बदलते वक्त के साथ | Jokhim News

Friday, November 24, 2017

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बदलते वक्त के साथ

तथाकथित रूप से देशप्रेम के उग्र प्रदर्शन के हठो को देखते हुऐ बदलने लगा है आम आदमी का रूझान
बहुत पुरानी बात नही है जब स्वतंत्रता दिवस क गणतन्त्र दिवस जैसे मौको पर देश के लगभग हर शहर, कस्बे व गली-मौहल्ले में प्रभात फेरियाँ निकलती और इसके लिऐ किसी आदेश या फिर प्राथमिक तैयारी की जरूरत नही होती बल्कि हर गली-मौहल्ले से दो-चार उत्साही नौजवान एकत्र होकर जिन्दाबाद का नारा बुलन्द करते और स्वतः स्फूर्त अंदाज में खिड़की व दरवाजे खुलने लगते। देखते ही देखते इन नौजवानो के पीछे भीड़ बढ़ने लगती और इस तरह की टोलियाँ लगभग सभी गलियों से निकलकर कब मुख्यमार्ग में आ जनसैलाब में बदल जाती, पता ही नहीं लगता, बूढ़े, महिलाऐं व बच्चे या जो नही जा सकते वह अपने घर की छत या खिड़की से ही इन टोलियों का उत्साह बढ़ाते और अपने-अपने तरीके व अंदाज से आजादी के इस उत्सव में भागीदारी निभाने का प्रयास करते लेकिन कहीं कोई जोर-जबरदस्ती व आग्रह या दुराग्रह नही दिखाई देता और ऐसा प्रतीत होता कि मानो जनता अपने ही अंदाज में इन राष्ट्रीय पर्वो को मनाना चाहती है। यह सत्य है कि इस दौर में विशेष अवसरों को छोड़कर राष्ट्रीय ध्वज के सामान्य इस्तेमाल की इजाजत जन सामान्य को नही थी और यह माना जाता था कि कम अनुभव व गैर-जिम्मेदराना रवैय्ये के चलते राष्ट्र ध्वज के अपमान की स्थिति पैदा हो सकती है लेकिन राष्ट्रीय पर्व जैसे विशेष अवसरों पर जिन जिम्मेदार हाथों में भी तिरंगा दिया जाता उन्हें इस जिम्मेदारी का पूरा अहसास होता और वह अपने प्राणों से बढ़कर इसकी रक्षा करते। इधर पिछले एक अंतराल से प्रभात फेरियाँ अब बीते दिनों की बात हो गयी है और सोशियल मीडिया के इस्तेमाल का दंभ भरने वाला देश का तथाकथित सभ्य व पढ़ा लिखा तबका इतना असभ्य हो चुका है कि पास-पड़ौस से आती आवाजे अब उसमें उत्साह का संचार नही करती बल्कि वह गुस्से से बड़बड़ाते हुऐ अपने खिड़की-दरवाजों को और कसकर बंद करने की कोशिश करता हैं। यह ठीक है कि न्यायालय ने देश की जनता को सभ्य व पढ़ा लिखा जानकर उसे अपने सार्वजनिक जीवन में सम्मान के साथ राष्ट्रीय ध्वज को लहराने के अधिकार दिये है और अब सामान्य दिनों मे निजी भवनों के अलावा सार्वजनिक स्थलों या वाहनों पर भी राष्ट्र ध्वज का लहराना अपमान नही माना जाता लेकिन हम देख रहे है कि वर्तमान में इस आजादी का फायदा अपने राष्ट्र प्रेम को प्रदर्शित करने या फिर सम्पूर्ण राष्ट्र की जनता को एकता के सूत्र में बांधने के स्थान पर उसे धमकाने व डर का माहौल पैदा करने के लिऐ ज्यादा हो रहा है। हम देख रहे है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न अवसरों पर कुछ उदण्ड किस्म के नौजवान अपनी मोटर साईकिलों पर तिरंगा बांधे या हाथों में पकड़े, निकल पड़ते है और राष्ट्रीय सम्मान का प्रतीक यह तिरंगा इनके लिऐ गर्व का विषय न होकर अराजकता