बेफिजूल की कवायद | Jokhim News

Thursday, October 19, 2017

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बेफिजूल की कवायद

उत्तराखंड के विकास व सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिऐ धन की व्यवस्था करने के स्थान पर बेमतलब की कवायद में उलझी सरकार ।
तमाम मोर्चो पर असफल उत्तराखंड की भाजपा सरकार विभागों के विलयीकरण के नाम पर एक ऐसी बेमतलब की कवायद में उलझती नजर आ रही है कि जिसके दूरगामी परिणामों को लेकर अश्वस्त नहीं हुआ जा सकता। हांलाकि यह जरूरी नही है कि सरकार की इस मंशा के पीछे उसकी बदनियती ही छुपी हो और पूर्व में एक ही विभाग का हिस्सा रहे विभिन्न अलग-अलग प्रकृति वाले छोटे अनुभागों को एक बार फिर से एकीकृत कर नये विभागीय ढांचे के गठन को लेकर उसका उद्देश्य पूर्ववर्ती सरकारों के फैसलों में उलटफेर करना ही हो लेकिन सरकारी तंत्र जिस तरह इस फैसले को अंजाम दे रहा है उसे देखकर आसानी से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस सारी जद्दोजहद का आम आदमी को कोई फायदा नही होने वाला बल्कि सरकार के इस फैसले के बाद अपनी पदोन्नति व अन्य महत्वपूर्ण फैसलों को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने का मन बना रहे सरकारी कर्मचारियों के संगठनों द्वारा जारी बयानों व चेतावनी को अगर सही माने तो ऐसा प्रतीत होता है कि जल्द ही उत्तराखंड राज्य, कर्मचारी आन्दोलन की चपेट में आने वाला है और अगर ऐसा होता है तो सरकारी कामकाज लटकने से आम आदमी का विकास व राज्य के विभिन्न हिस्सों में चल रही विकास योजनाऐं बाधित होने का गंभीर खतरा है। यह माना कि राजकाज चलाने की दृष्टि से ज्यादा सुविधापूर्ण मानी जाने वाली छोटी इकाईयाँ उत्तराखण्ड के परिपेक्ष्य में ज्यादा अच्छे परिणाम नही दे पायी है और खुद को उत्तराखंड राज्य गठन का श्रेय देने वाली भाजपा की विचारधारा हमेशा से ही सत्ता के विकेन्द्रीकरण के खिलाफ रही है लेकिन इसका तात्पर्य यह तो नही है कि सरकारी तंत्र को मनमाने फैसले लेते हुऐ पूर्ववर्ती सरकारों के उन तमाम निर्णयों को पलटने का हक मिल गया है जो उसने व्यापक जनहित के परिपेक्ष्य में पूरी सूझ-बूझ व चिन्तन-मनन के बाद लिये थे। सरकार का यह कथन सही हो सकता है कि छोटी इकाईयों का गठन करते हुए नये विभागों, मंत्रालयों व अनुभागों का गठन एक खर्चीली प्रक्रिया है और उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य के परिपेक्ष्य में कई विभागों का गठन औचित्यहीन है लेकिन सरकार को यह भी समझना चाहिऐं कि किसी अलग विभाग या अनुभाग को पूर्व से ही चल रहे अनुभाग में शामिल करने के बाद कार्यो में शिथिलता आना व तमाम योजनाओं का ठण्डे बस्ते में पड़ जाना, सरकार के इस फैसले का ऋृणात्मक पहलू हो सकता है। यह ठीक है कि पूर्ण बहुमत के साथ राज्य की सत्ता पर काबिज भाजपा को यह पूरा हक है कि वह पूर्ववर्ती सरकार या उससे भी पहले के तमाम फैसलों की पुर्नसमीक्षा करते हुऐ अपने तंत्र में बड़ा फेरबदल करें और त्रिवेन्द्र सिंह रावत के नेतृत्व वाली प्रदेश की भाजपा सरकार ने न सिर्फ विभागों के एकीकरण के संदर्भ में अपना फैसला सुनाकर अपनी इच्छाओं का खुलासा कर दिया है बल्कि भाजपा संगठन द्वारा राज्य में पूर्व से चल रहे तेईस संगठनात्मक जिलों की संख्या एक बार फिर तेरह कर देने के फैसले के बाद यह भी तय हो गया कि हाल-फिलहाल भाजपा के नेतृत्व वाली वर्तमान सरकार का नये जिलों के निर्माण को लेकर कोई इरादा नही है। यह बात सिर्फ यहीं पर समाप्त नही होती बल्कि अगर तथ्यों की गंभीरता के नजरियें से देखा जाय तो बात सिर्फ यहीं पर समाप्त नही होती बल्कि अगर तथ्यों की गंभीरता के नजरिये से देखा जाय तो बात की शुरूवात ही यहाँ से होती है क्योंकि नये जिलों क निर्माण पर रोक लगाने व विभागों के एकीकरण का फैसला लेने के बाद सरकार