बदले हुऐ हालातों में। | Jokhim News

Thursday, November 23, 2017

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बदले हुऐ हालातों में।

विकास व जनपक्षीय सुविधाओं को बहाल करने में नाकाम केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार को भारी पड़ सकती है युवाओं की नाराजगी।
नोटबंदी के लगभग गलत साबित हो चुके सरकारी फैसले व जीएसटी लागू करने के बाद जनता के बीच मची त्राहि-त्राहि के बाद यह तय हो चुका है कि व्यवस्था में सुधार व भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने जैसे क्रान्तिकारी नारो के साथ राष्ट्र की सत्ता पर काबिज हुई देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा की पूर्ण बहुमत सरकार उन तमाम अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी है जिन्हें उसने खुद जन्म दिया था। हांलाकि भाजपा के रणनीतिकार साठ साल बनाम साठ महिने जैसे नारों के साथ अगले चुनावों के लिऐ मैदान में उतरने की तैयारी शुरू कर चुके है और प्रखर हिन्दुत्ववाद को मुद्दा बनाकर अन्य विपक्षी राजनैतिक दलों व धर्मनिरपेक्ष ताकतों की घेराबंदी की कोशिशें शुरू हो गयी है लेकिन लगभग चार साल सत्ता के शीर्ष पद को सम्भालने के बाद मोदी के पिटारे में ऐसा कुछ भी नही है जिसे व्यापक जनहित या लोकतांत्रिक तरीके से किये गये विकास का नाम दिया जा सके बल्कि अगर सोशल मीडिया में समय-समय पर चलने वाली प्रायोजित खबरों व अफवाहों पर ध्यान दिया जाय तो ऐसा प्रतीत होता है कि मानो भाजपा व उसका रणनैतिक सहयोगी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यह उम्मीद कर रहा है कि आगामी लोकसभा चुनावों के लिऐ जनता के बीच जाने से पहले वह इन्हीं अफवाहों व मनगणन्त किस्से कहानियों के दम पर समाज में भय व धार्मिक वैमनस्य का माहौल कायम कर एक बार फिर देश की सल्तनत पर काबिज होने में सफल होगा। ऐसा नही है कि मोदी व उनके सहयोगियों ने जो कुछ भी किया है वह भारत के राजनैतिक इतिहास में पहली बार हुआ है या फिर यह पहला मौका है जब देश की जनता को धर्म व जाति के आधार पर बांटकर लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं पर कब्जेदारी के प्रयास किये गये है लेकिन इतिहास के पन्नो को पलटने पर हम पाते है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को धर्म, भाषा, क्षेत्रीयता अथवा जाति के आधार पर बांटकर अपनी राजनैतिक हैसियत बरकरार रखने की कोशिश करने वाली तमाम राजनैतिक ताकतों ने अपने सत्ताकाल में आम आदमी को मिलने वाली साधारण सुविधाओं व उसकी सहूलियत का ध्यान अवश्य रखा है जबकि वर्तमान की नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार इस संदर्भ में पूरी तरह असफल दिखाई देती है। यह ठीक है कि पिछले कुछ समय से लगातार एकतरफा झुकाव दिखा रहे राज्यों के चुनाव नतीजें तथा उ.प्र. जैसे बड़े राज्य के साथ ही साथ तकनीकी गठजोड़ के बाद बिहार में भी बनी भाजपा के गठबंधन वाली सरकार यह इशारें कर रही है कि आगामी लोकसभा चुनावों में केन्द्र सरकार एक बार फिर पूरी धूमधाम के साथ वापसी कर सकती है लेकिन जीएसटी लागू होने के बाद अनियन्त्रित होते दिख रहे बाजार भाव, बाजार में तेजी से बढ़ती कृत्रिम मंहगाई के साथ ही साथा रसोई गैस, पेट्रोल व डीजल जैसे आवश्यक उत्पादों के दाम बढ़ाने को उतारू दिखाई देती सरकार और सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानों को बंद करने के संदर्भ में सरकारी तंत्र द्वारा उठाया जा रहा महत्वपूर्ण कदम, यह इशारे कर रहा है कि केन्द्र सरकार के कार्यकाल के इस अन्तिम वर्ष में जनता की मुसीबतें और ज्यादा बढ़ सकती है। अब देखना यह है कि आगामी चुनावों में तीन तलाक, गौ हत्या पर प्रतिबंध, छद्म राष्ट्रवाद व तथाकथित हिन्दूवादी मानसिकता जैसे मुद्दे हावी रहते है या फिर अपनी रोजी-रोटी से जुड़े सवालों से जूझता मतदाता सरकार से उन तमाम समस्याओं का समाधान मांगता है जो उसने नोटबंदी से लेकर जीएसटी लागू होने तक झेली है। