संघर्ष नही अब रण होगा | Jokhim News

Thursday, October 19, 2017

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संघर्ष नही अब रण होगा

पूरे देशा में फैलती दिख रही बीएचयू की छात्राओं के आन्दोलन की आग सत्तापक्ष की घटती साख की दृष्टि से चिन्ताजनक।
बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ का नारा देने वाली केन्द्र सरकार के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में विश्वविद्यालय की छात्राऐं आन्दोलनरत् है और उनके समर्थन में देशभर के तमाम विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत् छात्र सड़कों पर उतरने का मन बनाते दिख रहे है। विद्यार्थियों का आन्दोलन इस देश के लिऐ कोई नई बात नही है और अपनी तमाम जायज-नाजायज मांगो के अलावा यह छात्र-छात्राओं के समूह तमाम राष्ट्रीय मुद्दों व राजनैतिक बदलाव को लेकर भी सड़कों पर उतरते रहते है लेकिन यह पहली बार है जब एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय की छात्राओं ने विश्वविद्यालय परिसर में अपने साथ होने वाली छेड़छाड़ व छीटाकंशी को मुद्दा बनाते हुऐ आन्दोलन का मार्ग अख्तियार किया और समस्या ने कुछ इस तरह तूल पकड़ा कि आन्दोलन की यह चिंगारी सारे देश में फैलती दिख रही है। हांलाकि सत्तापक्ष के समर्थक और राजनीति के भगवाकरण की मानसिकता से ओत-प्रोत भाजपाई व मोदी समर्थक पूरे देश में फैलते दिख रहे विद्यार्थियों के इस आन्दोलन को वामपंथियों समेत समुचे विपक्ष की सोची-समझी रणनीति का एक हिस्सा बता रहे है और सरकार समर्थक नेताओं व छात्र संगठनों द्वारा यह साबित करने का प्रयास किया जा रहा है कि देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपने निर्वाचन क्षेत्र की प्रस्तावित यात्रा को देखते हुऐ यह कुचक्र रचा गया लेकिन आन्दोलनरत् छात्राओं पर मुद्दे के राजनीतिकरण का आरोप लगाने वाले विपक्ष के पास छात्रों की समस्या व छात्राओं द्वारा प्रस्तुत किये जा रहे तथ्यों का कोई जवाब नजर नही आता और ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने अपनी जिद व जल्दबाजी के चलते एक छोटे मुद्दे को हवा देकर खुद ही अपने पांव में कुल्हाड़ी मारने का मन बनाया है। यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि छात्र राजनीति का भगवाकरण करने के प्रयासों के तहत भाजपा की रणनैतिक सहयोगी राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ ने अपने अनुषांगिक संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को आगे कर देश के लगभग सभी महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों के छात्र संघ चुनावों में दखलदांजी करने का प्रयास किया है और यह वैचारिक संघर्ष के अलावा पिछले तीन-चार वर्षो में मिले सत्ता पक्ष के आर्थिक व रणनैतिक सहयोग की बदौलत इस तथाकथित हिन्दूवादी छात्र इकाई ने अपने जनाधार में तेजी से वृद्धि भी की है लेकिन इधर पिछले कुछ अंतराल से छात्र राजनीति को तथाकथित राष्ट्रवाद व उग्र हिन्दूवाद से जोड़कर चल रहे छात्र नेता अराजकता की हदें पार करते दिख रहे है और सत्ता के शीर्ष पदो को पाने के लिऐ उन्हें छात्र हितों के लिऐ संघर्ष के स्थान पर गुण्डई व अराजकता के बल पर अपना जनाधार बढ़ाने में भी कोई बुराई नजर नही आ रही है। परिणाम स्वरूप अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ही नहीं बल्कि भाजपा व संघ से सम्बद्ध तमाम अनुषांगिक संगठनों में मतलबपरस्त, अराजक व आपराधिक मानसिकता वाले समूहों को बोलबाला बढ़ा है और चारणदास वाले अंदाज में सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों विशेषकर मोदी की स्तुति करते हुऐ तेजी के साथ आगे बढ़ने के लिऐ इन्हें संघ के मूल सिद्धान्तों की अवहेलना करने से कोई परहेज नही दिखता। नतीजतन विपक्षी विचारधारा वाली महिलाओं के लिऐ अपशब्दों का इस्तेमाल तथा अपने प्रभावक्षेत्र में दखलदांजी करने वाले अन्य संगठनों के साथ गाली-गलौच, हाथापाई या फिर गुण्डई वाले अंदाज में झगड़ा करना इन तमाम तथाकथित भक्तों अर्थात चारणदासों के लिऐ साधरण सी बात है लेकिन छात्र राजनीति