चिन्ता का विषय हो सकता है रावण का बढ़ता कद | Jokhim News

Monday, December 11, 2017

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चिन्ता का विषय हो सकता है रावण का बढ़ता कद

रामलीला मंचन और रावण के पुतला दहन को लेकर बढ़े जनता के उत्साह के बावजूद सामाजिक सरोकारों से दूर होते दिख रहे है भारतीय तीज-त्योंहार।

विजयादशमी के पावन पर्व पर असत्य पर सत्य की विजय के सांकेतिक प्रदर्शन के साथ रावण के पुतले का दहन एक पारम्परिक अनुष्ठान में तब्दील हो गया है और भगवान राम को एक आदर्श पुरूष मानने वाली भारतीय सभ्यता धार्मिक कर्मकाण्डों तक उलझकर रह गयी है। रामलीला का गाँव-देहात में मंचन करते हुऐ रामायण या रामचरितमानस में उल्लेखित तमाम छोटे-बड़े चरित्रों को जीवन्त रूप में जनसामान्य के सम्मुख रखने या फिर हर बार एक ही अंदाज में एक ही कहानी प्रस्तुत करने के पीछे हमारे पूर्वजों का क्या उद्देश्य रहा होगा और तत्कालीन समाज ने रावण का पुतला दहन कर तत्कालीन आबादी व आने वाली पीढ़ी को क्या संदेश देना चाहा होगा, यह तो पता नही लेकिन यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि वर्तमान में मनोरंजन के कई संसाधन होने के बावजूद देश के तमाम छोटे-बड़े मंचों पर आयोजित होने वाली रामलीलाऐं किसी भी प्रकार के मंचीय प्रदर्शन की अपेक्षा ज्यादा भीड़ जुटाऊ साबित होती है और हर सार्वजनिक आयोजन में एकत्र होने वाली भीड़ को अपने मतदाताओं या समर्थकों में बदलने के लिऐ आतुर दिखने वाले नेता इन रामलीलाओं के मंच का राजनैतिक उपयोग करने के लिऐ अपनी जी-जान लगा देेते है। हद तो यह है कि असत्य, अंहकार और आक्रामता से भरे दशासन के पुतले का दहन तमाम उन नेताओं या सत्तापक्ष के पदासीन व जिम्मेदार व्यक्तियों के कर-कमलों द्वारा किया जाता है जो स्वंय इन तमाम अवगुणों से लबालब नजर आते है जिनके भीतर जन्म ले चुका रावण बहुत तेज रफ्तार से आसमान छूने वाले अंदाज में आगे बढ़ रहा है। रामलीला के मंच पर नेताओं को सुशोभित किये जाने की परम्परा कब और कैसे शुरू हुई होगी या फिर इस परम्परा को जन्म देने वाली मानसिकता ने किन परिस्थितियों में एक धार्मिक मंच का राजनीतिकरण करने का निर्णय लिया होगा, यह तो पता नही लेकिन रामलीला जैसे बड़े खर्च वाले आयोजन को मद्देनजर रखते हुऐ यह तय दिखता है कि इस तरह के आयोजनों के माध्यम से राजनेताओं को महिमामण्डित किये जाने के पीछे सामाजिक कारणों से कहीं ज्यादा आर्थिक वजहें बलवती रही होगी और भगवान श्रीराम के नैतिक आदर्शों को अपने जीवन में उतारकर एक सामाजिक समन्वय कायम करने के स्थान पर उनके जन्मस्थल पर भव्य मन्दिर बनाने की चाह रखने वाले कुछ उत्साही कार्यकर्ताओं समेत धर्म के नाम पर आंडबर व दिखावे का ढ़िढ़ारों पीटने वाले धर्मभीरू समाज ने अपनी जरूरतों के हिसाब से इस तरह की परम्पराओं को जन्म दिया होगा लेकिन इस तरह का कोई भी फैसला लेते वक्त तत्कालीन अयोजकों को भी यह अहसास नहीं रहा होगा कि परम्पराओं व मान्यताओं में वक्त की जरूरत के हिसाब से किया गया इस तरह का कोई भी बदलाव रामलीलाओं के आयोजन अथवा रावण के पुतला दहन कार्यक्रम के उद्देश्यों को ही बदलकर रख देगा और भगवान श्रीराम अथवा लंकापति रावण का चारित्रिक विशलेषण करते वक्त इस तरह के मंचों पर मौजूद तमाम जनसेवकों, राजनैतिक कार्यकर्ताओं व तथाकथित समाजसेवकों के चरित्र या जीवनशैली पर भी कई तरह के सवाल उठने शुरू हो जायेंगे। लिहाजा अगर हम यह कहकर बात को टालना भी चाहे कि रामलीला के आयोजन की एक भव्य व पौराणिक व्यवस्था में समय के साथ ही साथ आये इस बदलाव को तत्कालिक परिस्थितियों के आधार पर लिये गये निर्णय के रूप में मान्य करते हुऐ इसमें सुधार की कई गुजांइशे है और देश, काल व परिस्थिति को मद्देनजर रखते हुऐ इस तरह के आयोजनों में कई सुधार किये जा सकते है, तो भी यह सवाल बार-बार मन में खटकता तो है ही कि हर वर्ष रावण को दी जाने वाली सजाये मौत के बावजूद हम अपने समाज को उन तमाम बुराईयों अथवा कमियों से दूर रखने में असफल क्यों है जिन्हें अंगीकार करने के कारण रावण पाप का भागी बना था। