असमजंसता भरे माहौल में | Jokhim News

Thursday, September 21, 2017

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असमजंसता भरे माहौल में

राजनैतिक सूझबूझ व दूरदर्शिता के आभाव में पूरी तरह असफल दिख रही टीएसआर सरकार को लेकर अमित के प्रस्तावित दौरे का इंतजार
उत्तराखंड में चल रही राजनैतिक गतिविधियों पर अगर गंभीरता से गौर करें तो हम पाते है कि अपने गठन के बाद से ही सुस्त दिख रही पूर्ण बहुमत की सरकार इधर पिछले कुछ दिनों से तेजी में दिखाई दे रही है और मंत्रियों व सत्तापक्ष के विधायकों के बीच एक दूसरे से बेहतर कर दिखाने की होड़ ज्यादा तेज हो गयी है। हांलाकि यह सरकार गठन के वक्त ही तय लग रहा था कि अपने संघी सम्बन्धों या फिर किसी समझौते के तहत मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल करने में सफल रहे त्रिवेन्द्र सिंह रावत अपने भारी भरकम मंत्रियों पर नियन्त्रण नहीं रख पायेंगे और सदन में पूर्ण बहुमत होने के बावजूद सरकार की स्थिति ढ़ुलमुल व खींचतान वाली रहेगी लेकिन मुख्यमंत्री ने कुर्सी संभालने के बाद कतई तटस्थता वाला रवैय्या अपनाया और विभिन्न मंत्रालयों में हस्तक्षेप न होने व विधायकों के सर पर सवार आलाकमान के डर के चलते सरकार के छह महिने सकुशल गुजर गये किन्तु पिछले कुछ दिनों से हालात कुछ बदले-बदले नजर आ रहे है और जनता के बीच बढ़ते जा रहे आक्रोश को देखकर लग रहा है कि हाईकमान ने प्रदेश के मुखिया को कोई न कोई चेतावनी जरूर दी है। यह अकारण नही है कि राज्य सरकार के मुख्य कर्ताधर्ता माने जा रहे मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव ओमप्रकाश एकाएक ही लम्बी छुट्टी पर चले गये है और सरकार अपने फैसलों से ज्यादा लोकतांत्रिक व जनप्रिय दिखने की कोशिश कर रही है। सरकार ने सत्तापक्ष के कुछ विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों के लिऐ अलग से धन मुहैय्या कराये जाने की गुपचुप घोषणा के जरिये अपना पक्ष मजबूत करने की कोशिश तो की है साथ ही साथ अवकाश प्राप्त कार्मिकों का कार्यकाल न बढ़ाये जाने अथवा उन्हें नयी जिम्मेदारी न दिये जाने की घोषणा कर सरकार ने यह भी साबित किया है कि वह बेरोजगारों के हितों को लेकर भी चिन्तनशील है। इतना ही नही मुख्यमंत्री ने अपना विशेषाधिकार माने जाने वाले मंत्रियों व नौकरशाहों के विदेश दौरों को लेकर पाबन्दी भी हटायी है और मुख्यमंत्री पिछले कुछ समय से मीडिया के एक हिस्से के साथ मिल बैठ कर यह संदेश देने की कोशिशों में भी लगे है कि मीडिया से बनायी गयी उनकी दूरी को लेकर तमाम तरह की अफवाहें बेफिजूल है। सरकार में शामिल विभिन्न मंत्री भी अपनी कार्यशैली में बदलाव करते हुऐ खुद को तेजतर्रार साबित करने में जुटे है और लगभग एक पखवाड़े तक चलने वाले कार्यक्रमों, साईकिल रैली व अन्य माध्यमों से जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि वह व्यापक जनहित को लेकर चिन्तित व प्रयत्नशील है लेकिन इस सारी जद्दोजहद व जल्दबाजी ने कई अन्य समस्याओं को जन्म देना शुरू कर दिया है और सरकारी तंत्र के भीतर से छनछनकर आ रही खबरों को सही माने तो हम यह कह सकते है कि आने वाले कल