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Friday, November 24, 2017

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राजनीति के गलियारों से

मंत्रीमण्डल में फेरबदल या फिर मुख्यमंत्री बदले जाने की चर्चाओं के बीच नही दिख रहा त्रिवेन्द्र सिंह रावत की कुर्सी को कोई खतरा।
केन्द्रीय मंत्रीमण्डल में बदलाव की खबरों के साथ ही उत्तराखंड में भी मंत्रीमण्डल में फेरबदल किये जाने की चर्चाऐं जोरो पर है और मजे की बात यह है कि कुछ उत्साही नौजवानों ने अपनी-अपनी पसन्द या जरूरत को ध्यान में रखते हुऐ इस संदर्भ में सूचियां भी जारी कर दी है लेकिन शासन तंत्र के किसी भी जिम्मेदार व्यक्ति ने इस तरह की अफवाहों को नकारने या फिर अफवाह फैलाने के खिलाफ कार्यवाही की बात नही की है और न ही सत्ता पक्ष में जुड़े किसी सरकारी पक्ष या संगठनात्मक पदाधिकारी ने इस संभावित बदलाव को नकारने का प्रयास किया है जिसके चलते ऐसा प्रतीत होता है कि यह सब उच्च स्तर से ही प्रायोजित किया जा रहा है या फिर पिछले छः माह के कार्यकाल में सरकार को मिली असफलताओं की ओर से जनता का ध्यान हटाने के लिऐ आरएसएस लाॅबी द्वारा जानबूझकर यह भ्रमजाल फैलाया जा रहा है। वजह चाहे जो भी हो लेकिन इस तरह की चर्चाओं में मुख्यमंत्री को बदले जाने या फिर मुख्यमंत्री की कार्यशैली को लेकर सरकार के मंत्रियों व जनता में बढ़ रहे आक्रोश की कहीं खबर नही है ओर यहीं मोदी तंत्र की सफलता का फार्मूला है कि वह अपने करतबों से जनसामान्य का ध्यान समस्याओं की मूल वजह से हटाने के खेल में सफल दिखते है। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि सत्ता की बागडोर संभालने के बाद इन छह महिनों में त्रिवेन्द्र सिंह रावत के नेतृत्व वाली सरकार विपक्ष से कहीं ज्यादा जनान्दोलनों के निशाने पर रही है और सरकार के मंत्री अपने विवादित फैसलों व बयानों के चलते न सिर्फ चर्चाओं में रहे है बल्कि जनसामान्य के बीच मंत्रियों की आपसी तकरार को लेकर भी किस्से-कहानियों की चर्चा चटकारें लगाकर होती रही है लेकिन इस सबके बावजूद त्रिवेन्द्र सिंह रावत की सरकार को लेकर असफलताओं अथवा जनता की कसौटी पर खरे न उतरने की चर्चा कहीं नही है बल्कि मंत्रीमण्डल में सम्भावित फेरबदल को लेकर यह माहौल बनाया जा रहा है कि भाजपा शीघ्र ही मंत्रीमण्डल के सभी सदस्यों के कामकाज की समीक्षा करेगी और इसके बाद मंत्रीमण्डल में किसी संभावित फेरबदल या फिर मंत्रियों के विभाग बदले जाने के फैसलेे पर पुर्नविचार किया जायेगा। अगर भाजपा के चुनावी वादो और नारो पर गौर करें तो हम पाते है कि भरी सभाओं में देश के प्रधानमंत्री द्वारा किये गये लगभग सभी वादे झूठे थे और प्रदेश में नवगठित भाजपा सरकार द्वारा राज्य की जनता की मूल समस्याओं पर अभी तक कोई विचार करना ही शुरू नही किया गया है। सरकार की कार्यप्रणाली पर अगर गौर करें तो यह स्पष्ट होता है कि राज्य की शासन व्यवस्था को संभालने या फिर विकास कार्यो को धरती पर उतारने के संदर्भ में कोई भी स्पष्ट खाका अभी तक मुख्यमंत्री नही बना पाये है जबकि बाबा रामदेव के संस्थान ‘पंतजलि को लेकर की जा रही घोषणाओं के माध्यम से राज्य को पतजंलि योग ग्राम का हिस्सा बनाने व राज्य के बहुमूल्य संस्थानो व प्राकृतिक उत्पादो को पतजंलि को सौंप देने की प्रक्रिया पर अमल शुरू किया जा चुका है। इसके साथ ही साथ राज्य के कुमाँऊ क्षेत्र के एक बड़े हिस्से को प्रस्तावित पंचेश्वर बांध में डुबाने की तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है और पलायन समेत विभिन्न ज्वलंत मुद्दो पर कोई भी हल निकालने की जगह सरकार आयोगो के गठन के माध्यम से इस तमाम मसलों को लटकाने या फिर इनकी तरफ से जनता का ध्यान हटाने की पूरी कोशिश कर रही है। सरकार के काम करने के तरीके से यह भी स्पष्ट है कि उसका राज्य के विकास को लेकर अपना कोई ऐजेण्डा नही है बल्कि वह एक तयशुदा ऐजेण्डे पर कुछ इस तरह काम कर रही है कि मानो उसे कहीं और से निर्देशित किया जा रहा हो। हालातों के मद्देनजर यह स्पष्ट है कि सरकार को इस तरह के निर्देश केन्द्र सरकार अथवा राज्य की जनता पर एक अनुभवहीन मुख्यमंत्री थोपने वाले भाजपा हाई कमान से प्राप्त हो रहे है और अगर ऐसा है तो सरकार में किसी भी तरह के फेरबदल अथवा मंत्रियो के विभागो में बदलाव की कोई संभावना नही है क्योंकि भाजपा संगठन अथवा सत्ता के शीर्ष पदो पर बैठे नेताओ को राज्य की बागडोर अपने हिसाब से चलाने के लिऐ एक