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Monday, December 11, 2017

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जनसामान्य के नजरिये से

एक राजनैतिक शगूफा भर साबित हुआ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का उत्तराखंड दौरा।
अपने दो दिवसीय दौरे में उत्तराखंड पहुंचे अमित शाह ने बदलाव या फेरबदल के तमाम कयासों पर लगाम लगाते हुऐ राज्य की टीएसआर सरकार को न सिर्फ क्लीन चिट दी है बल्कि सत्ता पक्ष के विधायकों को कड़ी फटकार लगाते हुऐ असंतोष की चिंगारी को जहाँ का तहाँ विराम देने की कोशिशें भी अमित शाह द्वारा की गयी है लेकिन इस सारी जद्दोजहद के बावजूद यह तय नही माना जा सकता कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का यह दौरा संगठन व सरकार के बीच स्पष्ट नजर आ रहे मतभेद व सत्तापक्ष के विधायकों की नाराजी दूर करने में कामयाब रहा। हांलाकि यह कहने में कोई हर्ज नही है कि राज्य में भाजपा सरकार बनने के बाद पहली बार राजधानी देहरादून आये अमित शाह को सरकार ने पूरी तवज्जों दी और उनके स्वागत् मंे न सिर्फ दून के तमाम मुख्य मार्गाे को रंग-रोगन करते हुऐ गढ़ढ़ा मुक्त किया गया बल्कि भाजपा के झण्डों व पोस्टरों से पूरे शहर को इस तरह पाट दिया गया कि पूरी की पूरी राजधानी भगवामयी नजर आयी लेकिन इस पूरी नुराकुश्ती का राज्य सरकार अथवा संगठनात्मक स्तर पर क्या फायदा हुआ, कहाँ नही जा सकता बल्कि अगर अमित शाह द्वारा घोषित फैसलों के क्रम में नजर डाले तो उनका सबसे महत्वपूर्ण फैसला ही संगठनात्मक जिलों की संख्या तैईस से कम करते हुऐ तेरह करने का रहा और अगर इस फैसले को अमल में लाया जाता है तो प्रदेश भाजपा संगठन के विभिन्न पदो की शोभा बढ़ा रहे भाजपा के कई वरीष्ठ नेताओं को न सिर्फ मायूस होना पड़ सकता है बल्कि राज्य में विभिन्न स्तर पर नये जिलों की मांग कर रही जनता के बीच यह संदेश भी जाना तय है कि जनहित से जुड़े तमाम मुद्दो पर फैसला लेने में असफल नजर आ रही त्रिवेन्द्र सरकार व भाजपा संगठन एक बार फिर जनविरोधी निर्णय लेते हुऐ नये जिलों के गठन से इनकार का मन बना रहा है। यह ठीक है कि नये जिलों का गठन अमित शाह के अधिकार क्षेत्र में नही आता और एक राजनैतिक संगठन के मुखिया मात्र होने के कारण उनसे यह अपेक्षा भी नही की जानी चाहिऐं कि वह केन्द्र सरकार के कामकाज में किसी भी तरह की दंखलदाजी करते हुऐ राज्य सरकार को कोई अतिरिक्त बजट या सहूलियत देने की घोषणा करेंगे लेकिन इस तरह का माहौल भी भाजपा के नेताओं व कार्यकर्ताओं ने ही बनाया था और लगभग हर स्तर पर हो रही अमित शाह के आगमन की तैयारियों को देखते हुऐ पूर्व से ही यह कयास लगाये जाने लगे थे कि अमित शाह के इस प्रस्तावित दौरे के बाद कुछ न कुछ बड़े बदलाव आने की संभावना है। यह माना कि एक संगठन के अध्यक्ष के रूप में अमित शाह ठीक अध्यापक वाले अंदाज में सत्तापक्ष के विधायकों को टटोलते नजर आये ओर विभिन्न स्तरों पर हुई बातचीत के दौरान नाराज पक्ष ने भी कई तरीके से अपने तर्क प्रस्तुत करने का प्रयास किया लेकिन अगर सूत्रों के हवाले से मिल रही खबरों को सही माने तो कह सकते है कि अमित शाह ने इस नाराजी को दबाने या फिर समझौतावादी नीति अपनाने के स्थान पर अपने ही अंदाज में सत्तापक्ष के विद्रोही तेवरों वाले विधायकों को निर्दलीय रूप से मैदान में उतरकर अपना राजनैतिक कद नाप लेने की सलाह देकर एक तीर से कई शिकार करने की कोशिश की और अगर यह सब वाकई सच है तो यकीन मानियें कि राज्य में हाल-फिलहाल मंत्रीमण्डल