का लाइसेन्स होता है जिसे हाथ में पकड़ते ही इन्हें अपने वाहनों में तीन सवारी बिठाने व सर पर हैलमेट न लगाने के साथ ही अभद्रता से चिल्लाने व गंदी फब्तियाँ कसने की छूट मिल जाती है लेकिन इनकी हद यहीं पर समाप्त नही होती और यह तथाकथित देश भक्त अपनी गुण्डई व अराजकता का प्रदर्शन करते हुए न सिर्फ शराब की दुकानों व राह चलते राहगीरों पर हमला करते है बल्कि इस तरह के दुष्ट आचरण का विरोध करने वाले सुरो को राष्ट्रद्रोह का तमगा देकर उनके साथ मार-पीट करना इनकी शान समझा जाता है। राष्ट्र ध्वज को एक कोने में डाल शराब का सेवन करना या फिर आयोजन समाप्त हो जाने के बाद उसका इधर-उधर कूड़े में पड़े रहना और पैरो के नीचे आना, राष्ट्रध्वज का अपमान नही है तो क्या है? शायद यहीं वजह थी कि हमारे पूर्ववर्ती नीति निर्धारकों से देश की आजादी के तत्काल बाद से ही कुछ ऐसे प्रावधान किये थे जिनके चलते सार्वजनिक या निजी जीवन में सामान्य रूप से तिरंगे का अर्थात् राष्ट्र ध्वज का उपयोग करना प्रतिबन्धित माना गया था लेकिन न्यायालय ने यह माना कि आजाद भारत की युवा पीढ़ी इन पचास-साठ सालों में समझदार व राष्ट्र ध्वज के प्रति संवेदनशील हो गयी होगी और एक लम्बी जद्दोजहद के बाद आम आदमी को अपने तरीके व अपनी फुर्सत के हिसाब से राष्ट्र ध्वज के सम्मान को मौका मिला। एक लम्बी कानूनी लड़ाई व बहस के बाद मिले इस अवसर का कुछ लोगों ने मजाक सा बनाकर रख दिया है और अब वक्त-बेवक्त लगते वंदेमातरम् के नारो व भारत माता की जयघोष के साथ सड़को पर तेजी से दौड़ने वाले वाहनों को देखकर एक अलग किस्म के डर का अनुभव होने लगा है। यह ठीक है कि लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के तहत मिली आजादी के क्रम में कुछ मतलबपरस्त लोगों ने इसका गलत फायदा भी उठाया है और भय, आंतक व राष्ट्र विरोधी साजिशों के बीच हमेशा ही कुछ ऐसे नाम सामने आये है जो आजादी के तत्काल बाद से ही एक विचारधारा विशेष के निशाने पर रहे है लेकिन इसका तात्पर्य यह तो नही है कि तथाकथित रूप से राष्ट्र प्रेम के जज्बे के प्रदर्शन या फिर राष्ट्रवाद के नाम पर किसी कौम, बिरादरी व भाषा का इस्तेमाल करने वाले जन समूह को राष्ट्र के प्रति गद्दार ही मान लिया जाय। अब अगर इन विशेष अवसरों पर राष्ट्र के नाम दिये जाने वाले नेताओं के संदेशों व भाषणों पर गौर करें तो हम पाते है कि आजादी के बाद एक लंबे अरसे तक देश की जनता अपने नेताओं को सुनने के लिऐ बैचेंन नजर आती थी और इन नेताओं के भाषण भी इतने मार्मिक व जनता के दिलों को छूने वाले होते थे कि नेता के क्षेत्र आगमन का समाचार जनता को आयोजन स्थल पर एकत्र होने के लिये मजबूर कर देता था या फिर कुछ विशिष्ट अवसरों पर रेडियों के चारो ओर जमघट लगाकर नेता को कुछ इस तरह सुना जाता कि मानो कुछ महत्वपूर्ण घोषणा होने वाली हो। कालान्तर में रेडियो का स्थान टेलीविजन ने ले लिया लेकिन राष्ट्रपर्वो व राष्ट्रीय नेताओं के प्रति जनता का सम्मान बरकरार रहा और कुछ विशिष्ट अवसरों पर