धर्म का धंधा या फिर धंधे का धर्म | Jokhim News

Thursday, September 21, 2017

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धर्म का धंधा या फिर धंधे का धर्म

लोकतांत्रिक देश भारत में तेजी से फलती-फूलती धर्म की धंधेबाजी को मिलती है राजनीतिज्ञों की शह
महिलाओं के खिलाफ बलात्कार व अभद्रता के मामले में आरोपी बाबा राम-रहीम के समर्थन में पांच लाख से भी अधिक भक्तों का हुुजूम उमड़ना आश्चर्यजनक है और इससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक कई मौतों, अराजकता व अभद्रता की कार्यवाही शुरू होने से पहले इस सारे मामले को लेकर दिखी सरकारी तंत्र की चुप्पी है। यह माना कि डेरा प्रमुख के सत्ता पर काबिज नेताओं व वरीष्ठ नौकरशाहों पर कई तरह के अहसान रहे होगे ओर गाहे-बगाहे सत्ता के मजबूत केन्द्रो में बैठे इन प्रभावशाली लोगों को डेरे की ओर से अनुग्रहित भी किया जाता रहा होगा लेकिन बाबा के निजी काफिले में शामिल कई प्रतिबन्धित हथियारों की बरामदगी के बाद यह सवाल भी पैदा हो गया है कि देश की सीमाओं व संविधान की रक्षा की दम्भ भरने वाली भारतीय राजनैतिक व्यवस्था ने यह कैसे कबूल किया होगा कि उसकी सत्ता पर कब्जेदारी के दौरान एक मलंग, कथावाचक या फिर दैवीय गुणों से तिरोहित व्यक्तित्व इतना शक्तिशाली हो जाय कि उसे व्यवस्था को ही धता बताने में कोई संकोच नही हो। हांलाकि यह कहना कठिन है कि हरियाणा सरकार को बाबा राम रहीम की गिरफ्तारी के मामले में किसी तरह का शक-सुबहा था या नही और यह भी आश्चर्यजनक है कि क्षेत्र में सेना की तेनाती के बावजूद भी उपद्रवियों को एक हद तक मनमानी करने की छूट दी गयी लेकिन सत्ता के शीर्ष पर काबिज राजनैतिक नेतृत्व में अगर इच्छाशक्ति का आभाव हो तो इस तरह के घटनाक्रम अधिकाधिक रूप से सामने आने की संभावनाओं से इनकार भी नही किया जा सकता और न ही इस तथ्य पर यकीन किया जा सकता है कि कानून का अनुपालन करते हुऐ एक तथाकथित बाबा की सुरक्षित गिरफ्तारी को अमलीजामा पहनाने के लिऐ देश की जनता के एक हिस्से को कुछ हथियारबंद अराजक उपद्रवियों के भरोसे छोड़ दिया गया होगा। बाबा राम रहीम मामले में आये न्यायालय के फैसले तथा इसी तरह के कुछ अन्य आरोंपो का सामना कर रहे तथाकथित बाबाओं के विलासितापूर्ण जीवन का अवलोकन करने व उनके अनुयायियों के सरकारी तंत्र को चेतावनी देने वाले अंदाज पर गंभीरता से गौर करने के उपरांत यह कहना कठिन नही है कि धार्मिक व वैचारिक रूप से विविधता वाले देश भारत में लोकतंत्र की परिभाषा व दायरा हर व्यक्ति विशेष के लिऐ भिन्न-भिन्न है तथा लोकतंत्र के आधारभूत कहे जा सकने वाले भारतीय नेता व तथाकथित जनप्रतिनिधि वक्त की जरूरत के हिसाब से अपनी प्राथमिकताऐं व अवधारणाऐं बदलने के लिऐ स्वतंत्र है। यह ठीक है कि कानून द्वारा हर अपराधी को उसपर लगे आरोपों व आरोपों के समर्थन अथवा विरोध में प्रस्तुत किये गये साक्ष्यों के आधार पर दण्डित किया जाता रहा है और सामाजिक कार्यकर्ताओं व बुद्धिजीवियों के एक वर्ग विशेष ने समय-समय पर अपने द्वारा प्रस्तुत किये गये तर्को व साक्ष्यों के माध्यम से इस व्यवस्था पर चोट करने की कोशिश भी की है लेकिन इस तथ्य को नकारा नही जा सकता कि महज चन्द लोगो की सक्रियता व जागरूकता के बल पर इस पूरे तंत्र को सुधारा नही जा सकता। यह एक गहन जाँच का विषय हो सकता है कि तर्क को विज्ञान की कसौटी पर कसकर देश को इक्कीसवीं सदी की ओर ले जाने के लिऐ संकल्पित दिख रहा भारतीय युवा इतना धर्मभीरू क्यों होता जा रहा है कि उसे अपनी मेहनत व किस्मत से कहीं ज्यादा कुछ तथाकथित बाबाओं के आर्शीवाद अथवा प्रवचन में सुख व शान्ति नजर आ रही है और अपनी खून-पसीने की गाढ़ी कमाई में से एक अंश मन्दिरों या अन्य धार्मिक स्थलों व तथाकथित मठाधीशों को अर्पित करने से पूर्व उसका विवेक किसी भी तरह का गहन विचार-विमर्श नही करता। आश्रमों, मठो, डेरा या फिर अन्य धर्मगुरूओं के आचरण व उनके इर्द-गिर्द जुटने वाली भीड़ पर एक सरसरी निगाह डालने मात्र से इस तथ्य का आभास हो जाता है कि धर्म के नाम पर जनता को संगठित