में सरकार द्वारा अपने कई फैसलों को वापस लेने का मन बना लेने के बावजूद उसे विभिन्न मोर्चो पर आन्दोलनों का सामना करना पड़ सकता है। अपनी कार्यकुशलता साबित करने के चक्कर में प्लस-माईनस के फेर में उलझे माननीय शिक्षा मंत्री के रवैय्ये को लेकर तो अध्यापकों ने मोर्चा खोला ही है साथ ही साथ महिला सशक्तिकरण मंत्री की प्रस्तावित साईकिल रैली के संगठन का सहयोग मिलने के बावजूद इस विषय पर स्पष्ट दिख रही स्थानीय प्रशासन की असमंजसता के चलते किसी भी अनहोनी की आंशका से इनकार नही किया जा सकता। उपरोक्त के साथ ही साथ विभिन्न विभागों के कर्मचारी आन्दोलन का मन बनाते हुऐ अपनी नाराजी को स्पष्ट जाहिर कर चुके है तथा सचिवालय कर्मचारी अधिकारी संघ में भी आन्दोलन की सुगबुगाहट थमी नही है। स्थितियों को अनुकूल जान प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस समेत अन्य पार्टिया स्थानीय निकायों के सीमा विस्तार व सरकारी नियन्त्रण वाली राशन की दुकानों को बंद करने के मंत्रीमण्डल के हालिया फैसले के खिलाफ बड़ा आन्दोलन खड़ा करने का मन बना रही है और पहाड़ में शराब बिक्री के विरोध में चल रहे महिलाओं के आन्दोलन के सुर मध्यम हो जाने के बावजूद जनता का आक्रोश अभी कम नही हुआ है। इन हालातों में यह तमाम सरकार विरोधी ताकतें एकसाथ अपने-अपने मुद्दों को लेकर सरकार का विरोध करने का मन बनाती है तो यह निश्चित जानिये कि सदन में पूर्ण बहुमत के बावजूद सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती है। इस आड़े वक्त में अगर सरकार के मंत्री व सत्तापक्ष के विधायकों का एक छोटा हिस्सा भी व्यापक जनहित को मुद्दा बनाते हुऐ स्थानीय स्तर पर आन्दोलन कर रही ताकतों के साथ जा खड़ा होता है तो यह निश्चित जानियें कि अमित शाह, मोदी या फिर संघ के आर्शीवाद के बावजूद कुर्सी पर बने रहना व राज्य की कानून व्यवस्था को पूरी तरह नियंत्रण में रखना त्रिवेन्द्र सिंह रावत के लिऐ आसान नही होगा और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में प्रदेश का दौरा करने का मन बना चुके अमित शाह के कार्यक्रम के दौरान कई ऐसे मुद्दे व घटनायें सामने आयेंगे कि सरकार चाहकर भी अपनी किरकिरी होने से नही रोक पायेगी लेकिन राजनैतिक दांवपैंचो से अनजान व अनुभवहीन मुख्यमंत्री अपने निष्क्रिय सलाहकारों की फौज के साथ इन तमाम समस्याओं का अपने ही अंदाज में समाधान ढूढ़ने में जुटे है और सरकार के मंत्रियों का भाजपा मुख्यालय में बैठने का दिन नियत कर या फिर अपने एक विशेषाधिकार्याधिकारी का प्रतिदिन भाजपा मुख्यालय में बैठना सुनिश्चित कर मुख्यमंत्री यह मान रहे है कि वह शीघ्र ही जनाक्रोश को कम करने में सफल होंगे। हांलाकि सदन में सरकार के पूर्ण बहुमत को देखते हुऐ यह माना जा सकता है कि भाजपा के लिऐ हाल-फिलहाल कोई बड़ा खतरा नही है और न ही यह उम्मीद की जा सकती है कि राजनैतिक रूप से पूरी तरह निष्क्रिय दिख रही कांगे्रस, भाजपा विधायक दल में तोड़-फोड़ जैसा कोई करिश्मा ही कर पायेगी लेकिन राजनीति की बिसात में सिर्फ सत्ता में बने रहना ही राजनैतिक दलों का मूलमंत्र नही है बल्कि सत्तापक्ष के नेताओं को समय-समय पर होने