यहाँ तक देखा गया कि गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस जैसे मौको का सीधा प्रसारण करने वाले बुद्धू बक्से की जनता द्वारा विधिवत पूजापाठ कर राष्ट्रगान के अवसर पर राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान देते हुऐ अपनी जगहों पर खड़े होकर पूरे जोर-शोर से राष्ट्रगान गाया गया। इधर हमको मिली राष्ट्र ध्वज की स्व विवेक के अनुसार उपयोग करने की आजादी या फिर राजनेताओं की घटती लोकप्रियता ने आम आदमी का रूझान न सिर्फ राष्ट्रीय आयोजनों से हटाया है बल्कि देश की जनता के एक बड़े हिस्से के लिये नेताओं का भाषण बेवक्त की जाने वाली फालतू बकवास मात्र बनकर रह गया है। यहीं वजह है कि वर्तमान में विभिन्न राजनैतिक आयोजनों के लिऐ भीड़ एकत्र करना एक बड़ी चुनौती माना जाता है और सत्ता के शीर्ष पदो के दावेदार अपनी जरूरत के हिसाब से अपने आकाओं को खुश करने के लिऐ किराये की भीड़ एकत्र करने में हुनरमंद कार्यकर्ता की कीमत तय करते है या फिर सांस्कृतिक आयोजनों के नाम पर होने वाले नांच-गाने को आधार बना भीड़ जुटाने का प्रयास किया जाता है। यह माना कि देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी वाकपटुता व भाषण शैली के चलते मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को अपनी ओर आकृष्ट करने में सफल दिखते है लेकिन अगर लाल-किले की प्राचीर से उनके द्वारा दिये गये उद्बोधनों को सुनने वालो की संख्या के आधार पर गौर करें तो हम पाते है कि इन तीन वर्षो में उनकी लोकप्रियता में भी तेजी से कमी आयी है और उनके व्यक्तिगत् प्रशंसकों या विभिन्न निजी स्वार्थो के चलते पार्टी का झण्डा उठाने वाली भीड़ के विचारो से एक तरफ हटकर गौर करें तो हम पाते है कि उनके अंदाज में अब न वह पहले जैसी तल्खी है तथा न ही वह जोश दिखाई देता है जो राम मन्दिर आन्दोलन से लेकर पिछले लोकसभा चुनावों तक लगातार झलकता था। यहीं हाल लगभग सभी राजनैतिक दलो के नेताओं व कार्यकर्ताओं का है या फिर देश की जनता यह मान चुकी है कि आजादी के बहाने अपनी मौज का सामान जमा कर रहे हमारे नेता व नीति निर्धारक किसी भी कीमत पर आम आदमी का हित करने के पक्षधर नही, है, इसलिऐं इन्हें सुनने या इनके कहे पर विश्वास करने से कहीं ज्यादा अच्छा है कि इस समय का उपयोग अपनी रोजी-रोटी कमाने या मेहनत-मजूरी करने के लिये किया जाय। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि आजादी के इन सत्तर सालों में समय बढ़ने के साथ-साथ अपने नेताओं पर जनता का विश्वास डगमगाता दिख रहा है जिसके चलते एक बड़ी व संवैधानिक व्यवस्थाओं में आ रही कमजोरियाँ दूर से ही देखी जा सकती है लेकिन इन कमियों व कमजोरियों को ढ़ापने के लिऐ केवल तिरंगा लेकर दौड़ने या फिर भारत माता की जय बोलने व वंदेमातरम् गाने से काम नही चलने वाला और न ही इस तरह की व्यवस्थाओं को देकर हम बहुत ज्यादा लंबे समय तक अपनी आजादी को सुरक्षित ही रख पायेंगे।

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