राजनैतिक वर्चस्व की जंग में | Jokhim News

Thursday, October 19, 2017

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राजनैतिक वर्चस्व की जंग में

सड़क छाप गुण्डों की तर्ज पर लड़ते नजर आये प्रदेश के दो नामी-गिरामी मंत्रियों के समर्थक धर्मनगरी हरिद्वार में प्रदेश के दो कबीना मंत्रियों के समर्थकों द्वारा आमने-सामने की जूतमपेजार व लाठी-डण्डे चलने के घटनाक्रम को देखकर लगता है कि प्रदेश की राजनीति में कुछ नये समीकरण करवट ले रहे है और प्रदेश की सत्ता पर काबिज भाजपा के भीतर वैचारिक जंग व वर्चस्व की लड़ाई के अलावा भी ऐसा बहुत कुछ चल रहा है कि जिसे अनदेखा करना भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के लिये बड़ी भूल हो सकती है। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि विगत् लोकसभा चुनावों से पूर्व ही कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आये उत्तराखंड की राजनीति के बड़े नाम सतपाल महाराज का इस दौरान प्रदेश में घटे तमाम छोटे-बड़े घटनाक्रमों की पटकथा लिखने में महत्वपूर्ण योगदान रहा और महाराज के भक्तों की एक बड़ी संख्या के अलावा राष्ट्रीय व अन्र्तराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें प्राप्त ख्याति को देखते हुऐ भाजपा हाईकमान ने भी उन्हें पूरा सम्मान व तवज्जों प्रदान की जिसके चलते खुद को उत्तराखंड की भाजपाई राजनीति का मठाधीश मानने वाले कुछ स्वम्भू दिग्गजों को सतपाल महाराज की राजनैतिक हैसियत व हाईकमान से उनके बेहतर सम्बन्धों से दिक्कत महसूस होने लगी। यह ठीक है कि कुछ राजनैतिक समीकरण तथा संघ के दखल के चलते सतपाल महाराज को प्रदेश की राजनैतिक सत्ता पर कब्जेदारी के बाद मुख्यमंत्री पद से नही नवाजा गया लेकिन तेजी से बदल रहे राजनैतिक हालात ये इशारा कर रहे है कि शीघ्र होने वाले लोकसभा चुनावों में सतपाल महाराज को उनकी परम्परागत् सीट पौड़ी अथवा हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतारा जा सकता है। खबर है कि राजनैतिक माहौल को अच्छी तरह पहचानने वाले प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक इस बार हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र के स्थान पर पौड़ी लोकसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतरने का मन बना रहे है और इसके लिऐ उन्हें कहीं न कहीं सतपाल महाराज के सहयोग व आर्शीवाद की जरूरत महसूस होगी। शायद यहीं वजह है कि हरिद्वार में घटित ताजा घटनाक्रम के दौरान निशंक खेंमे के माने जाने वाले विधायक व उनके निकटवर्ती समर्थक सतपाल महाराज के नजदीक खड़े दिख रहे है। इधर दूसरी ओर प्रदेश राजनीति के तेज-तर्रार नेता माने जाने वाले मदन कौशिक यह अंदाजा लगा चुके है कि हाईकमान के एक खेंमे के साथ बेहतर सम्बन्धों व राजनैतिक दूरदृष्टि के बावजूद उनकी मुख्यमंत्री पद को पाने की अभिलाषा अभी दूर की कोड़ी है क्योंकि इस पहाड़ी राज्य का मुख्यमंत्री किसी गैर-पहाड़ी को बनाने के लिऐ भाजपा हाईकमान को भी काफी हिम्मत जुटानी होगी। इसलिऐं राजनीति के मैदान में आगे बढ़ने व सर्वस्वीकार्य नेता के रूप में पहचान बनाने के लिऐ उन्हें विधायक से सांसद बनने की इच्छा है। हांलाकि अभी लोकसभा चुनावों में काफी समय है और इन नेताओं के पास खुद को साबित करने के लिऐ प्रदेश स्तर पर ही काफी संभावनाऐं शेष है लेकिन अपनी-अपनी चुनावी जीत को ही राजनीति समझने वाले प्रदेश भाजपा के यह तमाम नेता उस राजनैतिक चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पा रहे है जो कभी खुद को सुरक्षित करने के लिऐ उनके ही द्वारा अपने चारों ओर रचा गया था। वैसे भी खंडूरी और कोश्यारी के भाजपा द्वारा तय मानकों से ज्यादा उम्र का हो जाने के बाद यह तय माना जा रहा है कि इन दोनों ही लोकसभा सीटों पर नये चेंहरों को आगे लाया जायेगा तथा राजनैतिक हलकों में चल रही चर्चाओं पर यकीन करें तो नैनीताल लोकसभा सीट पर प्रकाश पंत की सक्रियता व हरिद्वार में मदन कौशिक के वर्चस्व को देखकर यह अंदाजा लगाया जा रहा है कि पार्टी हाईकमान ने इन दोनों ही नेताओं को लोकसभा चुनावों की तैयारी करने का इशारा दिया हैं। अगर सूत्रों के हवाले से मिल रही खबरों को सही माने तो प्रकाश पंत हाईकमान के आदेशो का अनुपालन करने के बावजूद अभी लोकसभा की राजनीति करने के पक्ष में नहीं है और न ही प्रदेश की भाजपा सरकार इस स्थिति में है कि वह एक साथ अपने दो धुर्रन्धरों को विधानसभा से बाहर जाने का रास्ता दिखाकर सदन व संसदीय कार्यो की झौंक संभाल सकें । यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि वर्तमान विधायकों में प्रकाश पंत के अलावा मदन कौशिक ही एक मात्र ऐसे विधायक है जो संसदीय कार्यो के अनुभव व ज्ञान के अलावा अपनी वाकपटुता व राजनैतिक चार्तुर्य का भंली-भांति इस्तेमाल करना जानते हैं । हांलाकि इस क्रम में मुन्ना सिंह चैहान समेत अन्य कई नाम भी है लेकिन इनका संघीय अनुभव व राजनैतिक जीवन पर लगे प्रश्न चिन्ह इन्हें एकाएक ही कोई बड़ी जिम्मेदारी दिये जाने से रोकते है। लिहाजा यह माना जा रहा था और कहीं न कहीं मदन कौशिक को भी पूरा भरोसा था कि भाजपा हाईकमान आगे आने वाले दिनों में या तो उनका राजनैतिक कद बढ़ायेगा और प्रकाश पंत तो लोकसभा की दावेदारी के लिऐ मनाया जायेगा या फिर हरिद्वार के वर्तमान सांसद रमेश पोखरियाल निशंक को टिहरी या पौड़ी की राह दिखाते हुऐ हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र की बागडोर सौंप दी जायेगी। खुद को प्रदेश की राजनीति में स्थापित मानने वाले निशंक को भी अब तक इस फैसले से बहुत ज्यादा ऐतराज नही था क्योंकि इस बहाने उन्हें खुद को हाईकमान के सामने साबित करने का मौका मिलने वाला था लेकिन इस खेल में सतपाल महाराज के शामिल होते ही निशंक ने भी पैंतरा बदल लिया मालुम होता है क्योंकि निशंक यह अच्छी तरह जानते है कि सतपाल महाराज के साथ खड़े होने में हाल-फिलहाल कोई राजनैतिक नुकसान नही होने वाला बल्कि हाईकमान तक सीधी पकड़ रखने वाले सतपाल महाराज से बनाकर रखने में पौड़ी, टिहरी या हरिद्वार में से किसी भी लोकसभा क्षेत्र में कार्यकर्ता व अन्य मदद मिलने के अलावा चुनाव के मुख्य प्रतिद्वन्दी कांग्रेसी उम्मीदवार को हराने में अन्य कई प्रकार से भी सहायता मिल सकती है जबकि मदन कौशिक के लिऐ भी स्थिति ‘करो या मरो‘ वाली है और अपना खेल बिगड़ता देख वह सतपाल महाराज की किसी भी स्तर पर सक्रियता से पहले उनपर हावी हो जाना चाहते है। पिछले दिनों हरिद्वार स्थित अपने आश्रम में सतपाल महाराज द्वारा नमोनाद के बहाने राजनैतिक पत्ते फेटने की जो भूमिका रखी गयी उसने कहीं न कहीं मदन कौशिक को चैंका कर रख दिया और खुद को हरिद्वार क्षेत्र का र्निविवाद व बड़ा नेता मानने वाले मदन कौशिक अतिउत्साह में सतपाल महाराज को पटखनी देने का बहाना तलाशने लगे। कुदरत ने यह बहाना भी जनता की शिकायत के रूप में शीघ्र दिया या फिर ऐसा माहौल बनाया गया कि जो कुछ भी हो उसे व्यापक जनहित में लिया गया निर्णय माना जाय और मदन कौशिक के सिपाहसलाहार पूरे हरिद्वार शहरी की गंदगी, जाम व जल भराव को छोड़कर सतपाल महाराज के आश्रम क्षेत्र में जलभराव को दुरूस्त करने के नाम पर अतिक्रमण हटाने निकल पड़े। इधर नमोनाद से आनन्दित महाराज के भक्तों को एकाएक व बिना किसी चेतावनी के शासन व प्रशासन द्वारा उठाया गया यह कदम अपनी सम्प्रभुता पर हमला लगा और वह भी पूरे लावा लस्कर के साथ कौशिक के सिपाहसलाहकारों व अतिक्रमण हटाने के नाम पर मनमानी को उतारू सरकारी कर्मियोें पर टूट पड़े और हरिद्वार की जनता भी यह मान रही है कि राजनीति की आड़ में अपनी सम्प्रभुता साबित करने की कोशिशों के कारण शुरू हुई यह जंग अभी इतनी आसानी से रूकने वाली नही है लेकिन नमोनाद के बहाने सतपाल महाराज ने प्रदेश भर के तमाम ढ़ोल वादकों को एक मंच के नीचे एकत्र कर जो दांव खेला है उसका कोई तोड़ मदन कौशिक या सतपाल महाराज को कम करके आंकने वाले नेताओं के पास नही है और मजे की बात यह है कि इस पूरे कार्यक्रम को सरकारी रंग देने के बावजूद महाराज व उनके आश्रम अधीनस्थों द्वारा इस संदर्भ में जगह का कोई किराया न वसूला जाना या फिर बाजीगरों के रूकने की व्यवस्था व भोजन आदि में किया गया न्यूनतम् व्यय यह भी साबित करता है कि इस आयोजन के पीछे महाराज की नीयत में कोई खोट नही था। खैर इस जंग के परिणाम क्या होंगे और मदन कौशिक, निशंक, सतपाल महाराज या फिर इसी तरह राजनीति में आगे बढ़नेे व शीर्ष पदों को हासिल करने की ख्वाहिश रखने वाले अन्य नेताओं का राजनैतिक भविष्य क्या होगा, यह तो वक्त ही बतायेगा लेकिन हम सिर्फ इतना ही कह सकते है कि नमोनाद के आयोजन के बाद हरिद्वार के प्रेमाश्रम क्षेत्र में जो कुछ भी हुआ वह भाजपा के राजनैतिक भविष्य के लिऐ ठीक नही है।

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