देर-सबेर पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा बनायी गयी नई तहसीलों, नगर पंचायतों, विकास खण्डों समेत अन्य छोटी इकाईयों को लेकर भी अपना मंतव्य स्पष्ट करेगी और स्थानीय निकायों की सीमाऐं बढ़ाने की खबरों के बीच अपने अस्तित्व को लेकर जूझती नजर आ रही ग्राम पंचायतों व ग्राम सभाओं के लिऐ एक नया खतरा खुलकर सामने आयेगा। हांलाकि सरकारी तंत्र ने अभी नवगठित नगर पंचायतों, तहसीलों, उपतहसीलों, अथवा विकासखण्डों के विलयीकरण को लेकर कोई मंतव्य स्पष्ट नही किया है ओर न ही विभागों के विलयीकरण की दिशा में तेजी से बढ़ती दिख रही कार्यवाही में ऐसा कोई व्यवधान सामने आया है जो सरकार के लिऐ चिन्ता का विषय बने लेकर सरकार की कार्यशैली से यह स्पष्ट लग रहा है कि वह स्थानीय निकायों की सीमा विस्तार को निपटाने के बाद अपने नियोजन सम्बन्धी खर्चो को बचाने के लिऐ ग्रामसभा स्तर के लेकर नगर पंचायत स्तर तक तमाम पुराने फैसलों को समीक्षा करेगी और पर्वतीय क्षेत्रों के कम होते जा रहे जनसंख्या के घनत्व को देखते हुऐ यह दावे से कहा जा सकता है कि अगर समायोजन का यह सिलसिला सचिवालय स्थित विभागों व अनुभागों से आगे बढ़कर ग्राम पंचायतों व ग्राम सभा स्तर तक चला तो प्रदेश में जन्म ले चुकी कई छोटी इकाईयाँ अपने अस्तित्व में आने से पूर्व ही समाप्त हो जायेंगी। सरकार की इस नीति से नये जिलों के गठन को लेकर आशाविन्त नजर आने वाली स्थानीय आबादी की आस तो टूटेगी ही साथ ही साथ राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों को विभिन्न योजनाओं के मद मेें मिलने वाली केन्द्र साहयतित धनराशि अथवा विश्व बैंक के सहयोग से मिलने वाले आर्थिक अनुदान या बजट राशि में कमी अवश्वम्भावी होगी लेकिन सरकारी तंत्र इन तमाम पहलुओं पर विचार करना छोड़ एक पक्षीय अन्दाज से सोच व कार्य कर रहा है और पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा नये विभागों के गठन किये जाने की स्थिति में कुछ कर्मचारियों व अधिकारियों को समय से पूर्व मिली पदोन्नति व वेतन वृद्धि को मुद्दा बनाते हुऐ विभागों के पुर्नगठन की बात की जा रही है। हांलाकि इस तरह के मामलों में विभागों द्वारा एकमुश्त या प्रतिमाह के रूप में दी जाने वाली धनराशि बहुत बड़ी नही है और अगर तुलनात्मक रूप से अध्ययन करें तो हम पाते है कि वर्तमान सरकार के अस्तित्व में आने के बाद विभिन्न गैर जरूरी कार्यक्रमों के आयोजन तथा बिना किसी मांग के एकाएक ही की गयी विधायक निधि में वृद्धि के जरिये व्यय होने वाली राशि के मुकाबले तथाकथित रूप से गैरजरूरी कहलायें जा रहे छोटे विभागों में सलाना तौर पर होने वाला व्यय व पदोन्नति के चलते दी जाने वाली वेतन वृद्धि नगण्य ही है। लिहाजा यह कहना गलत है कि छोटी इकाईयों के गठन से राज्य अथवा जनता को कोई लाभ नही हो रहा है या फिर सरकार विभागों का पुर्नगठन कर अनावश्यक व्यय को बचाना चाहती है। वस्तुतः सही स्थिति यह है कि अपने तंत्र से काम लेने में असफल नजर आ रही सरकार, विभागों के पुर्नगठन व समायोजन के नाम पर कुछ नये विवादों को जन्म दे कुछ करते हुऐ दिखना चाहती है लेकिन इस सारी जद्दोजहद में वह यह भूल रही है कि उत्तराखंड राज्य गठन के बाद से ही बड़ी जन प्रतिनिधियों की संख्या तथा विभिन्न मंत्रालयों व विभागों के अस्तित्व में आने के बाद राज्य ने किसी भी परिपेक्ष्य में राज्य आन्दोलनकारियों की अपेक्षाओं के अनुरूप काम नही किया है, तो क्या इस प्रदेश की जनता को हक है कि वह एक बार पुनः यहाँ जनप्रतिनिधियों की संख्या घटाये जाने, सरकार के मंत्रीमण्डल व दायित्व के रूप में बांटे जाने वाले संवैधानिक पदो की संख्या तथा सरकार चलाने के नाम पर होने वाले अनावश्यक खर्चो को कम करने के संदर्भ में किसी भी स्तर पर फैसला ले सकें।

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