खुद को कचैटती अन्तरात्मा के साथ | Jokhim News

Thursday, September 21, 2017

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खुद को कचैटती अन्तरात्मा के साथ

पहाड़ में होने वाले लगभग हर जनान्दोलन में आज भी प्रांसगिक व जीवन्त है गिर्दा ।
पंचेश्वर बांध के विरोध में लग रहे नारों और राजि विलोचन शाह जैसे सामाजिक कार्यकर्ता के अलावा उत्तराखंड राज्य निर्माण को लेकर एक क्रान्तिकारी सोच रखने वाले काशी सिंह ऐरी समेत कई नेताओं व सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ हुई धक्कामुक्की या पुलिसिया अभ्रदता के बीच लोकनायक गिरीश तिवारी ‘गिर्दा‘ अपनी आकस्मिक मृत्यु के बावजूद भी प्रासंगिक हो उठे है और उनके जन्मदिवस के अवसर पर उन्हें श्रद्धाजंली देने वाले लगभग सभी सामान्य व गणमान्य व्यक्तित्व इस कमी को महसूस कर रहे है। हांलाकि वीरो की इस धरती और आन्दोलनधर्मी अवधारणा वाले उत्तराखंड में सामाजिक मुद्दों पर लम्बे आन्दोलन लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं या जनता की आवाज बनकर उभरने वाले लोकगायकों, कवियों व जननायकों की कोई कमी नही है और आजादी के आन्दोलन को लेकर वर्तमान तक के तमाम छोटे-बड़े मुद्दो पर होने वाले क्षेत्रीय आन्दोलनों में जनता की भावनाओं को जनगीतों या फिर भावनाओं को छूने वाले लोकप्रिय नारों के जरियें व्यक्त किया जाता है लेकिन यहाँ पर यह कहने में भी कोई हर्ज नही है कि राज्य निर्माण के बाद प्रदेश की सत्ता पर काबिज हुई अवसरवादी ताकतों ने अपनी क्रूर रणनीति से सामाजिक आन्दोलनों में होने वाली इस भागीदारी को न सिर्फ कई टुकड़ों में विभक्त कर दिया है बल्कि सत्ता के शीर्ष पदो के प्रलोभनों व तत्कालिक लाभ वाले पदोे के लिये राजनैतिक स्तर पर होने वाली लामबंदी ने व्यापक जनहित के प्रति जवाबदेह विचारधारा की सोच को ही बदल कर रख दिया है। राज्य निर्माण के इन सत्रह वर्षो में लोकसंस्कृति के कुछ तथाकथित ध्वजवाहक जब उत्तराखंड की परम्परा के प्रतीक वस्त्र पिछौड़े को प्रदेश के एक सीमित हिस्से से जोड़ते हुऐ इस पारम्परिक परिधान के साथ किये गये किसी अन्य शैली क्षेत्र के नृत्य को राज्य की लोक परम्पराओं से खिलवाड़ बताते है तो हमें समझ जाना चाहिऐ कि राज्य की जनवादी ताकतों को क्षेत्रीयता के आधार पर बांटकर अंधेरगर्दी का राज कायम रखने की कोशिशें शुरू हो गयी है। ठीक इसी प्रकार जब कुछ स्वनामधन्य साहित्यकार या फिर प्रदेश की लोक धरोहरों के जानकार सरकार द्वारा अपनी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिऐ अनुबन्धित किये जाने वाले सांस्कृतिक दलो के रोजी-रोटी से जुड़े सवालों को सरकार का ढ़ोल पीटना कहते है लेकिन अवसर मिलते ही इस तरह की तमाम चयन प्रक्रियाओं के दौरान निर्णायक मण्डल में शामिल होने या बने रहने की लालसा रखते हुऐ परम्परागत् लोकगीतों व लोकशैलियों को सरकार की जरूरत के हिसाब से तोड़-मरोड़ कर विज्ञापन की शक्ल में प्रस्तुत करने की सलाह देते है तो यह खुद-ब-खुद तय हो जाता है कि जनान्दोलनों के मंच पर गिर्दा जैसे लोकनायकों की वापसी अब आसान नही है। यह एक कटु सत्य है कि हांफती हुई खांसी के बीच बीड़ी का कश लगा लेने वाले गिर्दा राज्य निर्माण के आन्दोलन में अह्म भागीदारी के बावजूद वह सम्मान नहीं पा सके जिसके वह असल हकदार थे लेकिन यह भी सच है कि इसके लिऐ उन्होंने अपना जमीर नही बेचा और न ही अपनी अन्तिम सांसो तक अपनी कलम की धार कुंद होने दी। शायद यहीं वजह रही कि उनकी बीमारी के बावजूद सत्तापक्ष व विपक्ष के किसी बड़े नेता ने उन्हें नामी-गिरामी बड़े अस्पताल में भर्ती कराना व उनकी मिर्जापूसी के लिऐ अस्पतालों के चक्कर लगाना जरूरी नही समझा और अगर दो-चार दस बड़े चेंहरे अपने निजी सम्बन्धों के चलते गये भी तो उस दौर में पत्रकारिता का स्तर शायद इतना नही गिरा था कि इस तरह की खबरों को विशेष तवज्जों दी जाती लेकिन वर्तमान दौर में व्यसायिकता की दौड़ का हिस्सा बन चुके जन कवि और लोकगायक भी यह अच्छी तरह समझ चुके है कि किस समय क्या बेचा जा सकता है इसीलिऐं किसी लोकगायक का अस्पताल जाना और उसे सरकारी अस्पताल में दाखिल दफ्तर कराये जाने के स्थान पर किसी बड़े नेता, मंत्री या अधिकारी के आर्शीवाद से महंगे निजी अस्पताल में इलाज हेतु भर्ती करना व इस तमाम खर्च को सरकार द्वारा उठाये जाने की घोषणा करना खबरों का एक हिस्सा है तथा खबरों के खिलाड़ी यह भी अच्छी तरह जानते है कि बीमारी से जूझ रहे या मौत के मुंह से निकले एक नामचीन चेहरे की बीमारी से उबरने के बाद पहली प्रस्तुति को बाजार में कैसा बैचा जा सकता है।