बदलते हुऐ भारत के परिपेक्ष्य में। | Jokhim News

Thursday, October 19, 2017

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बदलते हुऐ भारत के परिपेक्ष्य में।

आज भी प्रासंगिक है भगत सिंह के विचार
केसरिया बाना पहनकर हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़ जाने वाले भगत सिंह आज भी जनचर्चाओं का विषय है तथा देश की युवा पीढ़ी के बीच सर्वसुलभ दिखने वाली भगतसिंह की लोकप्रियता एंव उनके आर्दशों को जानने के लिऐ समाज के एक हिस्से में दिखने वाले जुनून को देखते हुऐ जनमत की राजनीति करने वाले तमाम राजनैतिक दलों के बीच कुछ विशिष्ट अवसरों पर भगत सिंह को अपनाने व उनका सम्मान करने की होड़ सी लग जाती है और ऐसा प्रतीत होता है कि भारत के नेता व राजनैतिक दल अपनी मातृ भूमि पर सर्वस्व समर्पित करने के लिऐ उतावले हो रहे है लेकिन हकीकत इससे कोसो दूर है और शायद यहीं वजह है कि भगत सिंह को जानने, समझने व उनका सम्मान करने का दावा करने वाली तमाम राजनैतिक विचारधाराऐं इस महान क्रान्तिकारी विचारक का नाम आते ही इसके हाथ में एक पिस्तौल थमा इसे उग्रपंथ का नायक बना देती है जबकि अगर हकीकत पर गौर किया जाय तो लेनिन व माक्र्स को लेकर भगत सिंह के दृष्टिकोण और जेल में रहकर उनके द्वारा लिखी गयी पातियों पर एक नजर डालने मात्र से यह स्पष्ट हो जाता है कि भगत सिंह ने कभी भी हथियारों के दम पर आजादी पाने या फिर अराजकता व उन्माद की स्थिति पैदा करने की बात नही की थी बल्कि वह तो हथियारों व गोला-बारूद का उपयोग देश की जनता, तत्कालीन सरकार और तथाकथित रूप से लोकतंत्र की लड़ाई लड़ रहे नेताओं का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिऐ करने के पक्षधर थे। यहीं कारण रहा कि तत्कालीन कांगे्रस ने भगत सिंह को कभी स्वीकार नहीं किया और जनता की आवाज बनकर अंग्रेजों की नाक में दम करने वाले राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचन्द्र गांधी अनेक अवसरों पर भगत सिंह व उनके साथियों द्वारा लिये गये फैसलों के विरोध में दिखे लेकिन यह विरोध भगत सिंह की विचारधारा का विरोध नही था बल्कि गांधी व उनके समकालीन अन्य कांग्रेस के नेताओं को सुनने व समझने से यह पता चलता है कि अपने अध्ययन व वैचारिक दृढ़ता के चलते उम्र से कहीं आगे निकल जाने वाले भगत सिंह को लेकर कांग्रेस के भीतर भी वैचारिक कौतुहल की स्थिति थी और शायद यहीं वजह रही कि कांग्रेस कभी चाहकर भी भगत सिंह को अपने साथ शामिल नही कर पायी। कांग्रेस ने कभी भगत सिंह की विरासत पर दावा भी नहीं किया और देश की आजादी के बाद एक राजनैतिक संगठन के रूप में चुनाव मैदान में उतरते वक्त कांग्रेस के तमाम छोटे-बड़े नेताओं ने भगत सिंह के जनमानस पर प्रभाव से अवगत होने के बावजूद यह कोशिश भी नही की कि वह भगत सिंह के बलिदान व विचारधारा का कांग्रेंसीकरण कर जनमत जुटाने का प्रयास करें लेकिन एक ओजस्वी क्रान्तिकारी के रूप में देश में बनने वाली तमाम कांगे्रसी सरकारों ने हमेशा भगत सिंह की विचारधारा का समर्थन किया और शायद यहीं वजह रही कि लंबे समय तक देश की सत्ता पर काबिज रहने के बावजूद कांग्रेस हमेशा वामपंथी विचारकों के साथ बेहतर तालमेल बनाकर चलती रही। हांलाकि इस दौर में माक्र्स, लेनिन और माओ के नाम पर सशस्त्र संघर्ष व उग्रवाद को भी पोषण मिला और भगत सिंह के सिद्धान्तों की समझ रखने की बात करने वाले कुछ लोगों के समूह ने उनके सपनों का भारत बनाने के नाम पर युवाओं को बहलाने व उन्हें हथियारबंद संघर्ष की ओर धकेलने का भी प्रयास किया लेकिन इन तमाम विचारधाराओं का भगत सिंह के सिद्धान्तों व नजरिये से कोई तालमेल न होने के कारण, इस तरह के प्रयास ज्यादा कारगर साबित नही हुऐ और छुटपुट नागरिक संघर्षो को अगर छोड़ दिया जाय तो हम गर्व से कह सकते है कि भगत सिंह को जानने व समझने