जनान्दोलनों के जवाब में | Jokhim News

Monday, December 11, 2017

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जनान्दोलनों के जवाब में

माओवाद या नक्सलवाद के नाम पर होने वाली गिरफ्तारियों का बिना वजह प्रचार कर सरकार विरोधी सुरों को मध्यम करने में जुटा प्रशासन।
देश के अन्य पहाड़ी राज्यों के मुकाबले अपेक्षाकृत शांत कहे जा सकने वाले उत्तराखंड में माओवादी संगठनों की सक्रियता से जुड़ी खबरें अक्सर प्रकाश में आती रहती है और इस राज्य के एक बड़े हिस्से की सीमाऐं माओवाद से प्रभावित रहे नेपाल से मिलने एवं भारत-नेपाल के कई ग्रामीण इलाकों में रोटी-बेटी के सहज सम्बन्धों के चलते इस तरह के समाचारों पर आसानी से विश्वास भी हो जाता है लेकिन माओवाद या नक्सलवाद के नाम पर हुई तमाम गिरफ्तारियों व इस संदर्भ में पुलिस द्वारा प्रस्तुत की गयी कई कहानियों के बावजूद इस दुरूह परिस्थितियों व संसाधनों की लूट के चलते बाधित राज्य के तमाम पर्वतीय हिस्सों को विकास के नजरिये से देखे तो आसानी से यह विश्वास किया जा सकता है कि नक्सलवादी या माओवादी आसानी से यहाँ अपना आधार बना सकते है और एक अरसा पहले हुऐ कुली बेगार, नशा नही रोजगार दो या फिर चिपको जैसे आन्दोलनों के साथ ही साथ वर्तमान परिपेक्ष्य में पहाड़ के लगभग हर कोने में चल रहे शराब विरोधी आन्दोलनों व एक लम्बे आन्दोलन के बाद अस्तित्व में आये इस पहाड़ी राज्य की जनता की अपने ही नेताओं से नाराजगी को देखते हुऐ यह स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि यहाँ जनाधार बनाना माओवादी या नक्सलवादी विचारकों के लिऐ कठिन नही है। कांग्रेस मिश्रित विचारधारा के साथ अधिकांशतः वामपंथी लगाव रखने वाले पहाड़ के तमाम-पुराने नेता तथा सामाजिक संगठनों में अहम् भूमिका अदा करने वाले पहाड़ से जुड़े तमाम बड़े नाम यह इशारा तो करते ही है कि अन्याय के विरूद्ध लोकतांत्रिक संघर्ष करने का इस क्षेत्र का अपना एक अलग इतिहास रहा है और जनसामान्य की परेशानी व सामाजिक अराजकता के वक्त इस प्रदेश के तमाम बुद्धिजीवी वर्ग ने एक मंच पर आकर जनता की लड़ाई को लड़ा है लेकिन इस सबके बावजूद उग्र वामपंथी संगठन इस प्रदेश में अपना कोई संगठनात्मक ढ़ाँचा खड़ा नही कर पाये है जो कि आश्चर्यजनक है। हांलाकि बीच-बीच में मिलने वाली पुलिसिया सूत्रों की खबरों के क्रम में उत्तराखंड के परिपेक्ष्य में माओवादी संगठनों के जोनल कमांडर या अन्य पदों का जिक्र जरूर आता है और राजनैतिक जरूरतों के हिसाब से सक्रियता दिखाने वाली राज्य की पुलिस द्वारा समय-समय पर छापेमारी व गिरफ्तारी करने की खबरें भी आती रही है लेकिन सरकारी मशीनरी हमेशा यह बताने में असफल रही है कि तथाकथित रूप से प्रतिबन्धित वामपंथी संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले यह तमाम इनामी माओवादी या नक्सलवादी उत्तराखंड में जनता के किस हिस्से को अपने साथ जोड़ने का प्रयास कर रहे है या फिर इन्होंने राज्य में किस वारदात को अंजाम दिया है? यह ठीक है कि अपनी सक्रियता व फर्ज के प्रति जवाबदेही को सुनिश्चित करते हुऐ उत्तराखंड पुलिस के जंबाज सिपाहियों एवं अधिकारियों द्वारा समय-समय पर की गयी नक्सलवादियों की गिरफ्तारी को नाजायज नही ठहराया जा सकता है और न ही राज्य की पुलिस व्यवस्था पर नेताओं के इशारें पर काम करने के आरोंप लगाने का हमारा कोई इरादा है लेकिन माओवाद व नक्सलवाद के नाम पर होने वाली हर गिरफ्तारी के साथ बड़ी-बड़ी कहानियों को जोड़ने के पुलिसिया अंदाज को देखकर यह शक किसी भी सामान्य जानकारी रखने वाले मानवीय मन को बैचेंन कर सकता है कि चोरी, डकैती, हत्या और बलात्कार जैसे तमाम मामलों में कई मजबूत सबूत हाथ लगने के बावजूद अपराधियों की गिरफ्तारी में नाकाम रहने वाली हमारी पुलिस नक्सलवादियों या माओवादियों को लेकर इतना सटीक अंदाजा कैसे लगा लेती है तथा बिना किसी हथियार अथवा संदिग्ध आचरण के सामान्य सा जीवन जीने वाले इन तथाकथित माओवादियों को इनके पास बरामद होने वाली गैर कानूनी किताबों, पर्चो या अन्य देश विरोधी सामग्री के बदले कितने समय तक जेल में रखा जा सकता है। उत्तराखंड के परिपेक्ष्य में सामने आयी तमाम नक्सलवादियों अथवा माओवादियों की गिरफ्तारी के संदर्भ में यह देखना दिलचस्प है कि पुलिस एवं शासन व्यवस्था द्वारा इन पर लगाये गये गंभीर