वाले विभिन्न चुनावों के माध्यम से अग्नि परीक्षा के दौर से गुजरते हुऐ अपनी लोकप्रियता को साबित करना पड़ता है और उत्तराखंड की भाजपा व वर्तमान सरकार के समक्ष स्थानीय निकायों, पंचायतों व लोकसभा चुनावों के रूप में एक बड़ी चुनौती उसका इंतजार कर रही है। यह ठीक है कि राज्य में पंचायत व स्थानीय निकायों के चुनाव नितांत स्थानीय मुद्दो पर ही लड़े जाते है और सत्तापक्ष इन चुनावों में अपने बेनर तले प्रत्याशी न उतारने की बात कर एक बड़े झंझट से आसान मुक्ति भी पा सकता है लेकिन भाजपा के समक्ष असली चुनौती आगामी लोकसभा चुनावों में राज्य की पाँचों ही लोकसभा सीटों को एक बार फिर भाजपा की झोली में डालने की है और अपने इसी महत्वपूर्ण मिशन को एक अंजाम तक पहुँचाने की कोशिशों के तहत अमित शाह उत्तराखंड आने का मन भी बनाये हुऐ है। अब यह तो वक्त ही बतायेगा कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में अमित शाह का यह प्रस्तावित दौरा किस हद तक भाजपा कार्यकर्ताओं में जान फुंकने में सफल होगा और वह किस तरह भाजपा से नाराज दिख रहे अपने प्रतिबद्ध मतदाताओं को मनाने की पहल करेंगे लेकिन अगर सूत्रों से मिल रही जानकारियों को सही माने तो हम यह कह सकते है कि अमित शाह के इस दौरे के बाद राज्य की वर्तमान सरकार व उसकी कार्यशैली में कई तरह के परिवर्तन देखने को मिल सकते है और सरकार को भी अपने कई बड़े फैसलों पर पुर्नविचार करने के नाम पर अपने आगे बढ़े कदम पीछे खींचने पर मजबूर होना पड़ सकता है। यह तो वक्त ही बतायेगा कि संगठनात्मक स्तर पर संभावित दिख रही इन तमाम छोटी-बड़ी व्यवस्थाओं व परिवर्तन की संभावनाओं के बाद राज्य सरकार को वापस पटरी में आने में कितना वक्त लगेगा और सत्ता पक्ष के सर्वोच्च नेता अमित शाह के दिशा निर्देशों को राज्य की जनता किस अंदाज में लेगी लेकिन इतना तय है कि खाली होते दिख रहे राज्य सरकार के सरकारी खजाने से व्यापक जनहित की तमाम योजनाओं एवं राज्य निर्माण के बाद लगातार बढ़ती जा रही आम आदमी की संभावनाओं को परवान चढ़ाया जाना संभव नही है और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हाल-फिलहाल में उत्तराखंड सरकार को किसी भी तरह की राहत अथवा आर्थिक पैकेज देने के मूड में नही है। इन हालातों में यह तय है कि सत्ता का कांटो से भरा ताज भले ही जिस सर पर भी सजे या फिर सरकार में जिसे भी मंत्रीमण्डल के सदस्य के रूप में शामिल किया जाय, जन सामान्य की समस्याऐं हाल-फिलहाल कम नही होने वाली और न ही उन परिस्थितियों में कोई मूलभूत बदलाव आने की संभावना है जिनसे यह राज्य लगातार दो-चार हो रहा है। हां इतना जरूर हो सकता है कि अमित शाह के इस प्रस्तावित दौरे के बाद राज्य में छाये दिख रहे आन्दोलनों के बादल फिलहाल कुछ समय के लिये टल जाये और अपने तमाम जनविरोधी फैसलों पर पुर्नविचार करने के नाम पर राज्य सरकार जनपक्ष से थोड़े समय की मोहलत ले लें लेकिन यह किसी समस्या का स्थायी समाधान नही है और न ही इन समीकरणों का बार-बार इस्तेमाल कर काई भी राजनैतिक दल जनता के बीच अपनी साख व जनसमर्थन को कायम रख सकता है।

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