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Thursday, November 23, 2017

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छिपे हुऐ ऐजेण्डे के साथ

सरकार की मनमर्जी के खिलाफ सचिवालय कर्मी हुऐ एकजुट, एक बड़े आन्दोलन की सुगबुगाहट
सचिवालय कर्मचारी अधिकारी संघ का कार्य बहिष्कार फिलहाल स्थगित हो गया है और सरकार ने मंत्रीमण्डल के फैसले पर पुर्नविचार करने के लिऐ कर्मचारी नेताओं से पन्द्रह दिन का समय मांगा है लेकिन सचिवालय कर्मियो की इस हड़ताल से नाखुश सरकार समर्थक व भाजपा प्रेमी त्रिवेन्द्र सिंह रावत मंत्रीमण्डल के फैसले को सही ठहराते हुऐ सरकारी तंत्र की कार्यशैली व कर्मकारों की कार्यक्षमता पर सवाल उठा रहे है और बयानों के जरिये यह तर्क प्रस्तुत किया जा रहा है कि जनहित से जुड़े मामलों पर महिनों तक फाइलें लटकाये रखने वाले सचिवालय कर्मियों के प्रति सरकार ने कड़ा रूख अपनाना चाहिऐ। यह माना कि उत्तराखंड राज्य गठन के बाद से ही नौकरशाही इस प्रदेश की लोकतांत्रिक ढ़ंग से चुनी गयी सरकारों पर हावी रही है और ऐसे एक नही बल्कि सैकड़ों उदाहरण प्रस्तुत किये जा सकते है जब शासनतंत्र पर काबिज बाबुओं की फौज ने अपने निजी अथवा सामूहिक हितों को ध्यान में रखते हुऐ सरकार द्वारा लिये गये महत्वपूर्ण फैसलों को धूल फांकने के लिऐ छोड़ दिया हो या फिर इस तरह के फैसलों से जुड़ी फाइल की रफ्तार इतनी धीमी हो गयी हो कि सरकार बदल जाने के कारण घोषणा को अमल में ही नही लाया जा सका हो। यह भी अक्सर देखने में आता है कि उत्तराखंड राज्य में सत्तापक्ष के पार्टी कार्यकर्ता व पदाधिकारी ही नहीं बल्कि सम्मानित जनप्रतिनिधि व सरकार में जिम्मेदार पदो पर बैठे माननीय मंत्रियों समेत तमाम गणमान्य लोग शासन तंत्र पर नौकरशाही के हावी होने व सचिवालय कर्मियो के मनमाने तरीके से काम करने के आरोंप लगाते है लेकिन इन पिछले सत्रह सालो में सरकार का कोई भी फैसला यह नजीर प्रस्तुत नही कर सका है कि उसने सरकारी कामकाज के मामले में मनमर्जी करने वाले या फिर लेट-लतीफ करने वाले किसी सचिवालय कर्मी अथवा वरीष्ठ नौकरशाह के खिलाफ आरोंप भी तय किये हो बल्कि इसके ठीक उलट अगर हाल ही में सामने आये देहरादून के मेयर व जिलाधिकारी विवाद को दृष्टिगत् रखते हुऐ बात करें तो हम पाते है कि नगर निगम क्षेत्र के प्रथम नागरिक व सम्मानित विधायक होने के चलते मेयर विनोद चमोली को जिलाधिकारी की ओर से पर्याप्त सम्मान मिलना चाहिऐं था लेकिन मेयर के धरने व धरनास्थल से सीधे मुख्यमंत्री से हुई वार्ता के उपरांत भी जिलाधिकारी के खिलाफ कोर्ट कोई कार्यवाही न किया जाना यह साबित करता है कि प्रदेश के नेताओं की कोई न कोई दुखती रग इन नौकरशाहो व सचिवालय कर्मियो के पास जरूर है जो उन्हें सरकार के जिम्मेदार पदो पर विराजमान जनप्रतिनिधियों के गुस्से से डर नही लगता। हो सकता है कि इस विवाद के मीडिया में ज्यादा चर्चित हो जाने के बाद दून का जिलाधिकारी बदल दिया जाय और सरकार के इस फैसले से मेयर साहब का गुस्सा भी थोड़ा ठण्डा हो जाय लेकिन सरकारी नौकरी में स्थानांतरण को कोई सजा नही माना जा सकता और न ही यह कहा जा सकता है कि जिलाधिकारी द्वारा नजरअंदाज किये जाने के चलते जनता व समर्थको के बीच खुद को अपमानित महसूस कर रहे मेयर विनोद चमोली की छवि में इस एक और स्थानांतरण के बाद कोई चार चांद लग जायेंगे। इसलिऐं सचिवालय कर्मियों की हड़ताल के परिपेक्ष्य में किसी भी तरह का बयान जारी करने अथवा मंत्रीमण्डल के सचिवालय कर्मियों के वेतन पुर्ननिर्धारण के सम्बन्ध में कोई भी टिप्पणी करने से पहले हमें उन तमाम कारणों की जाँच अथवा तलाश अवश्य करनी होगी जिनके चलते सचिवालय कर्मी या फिर प्रदेश की नौकरशाही स्वंय को किसी भी नियन्त्रण से उपर, अपनी मनमर्जी का मालिक समझते हुऐ स्वच्छंद आचरण करती है। यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि भाजपा की नवगठित सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता के शीर्ष पद को संभालते ही त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने सचिवालय के विभिन्न अनुभागो में बैठे कर्मचारियों व अधिकारियों को लेकर बड़ा भारी फेरबदल किया और अगर सूत्रों से मिल रही खबरों को सही माने तो हम कह सकते है कि इस स्थानांतरण में योग्यता व अनुभव के स्थान पर अधिकारियों व कर्मचारियों की राजनैतिक प्रतिबद्धता व पहुँच का विशेष ध्यान रखा गया। इतना ही नही सरकार गठन के बाद विभिन्न विभागों का दायित्व संभालने वाले मंत्रियो ने भी अपना निजी सचिव समेत तमाम कार्यालय स्टाफ चुनते समय पूर्व के अनुभवों व सम्बन्धों का पूरा लाभ उठाया तथा सचिवालय में तैनात विभागीय कर्मियों, अधिकारियों ,नौकरशाहों को विभागीय आंबटन करते वक्त भी मंत्रियों की पंसद-नापसंद का पूरा ध्यान रखा गया लेकिन इस सबके बावजूद भी समस्या जस की तस है कि और लगभग छह माह के कार्यकाल के दौरान अक्सर यह देखने में आया है कि भाजपा के नेता व कार्यकर्ता समेत सत्तापक्ष के प्रति आस्थावान जनप्रतिनिधि भी सरकारी तंत्र की नाफरमानी व कार्यप्रणाली से खुश नही है। अगर हालातों पर गौर करें तो यह स्पष्ट लगता है कि या तो सरकार समर्थकों का गुस्सा जायज है और सरकार चलाने वाली मुख्य मशीनरी भी सरकारी तंत्र की इस हठधर्मिता के आगे खुद को असहाय महसूस कर रही है या फिर राजनैतिक रूप से सत्ता पर काबिज नेताओं व नौकरशाहों के बीच एक अघोषित गठबंधन हो चुका है और सरकार ने उसे बिना किसी सवाल जवाब पर ध्यान दिये अपनी जिम्मेदारियों का वहन करने की सलाह दी है। इन परिस्थितियों में किसी मेयर, साधारण विधायक या अन्य जनप्रतिनिधि का गुस्सा जायज हो सकता है लेकिन इस समस्या का कोई जायज समाधान सरकार के पास नही है और रहा सवाल सचिवालय तंत्र की संकरी गलियो में विकास योजनाओं व व्यापक जनहित से सम्बन्धित फाइलों के बहुत ही धीमी रफ्तार से बढ़ने का तो इसके लिऐ भी सचिवालय कर्मियों या अधिकारियों को दोषी नही ठहराया जा सकता क्योंकि वह अपनी कार्यकुशलता व अनुभव का परिचय किसी विशेष मामले में जरूरत से ज्यादा जल्दबाजी दिखाकर देते रहते है। हो सकता है कि वेतन विससंगतियों को लेकर त्रिवेन्द्र सिंह रावत मंत्रीमण्डल का हालिया फैसला तार्किक व सही हो लेकिन अनुभव व मानवीय स्वभाव को मद्देनजर रखते हुऐ इसे समयानुकूल नही कहा जा सकता और एक ऐसे वक्त जब राज्य गंभीर वित्तीय संकट के मुहाने पर खड़ा हो तो सरकार कर्मियों द्वारा आहूत कोई भी हड़ताल या कार्यबहिष्कार उस सारे तारतम्य को बिगाड़कर रख सकती है जो इस राज्य की आर्थिकी को छोटे-छोटे जुगाड़ों के जरिये बल दिये हुऐ है। इन हालातों में ज्यादा बेहतर होता कि सरकार पहले ही अपने कदम को सोच-समझकर उठाती और इस बिना वजह की छिछालेदार से बचा जाता लेकिन जब सरकार ने अपने फैसले पर पुर्नविचार का मन बना ही लिया था तो इसे घोषित करने के लिऐ कार्य स्थगन के आवहन व इसे अमलीजामा पहनाये जाने तक इंतजार करने की जरूरत ही क्या थी। क्या यह ज्यादा बेहतर नही होता कि सरकार कर्मचारी-अधिकारी संघ के पहले ही नोटिस पर तत्काल कार्यवाही करते हुऐ उन्हें इस परिपेक्ष्य में पुर्नविचार का आश्वासन देता और बायोमैट्रिक हाजरी व सप्ताह में छह कार्यदिवस के साथ ही साथ पद के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करते हुऐ इस तथ्य की ताकीद की जाती कि राज्य में गठित वर्तमान जनहितकारी सरकार अपने तंत्र में कार्यरत् तमाम कर्मियों को आम जनता से वसूले गये करों के माध्यम से दिये जाने वाले वेतन के सही उपयोग को लेकर पूरी तरह सजग है लेकिन यह सब तभी सम्भव हो पाता जबकि सत्तापक्ष, जनप्रतिनिधि व तमाम राजनेता अपने लक्ष्य व कर्तव्य के प्रति ईमानदार होते और हमारे मुख्यमंत्री व मंत्रीमण्डल के अन्य सदस्यों का कोई छुपा नही ऐजेण्डा नही होता।

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