बदली हुई प्राथमिकताओं के बीच | Jokhim News

Thursday, November 23, 2017

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बदली हुई प्राथमिकताओं के बीच

गुरूग्राम में मासूम की हत्या व देवभूमि में चल रहे किडनी के व्यापार ने तंत्र पर खड़े किये कई सवाल।
लगातार मिल रहे समाचारों व खबरों के हवाले से कहा जा सकता है कि लगातार विकास की ओर बढ़ रहे हमारे देश भारत में स्कूल से लेकर अस्पताल तक कुछ भी सुरक्षित नही रह गया है और हिंसक आंतकी वारदातों या फिर सामूहिक हत्याकाण्डों के लिऐ विदेशी मुल्कों द्वारा रची जा रही साजिशों व चन्द फिरकापरस्त ताकतों को कुसूरवार मानने वाले राजनेता कत्लोगारत की इन तमाम बडी-बड़ी वारदातों पर चुप्पी ओढ़े बैठे है। हांलाकि सरकारी तंत्र ने यह अभी तक नही स्वीकारा है कि हत्या की इन साजिशों व सामाजिक रूप से बढ़ रहे अपराधों के लिऐ व्यवस्था ही पूरी तरह जिम्मेदार है और अपराधमुक्त भारत बनाने के लिऐ कई तरह की व्यवस्थाओं व सुविधाओं का पूर्ण रूप से सरकारीकरण जरूरी है लेकिन जनता के बीच चल रही चर्चाओं से ऐसा जरूर प्रतीत होता है कि इन पिछले दो-तीन दशकों में हमने बहुत कुछ खोया है और उदारवादी अर्थव्यवस्था को अंगीकार करने के नाम पर पूंजीपतियों व चन्द बड़े औद्योगिक समूहों की धन अर्जित करने की लगातार बढ़ रही हवस ने आम आदमी के सोचने-समझने का तरीका ही बदल दिया है। यह ठीक है कि संसाधनों के बढ़ते प्रभाव व सूचना क्रान्ति के तेजी से बढ़ रहे कदमों के चलते विचारों व समाचारों का आदान-प्रदान तेजी से होने के कारण अपराध घटित होने के बाद अपराधी को बेनकाब करने व मामलों का खुलासा करने का दबाव भी सरकार पर पड़ा है और अब किसी आपराधिक मामले के खुलासे के बाद उसे ज्यादा देर तक दबाये रखना पुलिस व कानून व्यवस्था के लिऐ संभव नही है लेकिन अधिकांश मामलों में यह देखा जा रहा है कि घटना या दुर्घटना के घटित होने के बाद सरकार की नीयत उसे तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने या फिर असल अपराधी को बचाने की ही है और जोड़-तोड़ के इस खेल में अधिकांश दुर्घटनाओं के बाद जुर्म के हिसाब से तय कानून के फंदे के लिऐ गर्दन की तलाश शुरू होती दिख रही है तथा अधिकांश मामलों में तो सरकार की कोशिश है कि वह किसी भी कीमत पर इन किस्सों को कहानी में तब्दील कर भूली-बिसरी यादों की तर्ज में ठण्डे बस्ते में ले जाये जिससे आम आदमी का आक्रोश कुछ कम होता दिखार्द दे। हम देख रहे है कि कुछ ही समय पूर्व तक सरकार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी समझे जाने वाले स्कूल व अस्पताल वर्तमान में देश की भीतर चल रहे तमाम उद्योगों से ज्यादा फायदे का धंधा बनकर उभरे है और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के तहत चुनकर आयी वर्तमान सरकारें इस तरह के तमाम सरकारी संस्थानों का निजीकरण करते हुऐ अपनी जिम्मेदारी व इस अनोत्पादक कार्य में होने वाले खर्च से बचना चाहती है लेकिन तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते निजी स्तर पर खोले जा रहे शिक्षा के मन्दिरों व जीत-जागते भगवान का घर कहे जाने वाले चिकित्सालयों में हर कदम पर लापरवाही व मानकों का उल्लंघन अवश्य दिखाई देता है। इस लापरवाही अथवा आर्थिक फायदे के लिऐ जानबूझकर किये जा रहे तय मानको के उल्लंघन को लेकर इन संसाधनों का जमकर उपभोग कर रही जनता अक्सर चुप ही रहती है और प्रतिस्पर्धा की दौड़ में बने रहने के लिऐ जानबूझकर बहुत कुछ अनदेखा करना उसकी मजबूरी भी है लेकिन जब गुरूग्राम जैसी घटनाऐं सामने आती है और स्कूल के कैम्पस में किसी नाबालिग का यौन उत्पीड़न कर हत्या कर दी जाती है या फिर किडनी समेत तमाम मानवीय अंगों के दलाल निजी अस्पतालों के जरिये इस प्रकार की सौदेबाजी का पूरा रैकेट चलाते दिखते है तब जनसामान्य का गुस्सा फूट पड़ता है और वह आक्रोशित होकर सरकार व सरकारी तंत्र की खिलाफत को तैयार दिखती है। हालातों के मद्देनजर सरकार भी खिलाफत करने वालों के खिलाफ कोई छोटा-मोटा लालीपाॅप थमा देती है और कुछ ही अंतराल के बाद सबके फायदे को ध्यान में रखते हुऐ चलाया जाने वाला यह गोरखधंधा फिर परवान चढ़ते लगता है लेकिन बेचारी