सरकारी तामझाम व गुजांइशों के बावजूद | Jokhim News

Monday, December 11, 2017

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सरकारी तामझाम व गुजांइशों के बावजूद

अपने उत्तराखंड दौरे के दौरान जनपक्ष से जुड़े सवालो से बचते नजर आये भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह
उत्तराखंड सरकार के छह माही रिपोर्ट कार्ड की समीक्षा करने पधारे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की प्रेस वार्ता हेतु भाजपा कार्यालय से सीमित निमन्त्रण पत्र जारी किये जाने तथा चुनिन्दा पत्रकारों को ही अमित शाह से रूबरू होने का मौका दिये जाने के चलते पत्रकारों के एक वर्ग ने दबे-छुपे अंदाज में अपना आक्रोश व्यक्त किया है और यह माना जा रहा है कि प्रदेश सरकार ने अपनी नाकामी की पोल खुलने के डर से इस व्यवस्था को अंजाम दिया है। यह माना कि उत्तराखंड की टीएसआर के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार इन पिछले छः महिनों में लगभग हर मोर्चे पर असफल दिखाई देती है और सरकार की नाकामी व जनाक्रोश का अंदाजा प्रदेश के लगभग हर हिस्से में होते दिख रहे छोटे-बडे़ जनान्दोलन को देखकर लगाया जा सकता है लेकिन अगर यह माना जाय कि संघ के मजबूत नेटवर्क के सतत् सम्पर्क में समझे जाने वाले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को राज्य में भाजपा की सरकार के अस्तित्व में आने के बाद हो रही राजनैतिक व सामाजिक हलचलों की जानकारी नही होगी या फिर उनका दो दिवसीय राजनैतिक कार्यक्रम निर्धारित करने से पूर्व संघ द्वारा इन तमाम संदर्भो में फीडबैक नही लिया गया होगा, तो भी यह मानना मुश्किल है कि अमित शाह जैसा कूटनीतिज्ञ सरकार के कामकाज की समीक्षा करते वक्त या फिर सरकार में संभावित किसी फेरबदल अथवा खाली कुर्सियों पर तैनाती किये जाने के संदर्भ में मीडिया द्वारा पूछे गये प्रश्नों व राज्य सरकार पर की गयी टीका-टिप्पणी को ध्यान में रखते हुऐ कोई फैसला लेगा और बिना अमित शाह की सहमति के प्रदेश सरकार अथवा स्थानीय संगठन द्वारा इतना बड़ा कदम उठाया जाना अंसभव है। इन हालातों में यह संभावना प्रबल दिखती है कि अपनी प्रेस वार्ता के दौरान कुछ चुनिन्दा पत्रकारों को ही बुलाये जाने के निर्देश कहीं न कहीं अमित शाह के स्तर से ही आये होंगे और सिर्फ अमित शाह ही क्यों अब तो लगभग हर छोटे-बड़े नेता या जानी-मानी हस्ती के आगमन पर कुछ चुनिन्दा या बड़े बैनरों से जुड़े पत्रकारों को ही बुलाने का रिवाज बढ़ता जा रहा है तथा जनपक्ष से जुड़े तीखे सवालो का सामना करने से बचने के लिऐ नेताओं, तथाकथित समाज सुधारकों व बड़ी हस्तियों ने सुरक्षा के पहलू की आड़ लेकर पत्रकारिता के तौर-तरीके बदलने के प्रयास शुरू कर दिये है लेकिन इसके लिऐ सिर्फ नेता या इस तरह के आयोजनों में सामान्य पत्रकारों के प्रवेश पर रोक लगाकर कुछ चुनिन्दा लोगों या संस्थानों के लिऐ विशेष व्यवस्था जारी करने वाली विचारधारा ही दोषी नही है बल्कि पत्रकार बिरादरी में बढ़ती जा रही अयोग्य लोगों की भीड़ और अपने लक्ष्य से कहीं ज्यादा अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं को लेकर चिन्तित हो चुका पत्रकार, समाज में आये इस बदलाव का प्रमुख कारण है। यह ठीक है कि अपने राजनैतिक जीवन के चरमोत्कर्ष तक पहुँच चुके व्यक्तित्वों व महत्वपूर्ण पदो को सुशोभित कर रहे जनप्रतिनिधियों से रूबरू होने, उन्हें अपने कैमरे की कैद करने या फिर अपने भीतर उमड़ते-उमड़ते सवालातों का जवाब चाहने की इच्छा लगभग हर खबरनवीस में रहती है लेकिन इधर पिछले कुछ अरसे देखकर को मिल रहा है कि पत्रकार समुदाय के एक बड़े हिस्से की आस्था अपने पेशे के प्रति न होकर राजनैतिक दलों के प्रति होने लगी है और वह जाने-अनजाने में एक जिम्म्मेदार व्यक्तित्व का किरदार निभाने की जगह किसी राजनैतिक दल के कार्यकर्ताओं की भांति व्यवहार करने लगे है। मीडिया पर हावी कुछ बड़े घरानों व पूँजीपति समूहों ने मझौले व छोटे समाचार पत्रों के समक्ष आ रही इस व्यवहारिक कठिनाई का फायदा उठाते हुऐ अपने समाचार पत्रो या मीडिया संस्थानों को पूरी तरह बिकाऊ माल बनाकर रख दिया है और हालातों के मद्देनजर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानो सरकार या मजबूत पक्ष जो कुछ भी जनता के सामने प्रस्तुत करना चाहे उसे पैसे के दम पर आसानी से जनपक्ष को दिखाया या समझाया जा सकता है। इन हालातों में नेताओं