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि महापंडित एंव वेदों का ज्ञाता लंकापति रावण कई गुणों एवं शक्तियों से सुशोभित था तथा उसके अधिकार क्षेत्र में रहने वाली जनता अपने शासक के निर्णयों या राजकाज के तौर तरीकों से परेशान अथवा नाराज भी नही थी। अपने अपमान का बदला लेने के लिऐ अथवा माता सीता के रूप-सौंन्दर्य पर मोहित होकर उनका अपहरण करने के बावजूद रावण ने किन्हीं भी परिस्थितयों में अपने साम्राज्य में कैदी की हैसियत से रह रही सीता के सम्मुख बलात् बल प्रदर्शन की कोशिश भी नही की थी लेकिन इस सबके बावजूद अपने एक कुकृत्य की सजा उसे असामयिक मौत के अलावा जन्म-जनमान्तर तक मिलने वाले अपमान के रूप में झेलनी पड़ रही है और रावण के पुतले का दहन कर हम अपने जागरूक समाज को हमेशा से ही यह संदेश देने की कोशिश करते रहे है कि अन्ततोगत्वा सत्य ही विजयी होता है। सवाल यह है कि इस तरह के आयोजनों से हमें या हमारे समाज को क्या प्रेरणा मिलती है और लंका दहन से लेकर राम व विभीषण के राज्याभिषेक तक की कथा से हम किस तरह का सबक लेते हुऐ आगे बढ़ रहे है। यह प्र्रश्न स्वंय में महत्वपूर्ण है कि क्या रामराज्य की परिकल्पना में वह तमाम मानवीय सुख और संदेश समाहित है जो हमारे वर्तमान शासक अपनी प्रजा को देना चाहते है या फिर लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप में कुछ समयानुकूल व अमूलचूल परिवर्तन कर हम वर्तमान व्यवस्था को सुधार सकते है क्या यह आवश्यक नही है कि रामलीलाओं के मंचन के माध्यम से इस तरह के तमाम सामयिक विषयों व वर्तमान दौर की समस्याओं को जोड़ते हुऐ पारम्परिक व रटी-रटायी कहानी से कुछ आगे बढ़ा जाय और जनसामान्य के दिलोदिमाग पर सीधे असर करने वाली एक आदर्श पुरूष की लीलाओं का सहारा लेकर वर्तमान की सामाजिक व्यवस्थाओं व समाज में दिख रही खामियों पर सीधे चोट की जाये। हमारा दुर्भाग्य है कि एक आदर्श कथा का बार-बार मंचन करने अथवा बुराईयों के अंत के रूप में रावण के पुतले का दाह संस्कार करने के बावजूद हम व हमारा समाज एक मशीनी अंदाज में तमाम सामाजिक बुराईयों को अंगीकार करते हुऐ आगे बढ़ते रहने को अभिशप्त है क्योंकि हमारे नीतिनिर्धारक यह नही चाहते कि हम अपने अधिकारों व सामाजिक स्तर पर संभव सुधारों के बारे में उससे एक कदम भी आगे सोचे जो वर्तमान व्यवस्था के रूप में भारत के लोकतंत्र व तथाकथित रूप से बनने वाली लोकतांत्रिक सरकारों में हमें दिये है। शायद यहीं वजह है कि रावण के पुतला दहन से लेकर श्रीराम के राज्यभिषेक तक विभिन्न चरणों में होने वाले धार्मिक व सामाजिक उत्सवों को मनाने व उनमें भागीदारी करने के तौर-तरीकों में समय-समय पर राजनैतिक दखलदांजी की जाती रही है और राजनीतिज्ञों व सत्ता की बागडोर संभालने वाले तमाम शीर्ष नेताओं द्वारा इस तरह के अवसरों पर बिना वजह के मुद्दे उछालकर देश की जनता को एक ही लीक पर सोचने के लिए मजबूर किया जाता रहा है। सवाल यह है कि क्या रामायण और महाभारत समेत तमाम पौराणिक ग्रंथों को एक धर्म विशेष व सभ्यता या संस्कृति से जोड़कर देखने के स्थान पर इस तरह के आयोजनों का उपयोग व भारतीय तीज-त्योहारों को मनाये जाने के तौर-तरीकों का इस्तेमाल सामाजिक व्यवस्था में सुधार व सम्पूर्ण मानव जगत के जीवन के उद्देश्यों के निर्धारण में नहीं किया जा सकता है। अगर गंभीरता से गौर करें तो तमाम पौराणिक गरंथ व चर्चित किस्से कहानियां यह इशारा करती प्रतीत होती हैं कि जीवन की आपाधापी में तेजी से आगे बढ़ रहा हमारा सभ्य समाज अपने अंतिम लक्ष्य व जीवन के निहितार्थों को हमेशा स्मरण में रखे और पाप-पुण्य, जीवन-मरण या फिर सत्य-असत्य से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर गंभीरता से गौर करते हुए अपना आगे का मार्ग चुने लेकिन अफसोसजनक है कि हमने अपने समाज के बीच प्रचलित पौराणिक कथा-कहानियों को किस्सागोई व मनोरंजन के संसाधनों में तब्दील कर दिया है और सामाजिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर भागीदारी करने का दावा करने वाले हमारे अग्रणियों की रूचि इन पारम्परिक आयोजनों के समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को चिन्हित करने में नहीं बल्कि इनको भव्य स्वरूप देकर वाहवाही लूटने तक सीमित होकर रह गई है। नतीजतन रावण व उसके सहोदरों के पुतलों का कद साल दर साल बढ़ता जा रहा है और समाज में बढ़ रही बुराईयों व आपराधिक ग्राफ में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी के बावजूद हम इस बात पर हर्ष मना रहे हैं कि इस बार फिर एक पारम्परिक आयोजन को पहले से ज्यादा भव्य स्वरूप के साथ अंजाम दिया गया।

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