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Thursday, October 19, 2017

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राजनीति की बिसात पर

रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में शरण दिये जाने के खिलाफ नाजायज नहीं कहा जा सकता देश की युवा पीढ़ी व समाज के एक हिस्से का गुस्सा।
रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में राजनैतिक शरण दिये जाने का मुद्दा इन दिनों चर्चाओ में है और भाजपा को एक उग्र हिन्दूवादी राजनैतिक दल साबित करने की कोशिश करने वाले देश के तमाम राजनैतिक दल व सामाजिक संगठन, रोहिंग्या मुस्लिमों को भारत से निकाले जाने या फिर इन्हें वापस म्यांमार व बंग्लादेश भेजे जाने की खबरों से खफा है लेकिन विपक्ष का यह सामूहिक प्रयास भाजपा को देश की जनता के उस हिस्से की बीच राजनैतिक मजबूती दे रहा है जो केन्द्र तथा विभिन्न राज्यों में चल रही भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों के बावजूद भी मंहगाई, बेरोजगारी व आवासीय समस्या को समाप्त करने एवं तमाम जनसुविधाओं को जनसामान्य तक न पहुँचने देने की सरकारी पैंतरों के चलते तंत्र व भाजपा के नेताओं से नाराज चल रहा था। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि भारत ने न सिर्फ अपनी आजादी के वक्त बल्कि इसके उपरांत भारत-पाकिस्तान युद्ध, बंग्लादेश के निर्माण, तिब्बत पर चीन के कब्जे समेत अन्य तमाम तरह की राष्ट्रीय समस्याओं व वैश्विक परिस्थितियों के मद्देनजर न सिर्फ अपनी सीमाओं को शरणार्थियों के लिऐ खुला रखा है बल्कि आस-पड़ोस के मुल्को से जायज अथवा नाजायज रूप से भारत में आकर बसने व काम धंधा करने या फिर वीजा समाप्ति के बावजूद वापिस अपने देश न जाने वालों के खिलाफ भी यहाँ सख्त कार्यवाही नही होती और राजनैतिक लिहाज से हमेशा ही हावी दिखने वाले चुनावी गणित को देखते हुऐ किसी भी अन्य मुल्क के मुकाबले यहाँ आकर बसना ज्यादा आसान व मुफीद है लेकिन इधर हालातों में तेजी से बदलाव हुआ है और सीमित संसाधनों के स्थान पर अधिकतम् संसाधनों के उपभोग व अपने जायज अधिकारों के लिऐ सरकारी तंत्र की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगाने की बढ़ती प्रवृत्ति ने न सिर्फ सत्ता की राजनीति करने वाले राजनेताओं व सरकारी तंत्र की कमान संभालने वाले नौकरशाहों को सचेत कर दिया है बल्कि तेजी से कम हो रहे रोजगार के अवसरों ने मानवता, दया, प्र्रेम और वैश्विक बन्धुत्व के नारे के साथ एकता व समानता की बात करने वाली विचारधाराओं को भी नुकसान पहुँचाया है और इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि विभिन्न कारणों से भारत में शरण पाने वाले शरणार्थी वैश्विक परिवेश में भारत की स्थिति तथा मानवाधिकारों को लेकर भारतीय जनमानस की सजगता के चलते वर्तमान में भारत की सीमाओं के भीतर न सिर्फ स्वंय को सुरक्षित महसूस करते है बल्कि आवास, रोजगार एवं सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाने के मामले में भी उनकी स्थिति बेहतर कही जा सकती है लेकिन इसके ठीक विपरीत भारत का सरकारी तंत्र अपने ही देश के उन तमाम नागरिकों के मूल अधिकारों तथा आवास, रोजगार व स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाओं को लेकर चिन्तित नहीं दिखता जो विभिन्न राजनैतिक कारणों से अपने पैतृक आवासों को छोड़कर दर-बदर की ठोकरे खाने को मजबूर है। इन हालातों में अगर सरकार एक बार फिर शरणार्थियों की एक बड़ी खेप को भारत में पुर्नवास की अनुमति देते हुऐ उनकी रिहाईश व अन्य इतंजामात में एक बड़ी रकम खर्च करने का मन बनाती है तो स्थानीय स्तर पर इससे नाराजी जायज है। वैसे भी जिन रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में शरण देने की बात चल रही है उन्हें म्यामांर से धार्मिक उन्माद व दंगो को बढ़ावा देने