अफसोस है तो सिर्फ इतना कि इस पहली प्रस्तुति के दौरान घटित दुघर्टना में घायल हुई एक महिला लोक कलाकार का जिक्र करने को कोई तैयार नही होता और न ही वह किसी खबर का हिस्सा बन पाती है। इन तमाम हालातों को संक्षेप में समझने के लिऐ यह कहना पर्याप्त होगा कि वर्तमान में भी लोककला, लोकगीत व लोक संस्कृति को अपने सरल शब्दों व आम आदमी के दिल को छू लेने वाले अंदाज में गाने व गुनगुनाने वाले कई मूर्धन्य नाम हमारे बीच उपस्थित है तथा विभिन्न सांस्कृतिक अवसरों व सामाजिक मंचो पर वह आसमान को छू लेने वाले अंदाज में समय के साथ लहलहा रहे है लेकिन इनमें से अधिकांश की तुलना सफेदे (यूकेलिप्ट्स) के उस पेड़ से की जा सकती है जो खुद तो आसमान चूमने को तैयार दिखता है लेकिन अपने इर्द-गिर्द कोई और पेड़ तो क्या घास तक पनपने नही देता और यहाँ पर यह कहने में भी कोई हर्ज नही है कि एक दिन वक्त की आंधी का तेज थपेड़ा आता है जिसके चलते यह सफेदे का पेड़ या तो अपनी जड़े छोड़ देता है या फिर बीच कहीं से टूट जाता है जबकि गिर्दा इन तमाम लोक कलाकारों, संस्कृति के संवाहकों या फिर मंचीय शोभा बनने वाले मूर्धन्य नामों के बीच एक ऐसे बरगद की तरह नजर आते है जो तेज आंधियों में भी अपनी जगह से नही हिलता बल्कि वक्त के थपेड़ो के साथ हिलते जिसके पत्ते गिर्दा की मंद-मंद मुस्कान की तरह लगते है और मजे की बात यह है कि इस बूढ़े बरगद में अपनी इर्द-गिर्द न सिर्फ दूब घास बल्कि सैकड़ों छोटे बरगद या अन्य तरीके के पेड़ो को पनपाने व संरक्षण देने की क्षमता होती है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि मंचीय होती जा रही हमारी संस्कृति के इस दौर में जनता की आवाज अपने गूंगे-बहरे जनप्रतिनिधियों व सरकार तक पहुंचाने के लिऐ गिर्दा से मिलती-जुलती कई शख्सियतों की जरूरत पूरी शिद्धत से महसूस की जा रही है लेकिन सवाल यह है कि जब लोक कला व लोक संस्कृति के सजग प्रहरी कहलाने का शौक रखने वाले बड़े चेहरे ही सरकारी पिट्ठू बनकर नेताओं के मंच सजाने वाले या फिर भीड़ एकत्र करने वाले नये कलाकारों की तलाश में निकल पड़े तो जनान्दोलनों का भविष्य क्या होगा। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि उत्तराखंड के कण-कण में संस्कृति का वास है तथा यहाँ का संगीत व पुरानी लोकधुने जनसामान्य को मंत्रमुग्ध कर देती है लेकिन यह एक बड़ा सवाल है कि सीमित संसाधनों के साथ इस कला एवं संस्कृति विरासत को सहेजकर रखने की कोशिश करने वाली पीढ़ी को लोकप्रियता एवं रोजी-रोटी के सवाल पर मंचीय संस्कृति तक सीमित रख हम क्या साबित करना चाहते है और स्वंय को उत्तराखंड की संस्कृति का ध्वजवाहक कहने वाले या फिर कहलाना पंसद करने वाले कुछ तथाकथित रूप से नामचीन चेहरों को इस तरह की तमाम चमचागिरी में सिवाय कुछ धन के मिलता ही क्या है लेकिन इस सबके बावजूद जनहित या जन के मन की बात छोड़कर अपने मन की बात करना और सरकारी तंत्र के हर गलत व सही फैसले में हां मिलाना इनके पेशावराना अंदाज में शामिल हो गया है। इसीलिऐं गिर्दा अपनी मृत्यु के बाद और भी ज्यादा प्रांसगिक हो गये है और जनान्दोलनों के जरिये सरकार से न्याय मांगती जनता क्षेत्रीयता, भाषा, पहनावें एंव खान-पान के विभेद को भूलकर स्थापित जनकवियों, लोकगायकों, लेखकों, पत्रकारों तथा खुद को उत्तराखण्डी लोक कला व संस्कृति का मर्मज्ञ अथवा विशेषज्ञ कहलाने की शौकीन महान हस्तियों के भीतर गिर्दा को तलाश रही है।

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