मजबूत प्रशासक के स्थान पर एक कमजोर सरकार की ही दरकार है जिसे त्रिवेन्द्र सिंह रावत भंली-भाति पूरा कर रहे है। हो सकता है कि जनता के प्रति जवाबदेह कुछ लोग यह चाहते हो कि राज्य गठन के बाद पहली बार अस्तित्व में आयी पूर्ण बहुमत की सरकार इस मौके का फायदा उठाते हुऐ कुछ ठोस फैसले लें और मौजूदा सरकार का कार्यकाल उत्तराखंड के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरो में दर्ज हो लेकिन त्रिवेन्द्र सिंह रावत की प्राथमिकता राज्य का विकास न होकर अपनी कुर्सी बचाने की है और वह पूरी तन्मयता के साथ शीर्ष पद का लुत्फ उठाते हुऐ अपने आकाओं की मर्जी के हिसाब से काम कर रहे है। लिहाजा किसी भी प्रकार के बदलाव अथवा सुधार की उम्मीद करना भी बेमानी है। हाँ इतना जरूर है कि किसी भी कीमत पर सत्ता में वापसी की राह तलाश रहे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राज्य की पांच लोकसभा सीटो के परिणाम अपने पक्ष में करने के लिऐ केन्द्र सरकार के अन्तिम दौर में कुछ लोक-लुभावन घोषणाऐं अवश्य करें और उनका श्रेय प्रदेश में लगे डबल इंजन के साथ ही साथ त्रिवेन्द्र सिंह रावत सरकार को भी दिया जाय लेकिन सरकार की कार्यशैली व वर्तमान में दिख रहे रूख को देखकर दूर-दूर तक ऐसा नही लग रहा है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व उत्तराखंड सरकार को एक के बाद एक वाले अंदाज में मिल रही नाकामियों की वजह से हैरान या परेशान है और वह राज्य में उच्च स्तर पर किसी भी तरह का बदलाव किये जाने की संभावनाओं पर विचार कर रहा है। ठीक यहीं स्थिति दायित्वों अर्थात् लाल बत्तियों के बंटवारे को लेकर भी है। यह माना कि हालिया विधानसभा चुनावों में भाजपा को मिली आश्चर्यजनक सफलता के बाद इस तरह के दायित्वों को चाहने वालो की सूची में बड़ा इजाफा हुआ है और कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने वाले विधायको व तत्कालीन मंत्रियो की भी पूरी कोशिश है कि वह अपने प्रति आस्थावान सक्रिय समर्थको को किसी भी तरह सरकार में समायोजित करें लेकिन लाल बत्तियों या दायित्वों के बंटवारे के बाद संभावित दिख रही गुटबाजी के सामने आने का डर सरकार को इस तरह को कोई भी कदम उठाने से रोक रहा है और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी यह नही चाहता कि लोकसभा के लिऐ जनता के बीच जाने से पूर्व भाजपा में संगठन स्तर पर किसी भी तरह के हड़कम्प की स्थिति हो। लिहाजा जो कुछ भी है और जैसा है वाले अंदाज में यथास्थिति बरकरार रहने की संभावना है और अगर कोई बड़ी घटना या र्दुघटना सामने नही आयी तो सरकार कामकाज के तरीके अथवा फैसलो के अंदाज में भी कोई बदलाव आने की संभावना व्यक्त नही की जा सकती क्योंकि वर्तमान मुख्यमंत्री की पहली कोशिश खुद को लोकप्रिय मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित करने की नही बल्कि लम्बे समय तक कुर्सी पर टिके रहने की है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि प्रदेश की जनता को सरकार के प्रति बहुत ज्यादा आशाविन्त होने या फिर सरकार में किसी भी प्रकार के बदलाव के बाद विकास कार्यों में तेजी आने की संभावनाओं पर विचार करने से कोई भी फायदा नही मिलने वाला क्योंकि इस सरकार का रिमोट वास्तव में मोदी-शाह की जोड़ी के हाथों में है और यह जोड़ी यह मानकर चल रही है कि ठीक-चुनावी मौसम में प्रत्याशियों की सूची में किया गया कोई भी बड़ा बदलाव उन्हें उत्तराखंड में मनवांछित सफलता दिला सकता है कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि उत्तराखंड की जनता को अपने हालातो व सामने आने वाली समस्याओं से खुद ही जूझना होगा क्योंकि सरकार की कार्यशैली व फैसले लेने के अंदाज में यह दूर-दूर तक नही दिखाई दे रहा कि वह व्यापक जनहित के प्रति जवाबदेह या जिम्मेदार है और रहा सवाल विपक्ष का तो चुनाव में मिली करारी हार के बाद विपक्ष के तमाम नेता खुद को राजनीति में जिन्दा रखने के लिऐ संघर्ष कर रहे है। चुनावी हार-जीत और सरकार बनाने के खेल तक सीमित हो चुकी भारतीय राजनीति में यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि जनसमस्याओं व जनसंवेदनाओं के स्तर पर जनमत प्राप्त करने तक सीमित हो चुके सत्ता पक्ष एवं विपक्ष के तमाम नेता जनसरोकारों से दूर होते जा रहे है। इन हालातों में यह फैसला खुद जनता को ही लेना होगा कि वह इस सरकारी तंत्र के साथ किस तरह पेश आये।

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