लोकतांत्रिक परम्पराओं से हटकर | Jokhim News

Thursday, September 21, 2017

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लोकतांत्रिक परम्पराओं से हटकर

तथाकथित हिन्दुत्ववाद व छदम् राष्ट्रवाद की आड़ में खेला जा रहा है भय का साम्राज्य कायम करने का खेल
कन्नड़ भाषा की पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के खिलाफ सामाजिक संगठनो व पत्रकारों के प्रदर्शनो का दौर जारी है और सरकारी तंत्र पर लग रहे इस हत्या के आरोंपियों को प्रोत्साहित करने के आरोंपो के बीच मोदी सरकार के समर्थकों व तथाकथित हिन्दूवादी ताकतों ने दिवगंत पत्रकार को नक्सलवाद का समर्थक साबित करते हुऐ इस हत्या को जायज ठहराया जाना शुरू कर दिया है। पत्रकारों, लेखकों व बुद्धिजीवियों पर नक्सलवाद के समर्थन में खड़े होने अथवा वामपंथी विचारधारा का समर्थन करने का आरोंप लगाया जाना आसान है क्योंकि यह वर्ग जनसमस्याओं व सरकार की कार्यशैली को एक अलग नजरिये से देखकर सरकारी कार्यकलापों में भ्रष्टाचार का खुलासा ही नहीं करता बल्कि व्यापक जनहित को छोड़कर अपना ऐजेण्डा लागू करने वाले नेताओं व कुर्सी पर बने रहने के लिये कई तरह के हथकण्डे अपनाने वाले तथाकथित जनप्रतिनिधियों को जनता के बीच बेनकाब करने का इस वर्ग का अपना एक अलग तरीका होता है जिसके चलते अपने पेशे के प्रति ईमानदार पत्रकार, लेखक या बुद्धिजीवी हमेशा ही सत्तापक्ष के निशाने पर रहता है और सरकार चलाने वाले तंत्र की पूरी कोशिश होती है कि वह इस वर्ग के एक हिस्से को झूठे प्रलोभन व सम्मान देकर अपने पक्ष में रखे या फिर मनमानी करने की राह में बाधा बनने वाले इस वर्ग के दूसरे हिस्से को झूठ के ऐसे जंजाल में फँसा दिया जाय कि वह चाहकर भी अपनी कलम के प्रति ईमानदार न रह सके लेकिन इस सबके बावजूद यह माना जाता है कि लोकतांत्रिक ढ़ंग से चुनी गयी सरकारें या फिर उनके समर्थक ताकत के दम पर इन बुलन्द आवाजों को दबाने का प्रयास नही करते और न ही राजनैतिक दलों की यह कोशिश होती है कि वह जनपक्ष को सामने रखने वाले इस बुद्धिजीवी वर्ग का गला घोंटकर उसकी हत्या पर उतारू हो जाय। गौरी लंकेश की हत्या किसने और क्यों की, इस तथ्य का खुलासा अभी नही किया जा सका है लेकिन यह तथ्य जग जाहिर है कि एक सजग पत्रकार के रूप में वह जनता की आंखो के आगे लगे झूठ के मुलम्में को हटाने का प्रयास कर रही थी और अपने इन्हीं प्रयासों के तहत उन्होंने यह अनुभव किया था कि हिन्दुत्ववादी विचारधारा की बात करने वाली भाजपा जबसे सत्ता पर काबिज हुई है तबसे समाचारों व घोषणाओं का एक मायाजाल देश की जनता के समक्ष प्रस्तुत करने की कोशिश की जा रही है। अपने इस कथन की पुष्टि के लिऐ उन्होंने समय-समय पर कई तर्कपूर्ण लेखो के साथ तर्क भी प्रस्तुत किये थे और अपनी स्थानीय भाषा में वह देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बूसी बसिया(जब भी मुंह खोले झूठ ही बोलने वाला) कहा करती थी। जाहिर है कि उनकी भाषा और शैली मोदी के उन समर्थको को सख्त नगवार गुजरी होगी जो तीन-साढ़े तीन साल के मोदी राज को राष्ट्रीय राजनीति में आये एक बड़े बदलाव का शुभसंकेत व विचारधारा की जीत मानते नही थक रहे है लेकिन इस सबके बावजूद इस तथ्य पर सहज रूप से विश्वास नहीं किया जा सकता कि मोदी समर्थक या फिर हिन्दुत्ववाद की बात करने वाला राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ गौरी लंकेश की हत्या जैसे जघन्य अपराध को अंजाम देने की नीचता तक गिर सकता है। यह ठीक है कि गौरी की हत्या से आक्रोशित कुछ पत्रकार साथियों व सामाजिक संगठनों ने इस विषय में केन्द्रीय सत्ता व भाजपा की हिन्दुत्ववादी विचारधारा पर गंभीर आरोंप लगाये है और शोकाकुल परिजनों ने भी इस तथ्य को स्वीकारा है कि उन्हें स्थानीय स्तर पर कई तरह की धमकियाँ मिल रही थी लेकिन सिर्फ आरोंप लगाने मात्र या फिर स्नेहिल पाठकों व मित्रों के विलाप करने भर से तथ्यों को गंभीरता से नही लिया जा सकता और न ही यह माना जा सकता है कि