आरोंपो-प्रत्यारोंपो के बीच (प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन पर विशेष) | Jokhim News

Thursday, October 19, 2017

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आरोंपो-प्रत्यारोंपो के बीच (प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन पर विशेष)

आर्थिक मोर्चे पर असफल नजर आ रही मोदी सरकार अपनी दोबारा वापसी को लेकर पूरी तरह अश्वस्त
बुलैट ट्रेन का सपना साकार करने की कोशिशों में जुटी केन्द्र की मोदी सरकार की कार्यशैली पर सवालिया निशान उठने शुरू हो गये है और यह माना जा रहा है कि ठीक गुजरात विधानसभा चुनावों से पहले देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी राजनैतिक चाले चलनी शुरू कर दी है। हांलाकि राजनीति के इस खेल में सत्ता पक्ष द्वारा चुनावी घोषणाऐं करना या फिर उद्घाटन व अन्य कार्यक्रमों के जरिये अपनी आगामी योजनाऐं रखना कोई नयी बात नही है और चुनावी सफलता या असफलता के बाद सत्तापक्ष द्वारा इन चुनावी घोषणाओं अथवा योजनाओं व शिलान्यास कार्यक्रमों को ठण्डे बस्ते में डाल देना भी कोई बड़ी बात नही है लेकिन भारत सरकार के रेलवे मंत्रालय की लापरवाही के चलते जिस प्रकार एक के बाद एक कर रेल दुघर्टनाऐं सामने आ रही है और रेल मंत्रालय के लिऐ अलग से बजट प्रस्तुत करने की परम्परा से हटकर चलने व सुधार के नाम पर विभिन्न मदो में किराया या रेलवे प्लेटफार्म टिकट बढ़ाऐ जाने के बावजूद व्यवस्था में किसी भी तरह का सुधार देखने को नही मिल रहा है, उसे देखते हुऐ मोदी सरकार का बुलैट ट्रेन चलाने का प्रयास हास्यास्पद ही कहा जा सकता है किन्तु राजनैतिक आफवाहें फैलाने में माहिर भाजपा से जुड़े राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के रणनीतिकारों ने सरकार की तमाम विफलताओं को छुपाते हुऐ बुलैट ट्रेन को लेकर भारत और जापान के बीच हुऐ समझौते को ऐतिहासिक करार देना शुरू कर दिया है तथा प्रचारतंत्र में चल रहे खबरनुमा विज्ञापनों को देखने में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानो जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे खुद भाजपा के प्रचार मंत्री बन मोदी के साथ गुजरात भ्रमण पर निकले हो। अगर वर्तमान हालातों पर गौर किया जाय तो हम पाते है कि इस वक्त सिर्फ देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही नही बल्कि उनकी सरकार के तमाम मंत्री व अमित शाह समेत भाजपा के अन्य महत्वपूर्ण नेता देश के अलग-अलग हिस्सों में कार्यक्रमों के आयोजनों के माध्यम से स्थिति का जायजा लेने की कोशिश कर रहे है और सरकारी खर्च पर होने वाले सांस्कृतिक व रंगारंग कार्यक्रमों के अलावा विभिन्न घोषणाओं या फिर विवादित बयानों के माध्यम से जनता का ध्यान बंटाने की कोशिश की जा रही है। सरकार यह समझ चुकी है कि नोटबंदी के बाद देश की जनता के सर पर जीएसटी लादने का सरकारी फैसला आवाम को पंसद नही आ रहा है और सरकार के इन दो फैसलो के अलावा अन्य तमाम विवादित मुद्दो में सरकार की तथाकथित दखलंदाज़ी का सीधा फर्क राष्ट्रीय विकास दर पर पड़ना शुरू हो गया है लेकिन अब केन्द्र सरकार इन स्थितियों में भी नही है कि अपने आगे बढ़े कदमों को वापस खींचकर पहले जैसे हालात वापस ला सके। इसलिऐं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार के मंत्रियों के अलावा भाजपा व संघ के रणनीतिकारों की पूरी कोशिश है कि जनता का ध्यान मूल समस्याओं से हटाने के लिऐ कुछ नई चर्चाओं व विवादों को जन्म दिया जाय। सत्तापक्ष के पास साम्प्रदायिक दंगे कराना इसका अन्तिम विकल्प है और हालात यह इशारा कर रहे है कि आगामी लोकसभा चुनावों से पहले इस विकल्प को अंजाम तक अवश्य पहुँचाया जायेगा लेकिन हाल-फिलहाल तीन तलाक, सड़क पर नमाज, बकरा ईद पर कुर्बानी व गौवंश की हत्या जैसे मुद्दों को हवा देकर माहौल को गरम रखने का प्रयास किया जा रहा है और खुले बाजार में पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती कीमतों पर विवादित बयान देकर सरकार के मंत्री जनता की नब्ज पहचानने का प्रयास कर रहे है। भाजपा के नेताओं को यह अंदाजा है कि पहले नोटबंदी के चलते आयी परेशानी और फिर जीएसटी लागू होने के बाद सामने आ रही व्यवहारिक दिक्कतों ने संगठन की मजबूती में अहम् योगदान देने वाले बनिया (छोटे व्यापारी) समुदाय को नाराज