नमामि गंगे ने लीला स्पर्श गंगा का महत्व | Jokhim News

Friday, November 24, 2017

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नमामि गंगे ने लीला स्पर्श गंगा का महत्व

स्पर्श गंगा बोर्ड के विघटन सम्बन्धी आदेश के पीछे छिपे हो सकते है आर्थिक भ्रष्टाचार के कई किस्से।
गंगा के अविरल प्रवाह की रक्षा करते हुये गंगाजल की शुद्धता को बनाये रखने का दावा करने वाली भाजपा की उत्तराखंड सरकार ने अपने ही दल की पूर्ववर्ती सरकार के आदेशों को पलटते हुये पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की महत्वाकांक्षी योजना ‘स्पर्श गंगा‘ को बंद करने के आदेश जारी कर दिये है और मजे की बात यह है कि सरकार के इस फैसले से निशंक भी नाराज प्रतीत नही होते बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि तुरत-फुरत में हुऐ इस आदेश से वह पूरी तरह सहमत है। यह अजूबा क्यों और कैसे सम्भव हुआ तथा एक पूर्व मुख्यमंत्री के फैसले का पूरी तरह सम्मान करते हुऐ ‘स्पर्श गंगा‘ को पिछले पांच सालों तक झेलती रही कांग्रेस सरकार इस तरह के कड़े फैसले क्यों नही ले सकी, यह एक अलग से चर्चा का विषय हो सकता है लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि पूरे जोर-शोर से शुरू की गयी स्पर्श गंगा योजना को एक ही झटके में खारिज कर देने तथा पिछले सात-साठ वर्षो का लेखा-जोखा जनता के सामने रखे बिना ही इसे एकाएक डिब्बा बंद कर देने के चर्चे कहीं भी पत्रकार जगत में नही है। हांलाकि सरकार में बैठे नेताओं व इन्हें चलाने वाले नौकरशाहों का एनजीओ प्रेम किसी से छुपा नही है और मजे की बात यह है कि पिछले एक-दो दशकों से नौकरशाहों ने अपनी पत्नी व बच्चों के नाम पर इस तरह के संगठन बनाने के अलावा सरकारी तंत्र में रहकर अपनी ऐश-अय्याशी पूरी करने के लिऐ एनजीओ का खेल खूब खेला है। सत्ता पर काबिज राजनेता अपनी छवि निर्माण के लालच के साथ ही साथ जनता के बीच अपनी उपलब्धता बनाये रखने व वाहवाही लूटने के लोभ में नौकरशाहों द्वारा कूटरचित इन सरकार द्वारा संचालित एनजीओ के भ्रमजाल में फंसते रहते है और कई अवसरों पर सरकारी संरक्षण में पल रहे इन एनजीओ में होने वाले हर आर्थिक हेर-फेर में नेताओं व सत्ता पर काबिज नीतिनिर्धारकों की अहम् भागीदारी होती है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि किसी भी सरकार द्वारा स्पर्श गंगा जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं को आगे कर जनता जर्नादन को बड़े-बड़े सब्जबाग दिखाना और फिर सरकार का रूख बदलते ही इन योजनाओं या सरकार द्वारा संचालित एनजीओ का डब्बाबंद हो जाना कोई पहली घटना नहीं है लेकिन यह शायद पहली बार है जब समान विचारधारा वाली सरकार ने अपनी पूर्ववर्ती सरकार के समय शुरू हुई कोई योजना या स्वयत्तशासी संगठन बंद कर देने के आदेश एक ही झटकें में जारी कर दिये हो और इससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इस योजना या स्वयत्तशासी संगठन को अस्तित्व में लाने वाला तत्कालीन मुख्यमंत्री सरकार के इस फैसले से खुश है। यह खबर कुछ चैंकाने वाली जरूर है लेकिन इसकी सत्यता पर कोई संदेह नही है बल्कि तथ्यों व परिस्थितियों पर गंभीरता से गौर करने के बाद कोई भी सामान्य जानकारी वाला व्यक्ति इस निष्कर्ष पर पहुंच सकता है कि केन्द्र सरकार द्वारा चलायी जा रही ‘नमामि गंगे‘ परियोजना को दृष्टिगत् रखते हुऐ कोई भी साधन सम्पन्न व राजनैतिक दूरदृष्टि वाला किरदार इसमें डुबकी लगाकर अपना चुनावी भवसागर पार करने की गारन्टी के साथ अपने परिजनों को आर्थिक