जनता के प्रति जवाबदेह कोई सरकार या विचारधारा इस तरह की मनमानी कर सकती है। हांलाकि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इन तमाम विषयों पर चुप्पी साधे हुऐ है और पत्रकारिता की दुनिया में नये कीर्तिमान स्थापित करने का दावा करने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया के तमाम खोजी पत्रकार इस विषय में बात करने से बच रहे है लेकिन सोशल मीडिया पर छाये मोदी भक्तों की उतावली व बयानों की तल्खी से यह लग रहा है कि मानो वह इसे सच के रूप से स्वीकार कर चुके है कि तथाकथित हिन्दुत्ववादी सुधार को मद्देनजर रखते हुऐ भाजपा व संघ के कार्यकर्ताओं को कत्लोगारत से कतई परहेज नही करना चाहिऐ। इन तरह के बयानों में कहीं न कहीं नाथूराम गोडसे जिन्दा दिखता है और यहाँ पर यह कहने में भी कोई हर्ज नहीं है कि इस हत्या के मामले के सामने आने के बाद सोशल मीडिया में गौरी लंकेश को हिन्दुत्ववाद की विरोधी साबित करने के लिऐ उनके अन्तिम संस्कार के वक्त उन्हें दफनाऐं जाने को मुद्दा बनाया जा रहा है, उसे देखते हुऐ यह साफ लगता है कि या तो भाजपा के इन तथाकथित समर्थको व स्वंम्भू प्रचारकों को विराट हिन्दू धर्म की तमाम परम्पराओं का ज्ञान ही नही है या फिर दक्षिण भारत के लिगांयत समुदाय को हिन्दू धर्म से अलग करने की साजिशें शुरू हो गयी हे। यह ठीक है कि गौरी लंकेश भी अन्य जनवादी विचारकों की तरह अभिव्यक्ति की आजादी की पक्षधर थी और अपने समकालीन लेखको व पत्रकारों के एक बड़े हिस्से के समान ही गरीब, मजदूर व बेसहारा तबके की बात करने के कारण उन्हें वामपंथी विचारधारा से ओत-प्रोत या नक्सलवाद का समर्थक माना जाता रहा है लेकिन इसका अर्थ यह तो कदापि नही है कि गौरी लंकेश के राजनैतिक विरोध या फिर लेखन के जरिये प्रतिरोध करने का बदला उन्हें मारकर ही पूरा किया जा सकता था। लोकातंात्रिक व्यवस्था के लिऐ कट्टरवादी सोच हमेशा ही घातक रही है। और जिस राष्ट्र की राजसत्ता पर भी कट्टरवादी राजनैतिक ताकतों या शासकों का कब्जा हुआ है उस राष्ट्र की सरकार ने सबसे पहले मीडिया पर काबू पाने की कोशिश की है। अगर मोदी सरकार के पिछले तीन-साढ़े तीन साल के कार्यकाल पर एक नजर डाले तो हम पाते है कि ठीक कट्टरवादी अंदाज में मोदी सरकार भी देश में स्थापित मीडिया पर हमलावर है जबकि संघ के प्रति समर्पित या फिर मोदी की भाषण शैली से दिगीभ्रमित कुछ युवाओं को विशेष रूप से प्रशिक्षित कर समाज के बीच वैमनस्यता व भेदभाव के बीज बोने का काम सौंप दिया गया मालुम होता है। अम्बानी व अदानी की दौलत के बलबूते चल रहे कुछ टीवी चैनलों व सोशल मीडिया पर गाली-गलौच व धमकाने वाले अंदाज में बात करने वाले कुछ शोहदे टाइप स्वम्भू पत्रकारों के जरिये अपने कार्यक्रमों, योजनाओं व चुनावी ऐजेण्डे का प्रसार कर रही वर्तमान केन्द्र सरकार की नीतियों से यह तो स्पष्ट होता ही है कि वह जन सामान्य की नब्ज पहचानने वाले प्रिंट मीडिया के एक बड़े हिस्से अर्थात लघु व मझोले श्रेणी के समाचार पत्रों व पत्रिकाओं को पूरी तरह बंद करने की साजिश के तहत काम कर रही है लेकिन देश की आजादी के वक्त से पहले ही अपने अस्तित्व के लिऐ संघर्ष करने का आदी रहा इन तमाम लघु व मझोले समाचार पत्रो का पत्रकार रूपी सम्पादक वक्त के थपेड़ो व लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के तहत मिली शक्तियों के चलते इतना मजबूत हो गया है कि उसके अस्तित्व को एकाएक यूँ ही मिटा देना मोदी सरकार के लिऐ आसान नही है। लिहाजा विरोध के सुरो को मंद करने के लिऐ मोदी समर्थको ने यह नया दांव खेला है और गौरी लंकेश की हत्या के बाद इन तथाकथित समर्थको की बोखलाहट व बदजुबानी देखकर यह तो स्पष्ट होता ही है कि इस हत्या में भले ही इनका हाथ न हो किन्तु यह तमाम लोग एक बुद्धिजीवी की निर्मम हत्या का फायदा उठाकर समाज के हित में काम कर रहे तमाम पत्रकारोें, लेखको व सामाजिक कार्यकर्ताओं को धमकाना जरूर चाहते है।

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