का दावा करने वाली विचारधारा से तथाकथित रूप से प्रभावित कुछ छोटे समूहों की अपेक्षाकृत देश की जनता विशेषकर युवा वर्ग ने भगत सिंह को ज्यादा गहनता के साथ समझा और देश के लगभग हर हिस्से में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को मजबूती मिली। इस दौर में भगत सिंह के विचारों का विश्लेषण करने वाले तथा माक्र्स, लेनिन या फिर माओ की विचारधारा का समर्थन करने वाले अधिकांश वामपंथी विचारकों ने घोषित या अघोषित रूप से यह माना कि भगत सिंह का संघर्ष एक लोकतांत्रिक भारत के निर्माण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिऐ किया गया एक सैद्धान्तिक संघर्ष था जिसमें उनके व उनके साथियों द्वारा हथियारों का प्रतीकात्मक प्रयोग किया गया और बच निकलने या फिर भाग जाने के कई मौके होने के बावजूद इन बहादुर लोगों ने देश एवं दुनिया के अधिकतम् लोगो तक अपनी बात पहुँचाने के लिऐ हँसते-हँसते अपने प्राणोे का बलिदान करना ज्यादा जरूरी समझा। लिहाजा देश में घोषित व अघोषित रूप से काम कर रही तमाम वामपंथी पार्टिया राजनैतिक दलो के रूप में अस्तित्व में आयी और उन्होंने भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर अपना विश्वास जताते हुऐ चुनाव के माध्यम से सरकार बनाने की प्रक्रिया में भागीदारी करना स्वीकार किया लेकिन कुछ तथाकथित कट्टरवादी ताकतों को वामपंथ का यह लोकतांत्रिक स्वरूप पसन्द नही था और न ही उन्हें यह उम्मीद थी कि समाजवाद, जनवाद या साम्यवाद से गूँजते सुरों के बीच जन का कोई हिस्सा उनके कट्टरवादी तौर-तरीकों पर अपना विश्वास व्यक्त करेगा। लिहाजा भगत सिंह के केसरिया बाने का भगवाकरण करते हुऐ उनकी विरासत पर अवैध कब्जेदारी की कोशिशें तेज की गयी लेकिन यह ध्यान रखा गया कि भगत सिंह की बात करने वाली युवा पीढ़ी या फिर उनके इस भगवा अंदाज से प्रभावित जनता के बीच भगत सिंह के विचारों की नहीं बल्कि उनकी पिस्तौल की चर्चा हो और इसके लिऐ गांधी को निशाना बनाना आवश्यक समझा गया। इतिहास के पन्नों में कहीं यह दर्ज नही है कि गांधी और भगतसिंह के बीच कोई वैचारिक मतभेद था या फिर अंहिसा के नियम का अनुपालन करने वाले गांधी ने सशस्त्र क्रान्ति के जरिये अपनी आवाज जनता तक पहुँचाने की कोशिश करने वाली विचारधारा का खुला विरोध किया था लेकिन खुद को गोड्से की विचारधारा का प्रतिनिधि कहलाना पसंद करने वाले राजनैतिक चेहरों ने भगत सिंह को अपने पाले में खींचने के लिऐ गांधी और भगतसिंह के बीच मतभेद की खबरों को खूब हवा दी और भगत सिंह के विचारों को एक तरफ रखकर उनके चित्र पर माल्यार्पण के जरिये ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की गयी कि मानो भगत सिंह के सिद्धान्तों व विचारधारा से ज्यादा महत्वपूर्ण वह केसरिया बाना था जिसे उन्होंने फाँसी का फंदा चूमने से पहले धारण किया था। वर्तमान परिपेक्ष्य में भगत सिंह एक बार फिर महत्वपूर्ण हो उठे है और युवा मतदाताओं व छात्रों की बड़ी संख्या के साथ जवान होते जा रहे भारत को अपनी आबादी के एक बड़े हिस्से के रूप में शामिल बेरोजगार, मजदूर, गरीब व बेसहारा वर्ग की चिन्ता सताने लगी है लेकिन सिर्फ और सिर्फ सत्ता पर कब्जेदारी बनाये रखने की इच्छुक राजनैतिक ताकतें युवाओं को बहलाने एवं भटकाने के लिऐ भगत सिंह का बेहतर उपयोग करते हुऐ वामपंथ का एक कुरूप चेहरा प्रस्तुत करने में लगी है। इन हालातों में हमारे शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों व भगत सिंह से सैद्धान्तिक रूप से सहमत राजनैतिक ताकतों की जिम्मेदारी है कि वह मतिभ्रम की इस स्थिति से युवा पीढ़ी को बचाये और महान क्रान्तिकारी विचारक भगत सिंह को हथियार बंद उग्र युवा की छवि से बाहर निकालकर एक साम्यवादी चिन्तक के रूप में स्थापित करें।

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