अथवा सत्ता के प्रतिनिधियों का प्रेस से रूबरू होना या फिर तथाकथित रूप से उनके सवालों के जवाब में उलझना जरूरी नही रह गया है बल्कि एक पूर्व नियोजित कार्यक्रम की तर्ज पर कुछ सवाल व जवाब तय कर ऐसे पत्रकारों को बांट दिये जाते है जो सत्तापक्ष या फिर नेता की बात जनसाधारण तक पहुँचाने में मददगार साबित हो। पत्रकारिता के इस तरीके को पीत पत्रकारिता का नाम भले ही दिया गया हो लेकिन सत्तापक्ष ही नही बल्कि विपक्ष के भी तमाम नेताओं को यह तरीका बेहद पसंद आता है और अपनी-अपनी जरूरत व खबर की कीमत के हिसाब से मीडिया के एक बड़े किन्तु साधनसम्पन्न तबके के साथ तालमेल बैठाकर वाहवाही लूटने या फिर अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बने रहने का यह तरीका नया नही है। हांलाकि कुछ उत्साही नौजवान या फिर अपने समाचार पत्र को नई बुलन्दियाँ देने की सोच रखने वाले अनजान चेहरे ऐसे मौकों पर भी कुछ ऐसी खबरें ले उड़ते है कि नेताओं व सरकारी तंत्र की तमाम तरकीबे बेकार साबित होती दिखाई देती है और सोशल मीडिया पर बढ़ रहे खबरों के आदान-प्रदान के सिलसिले के बाद तो यह सब कुछ ज्यादा ही आसान हो गया है लेकिन नेता अपनी राजनैतिक कारगुजारियों से बाज आते नही दिखते और पत्रकारों के तमाम छोटे-बड़े समूह ऐसे अवसरों का प्रयोग समाज का ध्यान अपनी ओर खींचने से करने में नहीं चूकते। सत्ता और कलम की ताकत के बीच जोर-आजमाइश का यह सिलसिला नया नही है बल्कि अगर भारत के लोकतांतत्रिक इतिहास पर एक नजर डालकर देखे या फिर आजादी के आन्दोलन के दौरान सामने आये घटनाक्रमों का सरसरी तौर पर मुआवना करें तो हम पाते है कि नेताओं व पत्रकारों के बीच इस तरह की नोंकझोंक कोई नयी बात नही है लेकिन यहीं सक्षम नेता और राजनैतिक दल जब विपक्ष का हिस्सा होते है तो इनके सुर बदले हुए होते है और तत्कालीन परिस्थितियों में ऐसा प्रतीत होता है कि मानो जनता के दर्द का अहसास इन विपक्षी नेताओं को कुछ इस तरह टीस रहा है कि यह मीडिया के साथ मिलकर जनता के हर दर्द को बांटना या कम करना चाहते है। हमें राजनीतिज्ञों के चाल-चरित्र से कोई शिकायत नही होनी चाहिऐं और न ही यह उम्मीद करनी चाहिऐ कि सत्ता पक्ष पत्रकारों की भावनाओं के सम्मान अथवा आम जन तक अपनी उप्लभ्धियों व योजनाऐं पहुंचाने के नाम पर भविष्य में अपनी कार्यशैली में बदलाव लायेगा लेकिन अगर पत्रकार समुदाय व मीडिया के सभी चित-परिचित संसाधन सत्तापक्ष के नेताओं के इस प्रकार के व्यवहार को एक मुद्दा बनाते हुऐ इसके खिलाफ खड़े होने का मन बना ले तो सरकारी पक्ष व सत्ताधारी राजनैतिक दल के लिऐ परेशानियों का नया सिलसिला शुरू हो सकता है किन्तु सवाल यह है कि सरकारी विज्ञापनों व मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष समेत तमाम तरह की अन्य मदो के जुगाड़ से बड़ी ही परेशानी के साथ अपना प्रकाशन जिन्दा रखने के लिऐ जद्दोजहद कर रहे तमाम छोटे व मझोले समाचार पत्रों के पत्रकार रूपी सम्पादक व स्वामी अपनी परेशानियों से लड़ने को आवश्यक मानी जा रही पूँजी की व्यवस्था के लिऐ किधर की ओर रूख करें। यह सवाल बड़ा गंभीर है और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व व संघ के रणनीतिकारों ने इन तमाम तथ्यों का गंभीरता से अवलोकन करने के बाद ही इस रणनीति को अंजाम दिया मालुम होता है। इसलिऐ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के देहरादून दौरे पर आयोजित प्रेस वार्ता में आमंत्रित न किये जाने के मुद्दे पर आक्रोशित पत्रकारों व छोटे या मझोले स्तर के समाचार पत्रों को अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिऐ ऊल-जलूल व स्तरहीन बयानबाजी करने से बचने की कोशिश करते हुऐ प्रायोजित खबरों के पीछे छिपे सच को जनता तक पहुंचाने के प्रयास जारी रखने चाहिऐं। हो सकता है कि सत्ता के मद में चूर भाजपा साधनहीन पत्रकारों के इन प्रयासों को शुरूवाती दौर में अनदेखा करने की कोशिश करें और विज्ञापन रूपी उत्कोच के आंबटन के मौके पर भी विद्रोही तेवरों वाले समाचार पत्रों व पत्रकारों से परहेज ही किया जाय लेकिन अगर कलम की ताकत झुकी नही व उसने समझौता करने से इनकार कर दिया तो नेताओं व उनके समर्थकों को इस ताकत का अहसास होगा और अब वक्त आ गया है कि व्यापक जनहित में लोेकतंत्र को मजबूती प्रदान करने के लिऐ मीडिया अपनी उपस्थिति का अहसास कराये।

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