रूप से सम्पन्न बनाने का मौका खोना नही चाहेगा और अगर सक्षम व्यक्ति के पास कर्मठ दामाद एंव कुशल नृत्यांगना बेटी, जैसे नगीने हो तो ऐसे अवसरों को छोड़ा नही जा सकता। निशंक जी ने भी ठीक यहीं किया क्योंकि वह जानते है कि आर्थिक रूप से कंगाली के दौर से गुजर रहे उत्तराखंड में हाल-फिलहाल संभावनाऐं सीमित है जबकि बड़े बजट के साथ गंगा को बचाने की मुहिम पर निकली केन्द्र सरकार को अपनी योजनाओं को मूर्त रूप देने के लिऐ निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ बड़े नामों की जरूरत है। लिहाजा अपनी सोच व केन्द्र सरकार की गंगा को लेकर बनायी जा रही तमाम योजनाओं को अमलीजामा पहनाने के लिऐ प्रदेश सरकार के दायरें से बाहर निकलकर इसे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपने हाथों में लिया जाना उन्हें जरूरी लगा और प्रदेश सरकार द्वारा उनकी मूक सिफारिश पर ‘स्पर्श गंगा‘ नामक सरकारी संरक्षण में चल रहे स्वयत्तशासी संगठन को विघटित करने के आदेश तुरत-फुरत में जारी कर दिये गये। अब यह तय दिखता है कि निशंक इसी नाम से या फिर इससे मिलते-जुलते किसी नाम को आगे कर अपने परिजनों के साथ गंगा मुक्ति के अभियान पर निकल पड़ेंगे और पिछले सात-साठ वर्षो में सरकारी धन की बर्बादी या फिर यह कहिऐं कि सरकार के अथक परिश्रम से एकत्र की गयी तमाम सूचनाऐं, जानकारी व स्पर्श गंगा का सरकारी धन से खड़ा किया ढ़ांचा इस तत्काल प्रभाव से खड़े किये गये अथवा खड़े किये जा रहे एनजीओ की निजी सम्पत्ति की तरह प्रयोग किया जा सकेगा। हमें याद है कि एक मुख्यमंत्री के रूप में निशंक के कार्यकाल के दौरान किस प्रकार सरकारी धन का उपयोग कर ‘स्पर्श गंगा‘ बोर्ड का गठन किया गया था और इस बोर्ड द्वारा अपनी पहली उपलब्धि के रूप में भाजपा की तत्कालीन राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व राज्य सभा सांसद हेमा मालिनी को मोटा भुगतान देकर एक कार्यक्रम आयोजित करने के लिये आम्रंत्रित किया गया था। इतना ही नही, ‘स्पर्श गंगा बोर्ड‘ ने अपने गठन के साथ ही पहले शहरी विकास विभाग तथा फिर संस्कृति विभाग के नेतृत्व में प्रतिवर्ष एक ठीक-ठाक बजट के रूप में सरकारी धन का उपयोग किया तथा इसके कई लक्ष्य व उपलब्धियाँ तत्कालीन सरकार द्वारा जनता के सामने रखे गये लेकिन सवाल यह है कि इसे एकाएक ही भंग करने की जरूरत क्यों आन पड़ी और सरकार ने इसे भंग करने का कोई भी निर्णय लेने से पूर्व प्रदेश की जनता को यह बताना क्यों जरूरी नही समझा कि राज्य अथवा राष्ट्र हित में स्पर्श गंगा बोर्ड द्वारा इन पिछले सात-आठ वर्षो में हासिल किये गये लक्ष्यों, उपलब्धियों अथवा आंकड़ो का उपयोग सरकार किस तरह करेगी। व्यापक जनहित की नजर से देखा जाय तो यह भ्रष्टाचार से जुड़ा एक बड़ा मामला हो सकता है और इस बोर्ड के गठन व भंग करने की प्रक्रिया के बीच के अंतराल को सरकारी कार्मिकोे, नौकरशाहों व नेताओं के आर्थिक भ्रष्टाचार का एक बड़ा नमूना माना जा सकता है लेकिन हमारा बिकाऊ मीडिया इस ओर जनता का ध्यान आकृष्ट करने की जहमत भी नही उठायेगा क्योंकि गंगा के सतत् प्रवाह व अविरलता के इस खेल में उसे भी अपने कई तरह के पाप धुलने की उम्मीदें जाग उठी है लेकिन सवाल यह है कि सरकारी तंत्र द्वारा उच्च स्तर पर खेला जाने वाला भ्रष्टाचार का यह खेल आॅखिर कब तक उत्तराखंड के आर्थिक संसाधनों को बर्बाद करता रहेगा और हम यूं ही बैठकर सरकार की कारगुजारियों को विभागीय एकीकरण का नाम देते हुऐ चुप्पी साधे रहेंगे।

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