तथा आंतकी वारदातों को बढ़ावा देने या फिर आंतकवादियों को संरक्षण देने के गंभीर आरोंपो के साथ स्थानीय जनता द्वारा भगाया जा रहा है जबकि स्थानीय सेना या म्यामांर के राजनीतिक दल इस मुद्दे पर मौन है। ध्यान देने योग्य विषय है कि अहिंसा के पुजारी कहलाये जाने वाले बौद्ध धर्म के अनुयायियों का मुल्क माना जाने वाला म्यामांर एक अरसा पहले अपने यहाँ अनाधिकृत रूप से प्रवेश कर गये रोहिंग्या मुसलमानों के साथ तालमेल बैठा पाने में खुद को असमर्थ पा रहा है तथा म्यामांर की आजादी के लिऐ लंबे समय तक अहिंसक संघर्ष चलाने वाली नोबल पुरूष्कार विजेता व गांधी वादी नेता आंग सान सू की भी इस तथ्य से सहमत दिखती है कि म्यामांर की बेहतरी व राजनैतिक शान्ति के लिऐ रोहिंग्य मुसलमानों को म्यामांर से खदेड़ा जाना ही एक मात्र उपाय है। इन हालातों में अगर हम यह कहे कि म्यामांर से भारत की ओर रूख कर रहे इस संदिग्ध आचरण वाले कबीले या फिर एक जातीय समुदाय के लिऐ भारत ने अपनी सीमाऐं खोल देनी चाहिऐं और दिल खोलकर इनका स्वागत् करना चाहिऐं, तो इन कुतर्को को किसी भी कीमत पर सहीं नही ठहराया जा सकता क्योंकि पहले से ही मुस्लिम आंतक से जूझ रही भारत की जनता को यह समझा पाना असंभव है कि उनपर लगातार हो रहे अन्दरूनी हमलों व विदेशी साजिशों के लिऐ वह लोग जिम्मेदार नही है जो सदियों से इस देश में रहने के बावजूद भी इसे अपना मानने में हिचकिचाते है और जिनके लिऐ धर्म व ईमान के नाम पर लगाया गया कोई भी नारा या फिर जेहाद के नाम पर किया गया आवहन अपने मुल्क की रक्षा से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। हम यह नही कहते कि भारत में रहने वाला हर मुसलमान धर्मान्ध या जेहादी है और रोहिंग्या मुसलमानो को भारत में राजनैतिक शरण दिये जाने के नाम पर एक बड़ी विदेशी साजिश को अंजाम देने की कोशिश की जा रही है लेकिन इस तथ्य से इनकार भी नही किया जा सकता कि देश में होने वाली लगभग हर आंतकवादी वारदात में मुस्लिमों के शामिल होने के सबूत तथा इन वारदातों के पीछे स्पष्ट झलकने वाली विदेशी साजिश को देखतेे हुऐ भारत की जनता द्वारा रोहिंग्या मुसलमानों को शक भरी नजरों से देखा जाना जायज कहा जा सकता है और कश्मीर के एक बड़े भू-भाग को हिन्दू मुक्त करने के लिऐ रची गयी साजिशों के खुलासे व अपने ही देश की सीमाओं के भीतर शरणार्थी बनकर रहने को मजबूर कश्मीरी पण्डितों की बुरी दशा को देखने के बाद कोई भी राष्ट्रवादी ताकत यह नही चाहेगी कि भारत की सरकार अपने देश की सीमाओं के भीतर कुछ ऐसे लोगों को पनाह दे जिनपर पहले से ही अराजकता व उग्रवाद को शरण देने के आरोप लगे हो। यह माना कि अन्र्तराष्ट्रीय प्रतिबन्धों व वैश्विक अनुबंधों का हर मोर्चे पर सम्मान करने वाला भारत इस बार भी अपने तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेताओं व मानवाधिकार वादियों द्वारा की जाने वाली जिद के आगे खुद को असहाय पाते हुऐ रोहिंग्या मुसलमानों को शरण दिये जाने के मामले में मजबूर दिख रहा है और भारत सरकार की ओर से अपना पक्ष प्रस्तुत करते हुऐ न्यायालय में दिखाई गयी राजनैतिक दृढ़ता व कठोर फैसले लिये जाने के संदर्भ में प्रस्तुत की गयी दलील के बावजूद यह संभवना कम ही दिख रही है कि भारत रोहिंग्या मुसलमानों को अपने देश शरण देने के मामले से साफ तौर पर अलग हो पायेगा लेकिन अगर देश की सरकार किसी राजनैतिक अथवा कानूनी दबाव में रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने के लिऐ मजबूर होती है तो सरकार के इस फैसले का भारतीय जनमानस पर गलत प्रभाव पड़ सकता है और बेरोजगारी, आवासीय समस्या व संसाधनों के आभाव के चलते सरकारी योजनाओं से महरूम होती दिख रही देश की युवा पीढ़ी अपनी हताशा व गुस्से का प्रदर्शन करने के लिऐ कोई भी मार्ग चुन सकती है।

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