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि नोटबंदी से जुड़े कई सवालो का सरकार के पास आज भी कोई जवाब नही है और देश की जनता को धीरे-धीरे कर ही सही लेकिन अब यह समझ में आने लगा है कि सरकार के इस फैसले से सबसे बड़ा नुकसान व समय की बर्बादी उसी वर्ग की हुई है जिसकी रोजमर्रा की जिन्दगी में दो हजार के नोट की बड़ी कीमत थी और अब सरकार जीएसटी जैसी व्यवस्था लागू कर न सिर्फ अंधाधुंध तरीके से कर बढ़ा रही है बल्कि सरकार द्वारा पूर्व से जनता को दी जा रही तमाम तरह की छूट व रियायतें एक-एक कर बंद की जा रही है। हांलाकि भाजपा के नेता व कार्यकर्ता जनता को यह समझाने में जुटे है कि इन तमाम तरीकों का इस्तेमाल कर मोदी सरकार तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को पूरी तरह समाप्त करना चाहती है लेकिन सत्तापक्ष के नेताओं की दिनदूनी-रात चैगुनी रफ्तार से बढ़ती नजर आ रही सम्पत्ति को लेकर यह वर्ग भी मौन है और जनपक्ष को यह जवाब भी नही मिल पा रहा है कि तमाम प्रावधानों के तहत काटी जा रही जनपक्षीय रियायतों व बंद योजनाओं के साथ ही साथ सरकार द्वारा जीएसटी व नोटबंदी जैसे माध्यमों से कमाई रकम का उपयोग सरकार किस तरह कर रही है। यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि सरकार द्वारा लागू की गयी नोटबंदी व जीएसटी कानून के चलते बाजार में मंदी का दौर है और लगातार बंद हो रही आद्योगिक इकाईयों के कारण मध्यम वर्गीय समाज का एक हिस्सा अपने रोजगार व आय के संसाधन छिन जाने के डर से खुद को डरा हुआ महसूस कर रहा है। इन हालातों में सरकार का परम् कर्तव्य था कि वह एक श्वेतपत्र जारी कर जनसामान्य को असल हालातों से रूबरू कराते हुऐ हिम्मत बंधाने की कोशिश करती और देश के प्रधानमंत्री अपने अभिभाषणों के जरियें उन योजनाओं का खुलासा करते जो उन्होंने आगामी वर्षो को ध्यान रखकर बनायी है लेकिन सरकार स्वच्छता, शौचालय, नमामि गंगे व धार्मिक वैमनस्यता जैसे मुद्दो में उलझी नजर आ रही है और किसानांे की आत्महत्या जैसे गंभीर विषयों को विपक्ष की साजिश बताकर इसका माखौल उड़ाया जा रहा है। हमने देखा कि देश ही नही वरन् दुनिया के नक्शे में अहम् स्थान रखने वाले जेएनयू विश्वविद्यालय को लेकर सत्तापक्ष के नेताओं ने किस तरह भय का माहौल बनाने की कोशिश की और अपनी लेखनी के माध्यम से सरकार की नीतियों व कार्यशैली पर सवाल खड़ करने वाली एक महिला पत्रकार की दिन दहाड़े हुई हत्या को भाजपा से जुड़े व खुद को मोदी समर्थक कहने वाले एक वर्ग ने किस तरह जायज ठहराने की कोशिश की। हमने यह भी देखा कि समाज के छोटे-छोटे तबको व जातिगत् समूहांे के आपसी वैमनस्य को हवा देकर किस प्रकार दंगाई भीड़ को उपद्रव के लिऐ उकसाने का काम विचारधारा के नाम पर किया जा रहा है और किस अंदाज में देश के प्रधानमंत्री के विदेश दौरो का आधा सच मीडिया के एक छोटे समूह को अपने पक्ष में खड़ा कर जनता तक पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है लेकिन इस तमाम जद्दोजहद का आम आदमी को क्या फायदा है या फिर सरकार गठन के शुरूवाती दौर में सत्तापक्ष के सांसदो द्वारा गोद लिये गये गांव वर्तमान में किन हालातों में है और देश भर में बुलेट ट्रेन चलाने का दंभ भरने वाली भारत सरकार अपने यात्रियों की सुविधाओं को बढ़ाने व लगातार हो रही रेल दुर्घटनाओं को रोकने के लिऐ क्या कर रही है, इस तरह के तमाम ज्वलंत विषयों पर सरकार समर्थक किसी भी कीमत पर बात करने को तैयार नही है। इन हालातों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार व सत्तापक्ष किस तरह के मुद्दो व विषयों को लेकर जनता के बीच जाने वाला है और नोटबंदी को अबतक की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करते रहे सरकार समर्थको के पास जनता व विपक्ष के सवालों का क्या जवाब है? खैर, यह तो वक्त ही बतायेगा कि मौजूदा केन्द्र सरकार व सत्तापक्ष किस मुद्दों या विषयों को लेकर जनता के बीच जाने का मन बना रहा है और आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर सत्तापक्ष व विपक्ष की रणनीति में क्या अन्तर देखने को मिल रहा है लेकिन जेएनयू समेत देश के तमाम विश्व विद्यालयों व छात्रसंघों के चुनावों के नतीजे तो यह ऐलान करते दिखाई दे रहे है कि मोदी को सत्ता के शीर्ष पद तक ले जाने की जिम्मेदार मानी जाने वाली देश की युवा पीढ़ी का सम्मोहन अब धीरे-धीरे कर टूट रहा है और अगर वाकई ऐसा है तो यह सरकार व भाजपा के नेताओं के लिऐ बुरी खबर है क्योंकि देश का युवा वर्ग राजनैतिक हालातों से टकराते हुऐ बड़े-बड़े राजनैतिक व सामाजिक बदलाव लाने का जज्बा ही नही रखता बल्कि समाज के सभी वर्गो में सिर्फ यही वह तबका है जिसे झूठे मुकदमों या कानून की मार कर डर दिखाकर खामोश नही किया जा सकता।

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