारी स्तर पर आये बदलाव के चलते स्थितियाँ अब पहले की तरह सामान्य नही दिखाई देती बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि केन्द्र और विभिन्न राज्यों की सत्ता पर काबिज भाजपा अपने कार्यकर्ताओं के रूप में मौजूद बुद्धिजीवी वर्ग की सीमित संख्या को देखते हुऐ तमाम छोटे समाचार पत्रों व पत्रिकाओं के प्रकाशकों व पत्रकारों को वामपंथी या कांग्रेसी का दर्जा देेकर समाप्त कर देना चाहती है और इसके लिऐ सम्पूर्ण राष्ट्रीय स्तर पर विज्ञापन नियमावली लागू करने के नाम पर शोषण का एक नया सिलसिला शुरू किया गया है। बड़े समाचार पत्रों व मीडिया हाऊसों के कर्ताधर्ता पहले से ही यह मानते रहे है कि सरकार द्वारा विज्ञापन के रूप में दी जाने वाली धनराशि पर एकमात्र उनका हक है क्योंकि बढ़ी प्रसार संख्या के चलते उनकी पहुँच देश की जनता के एक बड़े हिस्से तक है और इधर पिछले कुछ वर्षों में सत्ता तंत्र से नजदीकी रखने वाले बड़े पूंजीपति घरानों के मीडिया क्षेत्र में दखल व तमाम इलैक्ट्रानिक चैनलों या समाचार पत्रों को धड़ल्ले से खरीदने के चलते हालातों पर और भी बुरा असर पड़ा है। लिहाजा यह तय है कि अगर तमाम छोटे व समाचार पत्र या पत्रिकाऐं जल्द ही एकजुट नही हुऐ तो उनपर बंदी की तलवार लटक जायेगी। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि सीमित प्रसार संख्या के बावजूद छोटे समाचार पत्र व पत्रिकाऐं देश की जनता के एक बड़े हिस्से में अपना प्रभाव रखते है और इनके सम्पादक रूपी प्रकाशकों के खुद ही संवाददाता के रूप में अपने-अपने कार्यक्षेत्रों में सक्रिय रहने के कारण यह हर छोटे-बड़े सामाजिक आन्दोलन व राजनैतिक बदलाव का बड़ा कारण रहते है। मौजूदा सरकार की इच्छा इन छोटे-छोटे प्रयासों के तौर पर तमाम छोटे प्रकाशनों को नियम व कानून की जद में लेकर उनका विज्ञापन बंद करने व उन्हें अपने संस्थानों पर ताला लगाने के लिऐ मजबूर करने की है तथा इस दिशा में काम भी शुरू कर दिया लगता है। ऐसा सिर्फ प्रकाशन के क्षेत्र में नही है बल्कि अगर विभिन्न स्तरों पर चल रहे काम धंधों व व्यापार पर एक नजर डाले तो हम पाते है कि सरकारी व्यवस्था, उदारवाद को अंगीकार करने के बाद धीरे-धीरे कर तमाम छोटे-काम धंधों को बंद कर इन्हें पूंजीपतियों के हवाले करने की ओर आगे बढ़ रही है। इसलिऐं छोटे समाचार पत्रों के सम्पादकों, स्वामियों, प्रकाशकों व पत्रकारों को अपना वजूद बचाने के लिऐ एकजुट होना व सरकार की नीतियों का विरोध करना एक मजबूरी बन गयी है लेकिन इस विरोध को किसी धरने, प्रदर्शन अथवा आन्दोलन के जरिये आगे नही बढ़ाया जा सकता बल्कि अपने अधिकारों की जंग लड़ने के लिऐ इस वर्ग ने अपने उस हथियार व रास्ते को ही धार देनी होगी जो उसने समाज के बीच अपनी बात रखने के लिऐ चुना है। यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि जनहितकारी समाचारों का सम्पादन करने के उपरांत अपने समाचार पत्रों को न्यूनतम् अथवा निशुल्क वितरित करना इन समाचार पत्रों की मजबूरी भी है और प्रकाशन व नाम को बचाये रखने के लिऐ जरूरी भी तथा इस तथ्य से भी इनकार नही किया जा सकता कि निर्भीक व स्वच्छ पत्रकारिता को नित नये आयामों तक पहँुचाने वाले इन तमाम समाचार पत्रों के स्वामियों व पत्रकारों के निजी सम्बन्धों व स्पष्ट लेखन के चलते जनता का एक बड़ा हिस्सा आज भी इन्हें पढ़ना पंसद करता है। लिहाजा छोटे समाचार पत्र अगर चाहे तो जनता की इसी पंसद को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हुऐं सरकार द्वारा विज्ञापन आंबटन नीति के नाम पर किये जा रहे अन्याय के खिलाफ न सिर्फ बिगुल फूँक सकते है बल्कि एक संगठित रूप से सरकार व बड़े मीडिया हाउसों के खिलाफ मुहिम छेड़ते हुऐ उनके इस दंभ को चकनाचूर कर सकते है कि बाजार पर अपने आघोषित कब्जे के चलते वह पाठक को वहीं समाचार पढ़ने के लिऐ बाध्य कर सकते है जो सरकार के पक्ष में उनके द्वारा प्रकाशित किया जा रहा है। यह तरीका थोड़ा लम्बा और दुश्वार जरूर है किन्तु अगर तमाम छोटे समाचार पत्रों व पत्रिकाओं के सम्पादक रूपी पत्रकार छोटे-छोटे समूह बनाकर इस लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एकजुट हो जाय तो आसानी से सरकारी तंत्र की किसी भी मनमर्जी के खिलाफ से लड़ा जा सकता है। अब यह इन समाचार पत्रों के प्रकाशकों, सम्पादकों और पत्रकारों को तय करना है कि वह सरकारी तंत्र के पिछलग्गू बनकर अपने हको की भीख मांगते हुऐ अपने संस्थानों को बंद होते देखना चाहते है या फिर सरकार की अन्यायपूर्ण नीति के खिलाफ जनता के बीच जाकर अपनी लड़ाई वाजिब व इतने वर्षो में मेहनत के उपरांत तैयार किये गये धारदार हथियार के बूते लड़ना पंसद करते है।

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