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Thursday, October 19, 2017

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सुरक्षा से जुड़े सवाल पर

राज्य गठन के बाद मजबूत हुऐ राजनेता, नौकरशाह, माफिया और पत्रकारों के गठबंधन ने आम आदमी का जीना किया मुहाल।
आपराधिक दृष्टिकोण से शान्तप्रिय माने जाने उत्तराखंड में पिछले कुछ समय से न सिर्फ जघन्य अपराधों की संख्या बढ़ी है बल्कि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश समेत देश के अन्य हिस्सों के कुख्यात अपराधियों व आंतकी गतिविधियों में लिप्त राष्ट्रद्रोहियों की शरणास्थली बनता जा रहा उत्तराखंड बारूद के ढ़ेर पर खड़ा दिख रहा है। हांलाकि अभी तक उत्तराखंड में कोई बड़ी आतंकी घटना सामने नही आयी है और न ही इस पर्वतीय प्रदेश में किसी आंतकवादी संगठन की सक्रियता की खबर है लेकिन देश के विभिन्न हिस्सों में घट रही र्दुदांत घटनाओं व इनसे जुड़े अपराधियों के तार जिस तरह उत्तराखंड से जुड़ते नजर आते है उसे देखते हुऐ यह साफ लगता है कि यहाँ की स्थानीय पुलिस व प्रशासन को विशेष रूप से सतर्क रहने की जरूरत है। यह ठीक है कि अपराध और पुलिस व्यवस्था का चोली-दामन का साथ है और अक्सर यह देखा गया है कि राज्य में सुरक्षा एवं कानून के अनुपालन की व्यवस्था को पटवारी पुलिस से हटाकर जिन क्षेत्र को सिविल पुलिस के हाथों में दिया गया है वहाँ अपराधों व कानून के साथ खिलवाड़ का आंकड़ा तेजी से बढ़ा ही है लेकिन सामान्य स्थितियों में सरकार व तंत्र के पास इस समस्या का कोई निदान नही है और उत्तराखंड में बढ़ते जा रहे अपराधों के ग्राफ को देखकर ऐसा लग रहा है कि इस प्रदेश में पटवारी पुलिस की व्यवस्था जल्दी समाप्त हो जायेगी तथा स्थानीय पुलिस अपने रूटीन कामकाज वाले अंदाज में इस तमाम व्यवस्था को संभाल लेगी। नया राज्य होने के कारण पिछले कुछ वर्षो में उत्तराखंड पुलिस में बम्बर भर्ती हुई है और आगे भी इसके बने रहने के आसार है क्योंकि उत्तर प्रदेश से बंटवारे के वक्त राज्य को मिले तमाम पुलिसकर्मी या तो अवकाश प्राप्त कर चुके है या फिर इसकी कगार पर है। लिहाजा उत्तराखंड की पुलिस को अन्य राज्यों की अपेक्षा जवान, जहीन व ज्यादा पढ़ी-लिखी माना जा सकता है और राज्य में कार्यरत् अधिकांश पुलिस कर्मियों की शालीनता व भाषा शैली को देखते हुऐ यह विश्वास भी किया जा सकता है कि इस राज्य के सरकारी तंत्र ने जनसामान्य की जरूरत व सुविधा का ध्यान रखते हुऐ मित्र पुलिस का गठन किया है लेकिन यहीं मित्र पुलिस वरीष्ठ स्तर पर पड़ने वाले राजनैतिक दबाव तथा स्थानांतरण के कष्ट से बचने के लिऐ कभी-कभी सत्ताधारी राजनैतिक दल के कार्यकर्ताओं की भांति काम करने लगती है और ऐसा प्रतीत होता है कि सम्पूर्ण राज्य में पुलिस नामक सरकारी संस्थान का गठन सिर्फ व सिर्फ कुछ साधन सम्पन्न व्यक्तित्वों व सत्तापक्ष के आला पदाधिकारियों की सुविधा को देखते हुऐ किया गया है। राज्य में घटित न्यूनतम् अपराधों के बावजूद अधिकांशतः संगीन अपराधों व अपराधियों का खुलासा करने में असफल दिखने वाली उत्तराखंड पुलिस में जैसे-जैसे अधिकारियों का कद व उच्चस्तरीय पदों की संख्या बढ़ रही है, ठीक उसी अंदाज में राज्य गठन के बाद से वर्तमान तक नशे का कारोबार भी तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है ओर हद तो यह है कि नशे के कारोबार समेत तमाम अन्य दिल दहला देने वाले अपराधिक कृत्यों में अंधिकांशतः वह अपराधी या चेहरे ही शामिल होते है जिनका उत्तराखंड से कोई लेना-देना नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि इन तमाम आपराधिक चरित्रों को स्थानीय जनता के साथ बेहतर ताल-मेल बनाकर आसानी से अलग-थलग किया जा सकता है और जुर्म होने के बाद इनकी गिरफ्तारी या फिर लम्बी सजा के लिऐ आवश्यक ठोस सबूतों व अकाट्य साक्ष्यों को जुटाना भी पुलिस के लिऐ कठिन नही है लेकिन अधिकांश मामलों में देखा गया है कि इन अपराधिक तत्वों के राजनैतिक कनैक्शन पुलिस की कार्यवाही को रोकने अथवा उसे धीमा करने के लिऐ बाध्य करते है। इन हालातों में यह सवाल तुरन्त उठ खड़ा होता है कि आॅखिर वह कौन से कारण है जिनके चलते हमारे जनप्रतिनिधि या सत्ता के शीर्ष पदों में बैठे लोग पेशावर मुजरिमों व अपराधियों की पैरोकारी को मजबूर होते है। इस तरह की कोई भी तलाश आपको आसानी के साथ पहाड़ में चल रही आर्थिक संसाधनों की लूट तथा इस लूट में भागीदार बनने को उत्सुक सत्तापक्ष एवं विपक्ष के कई नेताओं के इर्द-गिर्द ले जाकर खड़ा कर देती है और किसी भी मामले की तह में जाने की कोशिशों के तहत यह बहुत ही आसानी से समझा जा सकता है कि एक लंबे संघर्ष के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आये उत्तराखंड राज्य में राजनीति की आड़ में क्या-क्या खेल खेल जा रहे है। राज्य निर्माण के बाद यहाँ तेजी से पनपे भू-माफिया, राजनेता, नौकरशाह और पत्रकार के गठजोड़ ने आर्थिक संसाधनों की दृष्टि से मजबूत उत्तराखंड में खूब उत्पात मचाया तथा एक-डेढ़ दशक के भीतर ही राज्य में एक ऐसी मजबूत लाॅबी खड़ी हो गयी जिसका न सिर्फ हर वैध-अवैध धंधे में दखल है बल्कि अपने अधिकार क्षेत्र में स्थानीय युवाओं व उत्तराखंड के मूल निवासियों की दखलदांजी जिन्हेें कतई बर्दाश्त नही है। लिहाजा राज्य एक वर्ग संघर्ष की ओर बढ़ रहा है और शायद यह पहली बार है जब एक वरीष्ठ नौकरशाह, एक विवादित पत्रकार एवं एक स्थानीय महिला नेत्री एक साथ अपनी जान को खतरें में बताते हुऐ अपनी सुरक्षा को लेकर बैचेंन है। हांलाकि सरकारी तंत्र द्वारा वी.आई.पी. के नाम पर सरकारी सुरक्षाकर्मी निशुल्क मुहैय्या कराना कोई नई बात नही है और तमाम छुटभय्यै नेता अपनी शेखी बघारने के लिऐ एक-दो सुरक्षाकर्मी लेकर इस व्यवस्था का नाजायज लाभ भी उठाते रहे है लेकिन जब सत्ता पक्ष की विदुषी महिला नेत्री किसी वरीष्ठ आईपीएस अधिकारी व उनकी पत्नी पर गंभीर आरोंप लगाते हुऐ अपनी जान को खतरे में बताये या फिर शासन में तैनात कोई वरीष्ठ आईएस अधिकारी खुद पर हमले की आंशका जाहिर करें तो यह मानकर चलना चाहिऐं स्थितियाँ अब नियन्त्रण से बाहर होती जा रही है और सत्ता के शीर्ष पदो पर बैठे तमाम बड़े चेहरे सबकुछ जानते हुऐ भी अनजान बनने की कोशिश कर रहे है। यह ठीक है कि बंदर भगाने की एवज में किये गये धमाकों को खुद पर संभावित हमले की तरह लेने वाले विशिष्ट सुरक्षा श्रेणी से घिरे एक तथाकथित पत्रकार के संदिग्ध आचरण व उसपर पूर्व में लगते रहे आरोंपो को देखते हुऐ उपरोक्त पत्रकार द्वारा पुलिस में दी गयी शिकायत को गंभीरता से नही लिया जा सकता लेकिन अगर तमाम घटनाक्रमों, माहौल व आपराधिक गतिविधियों को एक समान नजरिये से देखने की कोशिश करें तो हम पाते है कि उत्तराखंड की पुलिस के पास अपने रूटीन काम व वीआईपी सुरक्षा का जिम्मा ही इतना ज्यादा है कि उसे अपने आस पास एक के बाद एक कर घट रहे घटनाक्रमों की विवेचना करने की फुर्सत ही नही मिलती। इन हालातों में आम आदमी या फिर विचारधारा एवं भावनात्मक ज्वार भाटे के चलते किसी राजनैतिक दल की सामान्य कार्यकर्ता से लेकर एक महत्वपूर्ण पद तक पहुँची भाजपा की मीडिया प्रभारी शोभना स्वामी रावत जैसी हस्तियों के लिऐ यह एक बड़ी दिक्कत का विषय हो सकता है कि वह अपनी सुरक्षा की अरदास लेकर कहाँ जाये।

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