जनता चाहकर भी लूट की इस खुली छूट के खेल का मोहरा बनने से खुद को नही रोक पाती और बेहतर भविष्य या स्वस्थ जीवन के सुनहरें सपने दिखाकर उसे हर मोर्चे पर लूटा जाता है। ऐसे अवसरों पर पुराने दिनों को याद करते हुऐ एक कसक सी तो जरूर उठती है और यह अहसास होता है कि संसाधनों की कमी व सुविधाओं के आभाव वाले वह पुराने दिन वर्तमान हालातों से कहीं ज्यादा बेहतर थे लेकिन इस भागमभाग वाली जिन्दगी में दूसरे को पछाड़कर सबसे आगे निकल सब कुछ हासिल कर लेने की सोच और लीक से हटकर चलने पर सबकुछ खो देने का डर मानवीय स्वभाव जनसामान्य को मजबूर करता है कि वह सच को जान समझ-बूझकर भी अनदेखा करें। घटनाक्रम के सामने आने के बाद नेता या सरकारी नौकरशाह कैसे ही सफाई प्रस्तुत करें या फिर एक सच के सामने आने के बाद दो और दो पांच वाली हालत में तंत्र की अन्य तमाम खामियों को उधेड़ने का कितना ही प्रयास किया जाये लेकिन कुछ ही समय बाद हालात फिर ढ़र्रे पर आते नजर आते है और इस तरह की अव्यवस्थाओं के खिलाफ सुर बुलन्द करने की कोशिश कर रहा आदमी एक बार फिर इन्हीं स्कूलों में प्रवेश लेने अथवा अपने इलाज के लिऐ निजी अस्पतालों में भर्ती होने अथवा बिल कम करवाने के लिऐ जोड़-जुगाड़ ढ़ूँढ़ता नजर आता है। अगर देखा जाय तो इसकी साफ वजह यह है कि या तो देश की जनता को सरकारी तंत्र व इस तंत्र के तहत चल रही तमाम सरकारी व्यवस्थाओं जैसे शिक्षा के लिऐ स्कूल, स्वास्थ्य के लिऐ सरकारी अस्पताल, पेयजल के इंतजामात के लिऐ बनाये गये सरकारी महकमों पर कतई भरोसा नहीं है या फिर इस तंत्र का अहम् किरदार होने की वजह से वह इसकी खामियों से भंली-भांति वाकिफ है। खैर वजह चाहे जो भी हो लेकिन यह सच है कि समाज में आयी आधुनिकता की बयार व एक विशेष तबके के पास आये अंधाधुंध पैसे ने आदमी का रहन-सहन व सोचने का तरीका दोनो ही बदल कर रख दिया है और कुछ विशेष अवसरों को छोड़ दिया जाय तो ऐसा लगता है कि जनसामान्य को अब सरकार से कोई अपेक्षा या उम्मीद भी नही रह गयी है। वर्तमान में एक मासूम की मौत के बाद आक्रोशित दिख रही जनता के समक्ष यह कानून के अनुपालन अथवा अपने नौनिहालों के भविष्य से जुड़ा सवाल हो सकता है और इस तरह के घटनाक्रमों के बहाने सरकारी तंत्र अथवा सत्तापक्ष को घेरने के लिऐ मौके की तलाश में रहने वाले विपक्ष के लिऐ एक बड़ा व ज्वलंत मुद्दा लेकिन असल सवाल यह है कि आखिर वह कौन सी वजह है जो मानको पर किसी भी दृष्टिकोण से खरा न उतरने के बावजूद इन तथाकथित निजी शिक्षण संस्थानों अथवा शिक्षा के मन्दिरों की दुकानदारी तेजी से फल-फूल रही है और व कौन सी वजह है जिनके चलते सरकारी तंत्र अपने आधीन काम करने वाले सरकारी अध्यापकों, डाॅक्टरों अथवा अन्य तमाम तरह की सेवाओं में संलग्न कर्मचारियों से काम नही ले पा रहा हैं ? यह माना कि तंत्र में भ्रष्टाचार की बहुत अन्दर तक पैठ बन चुकी है और बिना किसी निहित स्वार्थ के किसी जनहितकारी योजना अथवा कल्याणकारी घोषणा की बात करना भी बेमानी है लेकिन अपने छोटे फायदे के लिऐ देश के भविष्य को दावं पर लगाना कहाँ की अक्लमंदी कहीं जा सकती है और यह कैसे माना जा सकता है कि मीडिया के एक हिस्से की सर्तकता के चलते जो तमाम तथ्य व घटनाक्रम गुरूग्राम के रायन स्कूल में सामने आये है या आ रहे है वह देश के अन्य हिस्सों में नही घटित हो रहे होंगे। न्यायालय व सरकारी तंत्र को चाहिऐं कि वह न सिर्फ सीबीएससी पेटर्न पर चलने वाले तमाम पब्लिक स्कूलों, मिशनरियों के तहत चलने वाले व अन्य निजी स्कूलों में दी जा रही सुविधाओं, कर्मचारियों के आचरण व शैक्षिक योग्यता के साथ ही निर्धारित मानकों के अनुरूप मान्यता दिये जाने की पुर्नसमीक्षा के आदेश जारी करें बल्कि देश के अन्य तमाम बोर्डो व राज्य सरकार द्वारा अंगीकार की गयी विभिन्न शैक्षिक पद्धतियों को भी इस जाँच के दायरे में रखा जाना चाहिऐं और जाँच के उपरांत मानको को पूरे न करने वाले या फिर इनकी अवहेलना करने वाले संस्थानों के साथ ही साथ इस तरह के संस्थानों को सहायता प्रदान करने वाले अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ भी कार्यवाही की जानी चाहिऐं।

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