में बड़े उलटफेर या किसी नये चेंहरे को शामिल करने के साथ ही दायित्वों के बंटवारें की भी कोई संभावना नही है। किसी भी महत्वाकांक्षी राजनेता के लिऐ यह तमाम परिस्थितियाँ अच्छी नही कहीं जा सकती और न ही भाजपा से जुड़े तमाम वरीष्ठ व बड़े कद के नेता इस तथ्य को हजम कर पा रहे है कि उत्तराखंड से जुड़े मामलों में राज्य सरकार व संगठन उनके अनुभव व समर्पण को दरकिनार कर तमाम नये व मौकापरस्त लोगों को तवज्जों देेने में लगा है लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में उनके पास कोई विकल्प भी नही है, इसलिऐं भाजपा संगठन व सरकार से जुड़े तमाम पुराने लोग अपने दिल पर पत्थर रखकर चुपचाप बैठ जाने में ही फिलहाल अपनी भलाई मान रहे है। सवाल यह है कि यह सबकुछ कैसे और कितने दिन तक चलेगा और वक्त-बेवक्त जनता के सवाल-जवाबों का सामना करने वाला कोई भी कार्यकर्ता सरकार की कार्यशैली से जुडें मुद्दो पर जनता की चुभती नजरों के सामने खुद को सहज कैसे रख पायेगा। वैसे तो भाजपा की कार्यशैली हमेशा ही जनरोधी रही है और झूठे-सच्चे वादो व मर्मस्पर्शी नारों के दम पर चुनाव जीतने वाले भाजपा के नेता अहम् पदो को हासिल करने या फिर सरकार में शामिल होने के बाद अपना ही ऐजेण्डा चलाने की कोशिश करते है लेकिन उत्तराखंड के परिपेक्ष्य में यह हालत और ज्यादा बुरी नजर आती है। राज्य में गठित त्रिवेन्द्र सिंह रावत के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के छः माही कार्यकाल पर एक सरसरी निगाह डालने भर से यह अंदाजा आ जाता है कि प्रदेश के विभिन्न ग्रामीण व दूरस्थ क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों को बंद करने और शराब की दुकानें खोले जाने के संदर्भ में जिलाधिकारी समेत प्रदेश की तमाम नौकरशाही को दिशानिर्देश जारी करने वाली सरकार की प्राथमिकताऐं क्या हो सकती है लेकिन इस सबके बावजूद राज्य की जनता का एक हिस्सा यह उम्मीद कर रहा था कि इस बार राज्य में बनी पूर्ण बहुमत की सरकार के दम पर भाजपा राज्य में स्थानांतरण व लोकायुक्त जैसी तमाम बहुप्रतिक्षारत् विधेयक लेकर आयेगी और उत्तराखंड के साथ ही साथ उत्तर प्रदेश व केन्द्र में भी भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार होने के कारण दो राज्यों के बीच वर्षो से फंसे सम्पत्ति विवाद के तमाम मामले हल होंगे। अमित शाह के इस दौरे के बाद यह तय हो गया है कि केन्द्र सरकार व देश के अन्य हिस्सों की भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों की तर्ज पर ही उत्तराखंड में भी सत्तापक्ष के नेताओं की पहली प्राथमिकता जनहित व जनसमस्याओं का निराकरण नही है बल्कि सत्ता पर कब्जेदारी के बाद भाजपा के नेता यहाँ भी अपने शक्ति प्रदर्शन के दम पर सत्ता पर काबिज रहने के साथ ही साथ सत्ता की ठसक को बरकरार रखने की कामना रखते है। शायद यही वजह है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के हालियां दौरे के दौरान उनके स्वागत् के हर इंतजामात व सुरक्षा से जुड़े पहलुओं को लेकर न सिर्फ प्रदेश भाजपा का संगठनात्मक पक्ष पूरी तरह मुस्तैद दिखा बल्कि खुद मुख्यमंत्री समेत पूरा सरकारी अमला एक पैर पर खड़ा दिखा लेकिन अगर इस दौरे से जुड़े राजनैतिक नफे-नुकसान की बात की जाय तो हम यह पाते है कि प्रदेश सरकार की लगातार बिगड़ती साख के बावजूद अमित शाह के राजनैतिक बयानों व तूफानी अंदाज में की गयी बैठकों में ऐसा कुछ नही था जिसे राज्य की जनता के लिऐ फायदेमंद कहा जा सके।

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