आरोंपो को वर्तमान तक न्यायालय में सच साबित नही किया जा सका है और लंबे समय तक जेल में रहने के बावजूद उत्तराखंड से गिरफ्तार तमाम माओवादियों या नक्सलवादियों को उत्तराखंड में घटित किसी वारदात के लिऐ न्यायालय जिम्मेदार नही ठहराया गया है। हालातों के मद्देनजर ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तराखंड का सरकारी तंत्र पहाड़ के विभिन्न हिस्सों में होने वाले जनान्दोलनों को तोड़ने तथा इनमें जनसामान्य की भागीदारी कम अथवा नगण्य करने के लिऐ कुछ तथाकथित माओवादियों या नक्सलवादियों की गिरफ्तारी को चारे की तरह इस्तेमाल करने का सफल प्रयास करता रहा है और ऐसे आड़े वक्त के लिऐ उसने माओवादी विचारधारा से जुड़े कुछ पहाड़ी नौजवानों को स्थायी रूप से अपने निशाने पर रखा हुआ है। अगर ऐसा है तो कानून के रखवालों के इस तरीके को किसी भी सूरत में ठीक नही कहा जा सकता और न ही सरकारी तंत्र पर काबिज नेताओं की लच्छेदार भाषणशैली पर विश्वास करते हुऐ जनता के हक की बात करने वाले जागरूक जनवादी चिन्तकों को माओवादियों व नक्सलवादियों का समर्थक माना जा सकता है। हमने देखा कि पहाड़ में जब भी सड़क, पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दो पर सरकार की निष्क्रियता के खिलाफ आन्दोलन या चुनाव बहिष्कार का नारा लगा तो इसे माओवादी सक्रियता का नाम देकर गिरफ्तारी व छापेमारी की कोशिश की गयी तथा शराब की बिक्री के लिऐ सरकार द्वारा सचल वाहनों में दुकानें खुलवाने या फिर गुण्डा तत्वों को आगे कर विरोध कर रही महिलाओं को धमकाने के विरोध में सरकारी तंत्र के खिलाफ आवाज उठाने वाले, संघर्षशील आन्दोलनकारी साथियों को माओवादी या नक्सलवादी घोषित कर उन्हें प्रताड़ित करने में पुलिस कभी भी पीछे नही रही। अब ताजा मामला पंचेश्वर बांध का है और इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि सरकार अपनी इस महत्वाकांक्षी परियोजना को किसी भी कीमत पर पूरा करना चाहती है लेकिन सरकार के इस फैसले के खिलाफ आन्दोलनकारी विचारधारा व जागरूक साथियों की लामबंदी शुरू हो चुकी है और इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि अगर आन्दोलनकारी सुर इसी तरह तेज होते गये तो सरकारी तंत्र को अपने इस फैसले को परवान चढ़ाना न सिर्फ मुश्किल हो सकता है बल्कि दीर्घकालीन राजनैतिक नफे-नुकसान की दृष्टि से भी यह सत्तापक्ष का गलत फैसला माना जा सकता है। लिहाजा यह हो सकता है कि सरकारी पक्ष अपने तमाम फैसलों के खिलाफ लामबंद होती दिख रही आन्दोलनकारी ताकतों व मातृ शक्ति को डराने के लिऐ यह माहौल बना रहा हो कि उत्तराखंड में माओवादी आन्दोलन की आहट सुनाई देने लगी है और पंचेश्वर बांध के विरोध समेत पहाड़ के तमाम हिस्सों में चल रहे शराब की दुकानों के विरोध वाले आन्दोलनों व खनन या भू-माफिया के खिलाफ स्थानीय स्तर पर उठ रही आवाजों के पीछे कहीं न कहीं वामपंथी विचारकों व सक्रिय माओवादी संगठनों का हाथ है। हो सकता है कि पकड़े गये देवेन्द्र चम्याल व भगवती भोज समेत अन्य संदिग्ध माओवादियों के अपने कुछ चरम् वामपंथी कनैक्शन हो भी या फिर यह तमाम लोग अथवा उत्तराखंड पुलिस द्वारा ईनामी घोषित अन्य कई नक्सलवादी लड़ाके, उत्तराखंड में अपना राजनैतिक आधार बनाने के लिऐ प्रयासरत् भी हो लेकिन यह कहना कतई गलत है कि देश के अन्य हिस्सों की अपेक्षाकृत शांत व देशभक्त पहाड़ी जनमानस की कर्मभूमि में अपने ही क्षेत्र या भाई-बंधुओं के खिलाफ कोई साजिश पनप रही है जिसका सहारा लेकर कुछ वैचारिक स्तर पर दृढ़ व कर्मठ युवा पहाड़ की शांत वादियों को दहला देना चाहते है। यह माना कि पहाड़ की आन्दोलनधर्मी जनता ने आम आदमी की बात करने वाली व शोषण या राजनैतिक दुराग्रह का वैचारिक विरोध करने वाली वामपंथी विचारधारा को हमेशा स्वीकार किया है और पहाड़ में होने वाले लगभग हर छोटे बड़े आन्दोलन की भूमिका तत्कालीन जनवादी विचारकों ने ही लिखी है लेकिन इसका यह तात्पर्य तो नही कि सत्ता पर काबिज राजनैतिक सोच पुलिसिया तंत्र की मदद से हर छोटे-बड़े आन्दोलन को कुचलने के लिऐ उसे माओवादी या नक्सलवादी विचारधारा से ओत-प्रोत बताने निकल पड़े और सरकारी फैसलों के खिलाफ विरोध का झण्डा बुलन्द करने वाले युवाओं को नक्सलवादी करार देकर जेलों में ठूँस दिया जाय।

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