करने अथवा दिगभ्रमित करने के इस खेल में कुछ भी सही नही चल रहा है लेकिन हम चाहकर भी अपने सभ्य समाज के बीच पूरे गाजे-बाजे के साथ खेले जा रहे इस खेल को रोक पाने में खुद को असमर्थ पाते है क्योंकि किसी भी धर्म,सम्प्रदाय अथवा पंथ में यह शोर नही सुनाई देता कि किसी बाबा या धर्मगुरू ने किसी सामान्य नागरिक अथवा जनता को जोर जबरदस्ती अगवाकर अपने आश्रम या रेन बसेरे में आने को विवश किया हो। कभी-कभार किसी बाबा या धर्म के ठेकेदार को लेकर कुछ छोटे-बड़े मामलों का खुलासा होता भी है तो प्रथम दृष्टया यहीं प्रतीत होता है कि पीड़ित पक्ष अपनी अथवा अपने परिवार की मर्जी से उक्त धर्मगुरू की शरण में गया था। इन हालातों में कानून के हाथ बंधे हुऐ नजर आते है और यह माना जा सकता है कि अब तक सामने आये तमाम मामलों में कानून के रखवालों व सम्मानित न्यायालय ने व्यापक जनहित को ध्यान में रखते हुऐ अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर भी फैसले लिये है लेकिन जनसामान्य के लोकतांत्रिक हितों के प्रति जवाबदेह जनप्रतिनिधियों व सरकारी तंत्र के बारे में क्या कहा जाना चाहिऐं जो अपने तमाम छोटे-बड़े राजनैतिक हितों के लिऐ इन बाबाओं, तांत्रिकों या धर्मगुरूओं के चरणों पर लौटते नजर आते है और मजे की बात यह है कि नेताओं की शह पर ही शासन व प्रशासन इन तथाकथित धर्मगुरूओं को इतनी छूट प्रदान करता है कि यह समाज के एक बड़े हिस्से से अलग व आलौकिक नजर आते है। यह ठीक है कि भारत में हर धर्म व सम्प्रदाय के मतावलम्बी को अपनी धार्मिक मान्यताओं व रीति-रिवाज के अनुसार अपने अराध्य को मानने व उसकी पूजा करने की छूट है तथा तेजी से सिकुड़ती जा रही रिश्तों की दुनिया का हमें धर्मभीरू व बाबाओं का शरणागत् बनाने में भी बड़ा योगदान है लेकिन क्या यह आश्चर्यजनक नही है कि हमारे सरकारी तंत्र को इन डेरो या तथाकथित बाबाओं की तेजी से बढ़ती ताकत व दौलत का पूर्वानुमान भी नही होता और जब पानी सर के ऊपर से गुजरने लगता है तो हम जैसे कुछ लोग व्यवस्था पर दोषारोपण कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते है। धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाले भारतीय संविधान के गठन के वक्त यह उम्मीद की गयी होगी कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को संभालने वाले लोग धर्म और राजनीति को एक सिक्के के दो पहलू की तरह हमेशा एक दूसरेे से अलग रखेंगे तथा संविधान में प्रदत्त राष्ट्रीय एकता व समानता का अधिकार विभिन्न बोली-भाषाओं, जातियों, धर्मों व विचारधाराओं में विभक्त भारतीय जनमानस को एक अदृश्य गठबंधन में बांधे रखने में सफल होगा लेकिन समय गुजरने के साथ ही साथ हमारे नेताओं व राजनैतिक दलो की प्राथमिकताओं में तेजी से बदलाव आया है और उन्होंनें जाने-अनजाने में धर्म व क्षेत्रियता के ठेकेदारों की गणेश परिक्रमा कर उन्हें अत्यधिक शक्तिशाली बना दिया है। कुछ वर्षो पूर्व जन्तर-मंतर पर घटित रामदेव प्रकरण और एक राजनैतिक ताकत के रूप में उभरने का प्रयास कर रहे बाबा रामदेव को जनता के बीच मिली अस्वीकार्यता जैसे घटनाक्रमों से यह तो कई बार साबित हुआ है कि प्रवचनों या फिर मेलो-ठेलो में उमड़ने वाली जनता को जनमत में बदलने का हुनर अभी भारतीय संतो, बाबाओं व धर्मगुरूओं को नही आया है लेकिन इस सबके बावजूद हमारे नेताओं व सत्ता के शीर्ष पदो पर काबिज नीतिनिर्धारकों को द्वारा अपने व्यक्तिगत् हितो के लिऐ इन्हें दी जाने वाली विशेष तवज्जों ने इनको बहुत ज्यादा शक्तिशाली बना दिया है और यहाँ पर यह कहने में कोई हर्ज नही है कि सत्तापक्ष का संरक्षण मिलते ही मंदाध आचरण करने वाले यह तमाम तथाकथित योगी-सन्यासी खुद को ईश्वर अथवा ईश्वर के समकक्ष समझने की भूल कर बैठते है। नतीजतन कोई ने कोई राम रहीम हर वक्त कानून की शकभरी निगाहों के पीछे खड़ा दिखता है और खुद को कानून से उपर समझकर किया जाने वाला उसका हर शक्ति प्रदर्शन उसके प्रति सम्मान व आस्था के ताबूत में ठुकती अन्तिम कील की भांति प्रतीत होता है।

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