कर दिया है और चुनावी मौके पर इस तरह की नाराजी भाजपा को हर मोर्चे पर भारी पड़ सकती है लेकिन भाजपा व संघ के रणनीतिकारों का यह भी मानना है कि अपनी सामाजिक सुरक्षा व दंगो की स्थिति में बाजार पर होने वाले अप्रत्याशित हमलों से बचने के लिऐ पूरी तरह संघ के कार्यकर्ताओं पर निर्भर यह बड़ा वोट बैंक देर-सबेर उसके पास वापस लौट ही आयेगा। लिहाजा भाजपा या केन्द्र सरकार बाजार में नजर आ रही उथल-पुथल को लेकर ज्यादा चिन्तित नजर नही आती और न ही देश के विभिन्न हिस्सों में लगातार बढ़ रही मंहगाई व कालाबाजारी की समस्या उसे ज्यादा चिन्तित करती है क्योंकि एक धूर्त राजनेता के रूप में भाजपा के योजनाकार यह अंदाजा लगा चुके है कि मंहगाई के चलते सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले निम्न आय वर्ग का राजनैतिक व चुनावी समर्थन प्राप्त करने के लिऐ घोषणाओं या राहतों की नही बल्कि ठीक चुनावी मौके पर शराब व चुनावी खर्च की बरसात किया जाना जरूरी है और महंगाई को लेकर सबसे ज्यादा चिल्ल-पौ करने वाले देश के मध्यम वर्ग को केन्द्र सरकार ने पहले ही इतने पचड़ो में डाल दिया है कि फिलहाल वह जो अपना है उसे ही बचाने में जुटा है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि विभिन्न मोर्चो पर मिल रही असफलता व लगातार बढ़ रही मंहगाई की चर्चाओं को मिल रहे विस्तार को देखकर सरकार हैरान तो है लेकिन अपने चुनावी जीत को लेकर वह हर मोर्चे पर अश्वस्त नजर आ रही है क्योंकि सत्तापक्ष के नेताओं का मानना है कि विपक्ष के पास चुनावी चेहरे के न होने के साथ ही साथ रणनीति का भी आभाव है और मंहगाई समेत तमाम मुद्दो पर स्पष्ट नजर आ रहे जनाक्रोश के बावजूद विपक्ष, जनपक्ष को साथ लेकर सरकार का विरोध करने से बचता दिख रहा है। हो सकता है कि कांग्रेस समेत तमाम विपक्ष की रणनीति ठीक लोकसभा चुनावों के मौके पर सरकार की घेराबंदी की हो या फिर कांग्रेस के नेताओं को यह लग रहा हो कि सरकारी तुगलकशाही के विरोध में मतदान करने निकली जनता विकल्प के आभाव में खुद उसके समर्थन में खड़ी दिखाई देगी लेकिन हालात कुछ और ही इशारा कर रहे है। सरकार के तमाम गलत साबित हो चुके फैसलों व इनके जनता पर पड़ते विपरीत प्रभाव के बावजूद मोदी के समर्थक न सिर्फ सरकार के भविष्य को लेकर अश्वस्त है बल्कि सरकार के हर फैसले को राष्ट्रवाद व राष्ट्र के पुर्ननिर्माण से जोड़ते हुऐ वह एक ऐसा माहौल बनाने का प्रयास कर रहे है कि मानो भाजपा की वर्तमान सरकार या फिर किसी भी चुनाव में भाजपा प्रत्याशी का विरोध न सिर्फ देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध है बल्कि ठीक राष्ट्रद्रोह सरीका है जबकि कांग्रेस समेत समुचा विपक्ष अपना पक्ष रख पाने में असफल नजर आ रहा है और वैचारिक रूप से ज्यादा मजबूत नजर आने वाला वामपंथ अभी इस असंमजस में दिख रहा है कि संकट की इस घड़ी में वह एक बार फिर कांग्रेस के पीछे खड़े होकर उसे मजबूती देने का प्रयास करें या फिर खुद की राजनैतिक जमीन तैयार करने के लिऐ नये सिरे से कोशिश की जाय। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि वर्तमान हालातों में सरकार के फैसलों, नीतियों व राजनैतिक विचारधाराओं के खिलाफ एक माहौल तैयार कर व्यापक जनान्दोलन खड़ा किया जा सकता है और सरकार के तमाम निर्णयों व पैंतरेबाजी से कसमसा रही जनता बहुत ही आसानी के साथ आन्दोलनकारी नेताओं के पीछे खड़ी नजर आ सकती है लेकिन सवाल यह है कि क्या सत्ता के शीर्ष पदो पर किया जाने वाला कोई भी बदलाव उन तमाम नीतियों, सिद्धान्तों व योजनाओं में कोई भारी बदलाव ला सकता है जिन्हें पूर्व में कांग्रेस के योजनाकारों ने ही तैयार किया है। यह सब इतना आसान नही है क्योंकि उदारवाद और बहुराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था जैसे रागो का अलाप करते-करते हम इतना आगे निकल चुके है कि यहाँ से एकाएक वापसी की राह पकड़ना मुश्किल ही नही बल्कि नामुमकिन नजर आने लगी है। इन हालातों में जनान्दोलन के जरिये सत्ता तक पहुँचने की राह तलाशने वाले लोग यह समझ पाने में असमर्थ है कि वह जनता के बीच जाने के लिऐ अपने लक्ष्य का निर्धारण किस तरह कर सकते है और इसी असमंजसता के पीछे मोदी सरकार को अपनी राजनैतिक सफलताओं का राज छुपा नजर आ रहा है।

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