में इस तरह के प्रयोगों के चलते विद्यार्थी परिषद के प्रति आस्था रखने वाले छात्र मूल मुद्दों से भटकते दिखाई दे रहे है और छात्र संघ चुनावों में जीत हासिल करने व अपने आकाओं के समक्ष अपना जनाधार साबित करने के लिऐ इन्हें किसी भी किस्म की गुण्डई से कोई परहेज नही दिखता जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान में विश्वविद्यालय कैम्पस के भीतर ही छात्र दो गुटो में बंटे दिखाई देते है और ज्वलंत मुद्दों व सामाजिक समस्याओं को लेकर दिया जाने वाला बदलाव का हर नारा विश्वविद्यालय स्तर पर ही मध्यम होता सुनाई दे रहा है। शुरूवाती दौर में विपक्ष ने राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के इस तरह के तमाम प्रयासों को गंभीरता से नही लिया और यह माना गया कि भाजपा की लगातार बढ़ती लोकप्रियता के चलते विद्यार्थियों के एक बड़े वर्ग का रूझान जनान्दोलनों व समाज के उपेक्षित वर्ग की समस्याऐं उठाने के प्रति कम दिखाई दे रहा है लेकिन देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता पर काबिज होने के बाद यह देखा गया कि भाजपा से जुड़े लोग व राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के तथाकथित कार्यकर्ता, विचारधारा के नाम पर राष्ट्र के विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों का शैक्षणिक माहौल ही नही बदल देना चाहते बल्कि एक छिपे हुऐ ऐजेण्डे के तहत इतिहास में फेरबदल कर व तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर अपना पक्ष मजबूत करने की एकतरफा कार्यवाही भी सत्तापक्ष द्वारा शुरू कर दी गयी है। यहाँ तक भी सब ठीक था और विचारधारा के नाम पर एक मजबूत जनाधार रखने वाले तमाम छात्र संगठनों व सामाजिक संगठनों को सत्ता पक्ष के इस तौर-तरीके से बहुत ज्यादा आपत्ति भी नही थी लेकिन यह सबकुछ यही पर रूका नही रहा बल्कि खुद को सत्ता पक्ष से जुड़ा बड़ा नेता कहने वाले तथा इन तथाकथित छात्र संगठनों के रहनुमाओं ने खुद या अपने समर्थकों की आड़ लेकर विपक्षी छात्र संगठनों से जुड़ी अन्य विचारधाराओं पर न सिर्फ चारित्रिक हमले शुरू कर दिये बल्कि महिलाओं पर सिगरेट व शराब का सेवन करने या फिर विश्वविद्यालय कैम्पस् में कंडोम के पैकेट व शराब की खाली बोतले पाये जाने की खबरों को उड़ाकर छीटाकंशी व छेड़छाड़ का एक नया तरीका ईजाद किया गया। विपक्षी विचारधारा से जुड़ी महिलाओं के लिऐ कुतिया और वैश्या जैसे शब्दों का सार्वजनिक रूप से प्रयोग करने वाले लोग जब संस्कृति एंव परम्परा के नाम पर सड़क चलती महिलाओं पर भद्दी टिप्पणी करने लगे तथा विश्वविद्यालयों के कैम्पस में पढ़ने वाली कुछ महिलाओं को सड़क चलते ही रोका जाने लगा तो छात्राओं का गुस्सा फूटना स्वाभाविक था लेकिन इस प्रतिक्रिया की शुरूवात इतनी शानदार होगी और देखते ही देखते सत्तापक्ष के खिलाफ पूरे देश में महिला विरोधी होने का माहौल बनने लगेगा, यह उम्मीद किसी को नही थी। वर्तमान में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से शुरू हुआ छात्राओं का यह आन्दोलन किसी सरकार अथवा व्यवस्था के विरोध में नही है और न ही आन्दोलनरत् छात्राओं ने प्रधानमंत्री का रास्ता रोकने या फिर उनपर कोई आरोंप लगाने का प्रयास किया है लेकिन विचारधारा के नाम पर युवतियों एवं महिलाओं को घरों में कैद रखने तथा उनके लिऐ ड्रेस कोड लागू करने के फरमान देने वाली भाजपाई मानसिकता विद्यार्थियों के इस आन्दोलन को अपनी सरकार व कार्यशैली पर एक हमले की तरह ले रही है और राजनैतिक लाभ के लिऐ ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं‘ का नारा देने वाले लोग देश की युवा पीढ़ी के बीच खिसकते दिख रहे अपने जानाधार को बचाने के लिऐ किसी भी हद तक जाने को तैयार दिख रहे है। लिहाजा आने वाला वक्त विश्वविद्यालय में अध्यनरत् छात्र-छात्राओं के लिऐ परीक्षा की एक घड़ी सरीखा हो सकता है तथा देश की युवा पीढ़ी को एक बार फिर इस अघोषित आपातकाल के विरोध में सड़को पर उतरने के लिऐ अपने संस्थानों में तालबंदी को मजबूर होना पड़ सकता है।

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