राजनीति की इस नूराकुश्ती में | Jokhim News

Thursday, September 21, 2017

Select your Top Menu from wp menus

राजनीति की इस नूराकुश्ती में

राज्यसभा प्रत्याशी अहमद पटेल के चयन मामले में चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ न्यायालय पहुँची भाजपा
मीडिया तंत्र चाहे जिस नजरियें से भी देखे लेकिन अहमद पटेल के राज्यसभा हेतु चुने जाने के बाद सत्तापक्ष के नेताओं द्वारा चुनाव आयोग के इस आदेश को उच्चतम् न्यायालय में चुनौती देना यह साबित करता है कि गुजरात में लगातार जारी कोशिशों के बावजूद मिली इस हार ने भाजपा के राजनैतिक नेतृत्व को हिलाकर रख दिया है और आगामी लोकसभा चुनावों के लिऐ मैदान में जाने से पहले ही कांगे्रस पार्टी को राजनैतिक रूप से मृत घोषित करने के अरमानों पर पानी फिरता देख भाजपा के नीतिनिर्धारक पूरी तरह सदमें में है। सारे देश ने देखा कि गुजरात की एक राज्यसभा सीट हासिल करने के लिऐ भाजपा ने कितने हथकण्डे अपनाने की कोशिश की और किस तरह आयकर विभाग का दुरूपयोग कर कांग्रेस विधायक दल में सेंधमारी का प्रयास किया गया लेकिन इस सबके बावजूद भाजपा के नेता कांग्रेस से पार नही पा सके बल्कि कुछ भाजपाई विधायकों की कांग्रेसी खेमें में आ मिलने की खबर मोदी व अमित शाह की जोड़ी को विचलित करने वाली है क्योंकि शीघ्र ही राजस्थान, गुजरात और हिमाचंल समेत कई अन्य राज्यों में चुनाव है और लोकसभा चुनावों से ठीक पहले होने वाले इन तमाम राज्यों के चुनावों में कहीं से कांग्रेस के मजबूती से खड़े होने की खबर आती है तो यह लोकसभा चुनावों के दौरान मोदी की गद्दी के लिऐ खतरें की घंटी हो सकती है। हांलाकि राज्यसभा के चुनावों को आधार मानकर जनाकांक्षाओं का अंदाजा नही लगाया जा सकता और न ही और अहमद पटेल के अलावा खुद अमित शाह व स्मृति ईरानी के गुजरात राज्यसभा से सांसद चुने जाने के बाद यह कहना भी पूरी तरह ठीक नही है कि गुजरात मामले में भाजपा को पूरी तरह हार मिली है लेकिन जिस तरह का माहौल चल रहा है और भाजपा से जुड़े लोग जिस तरह अपहरण, हत्या व बलात्कार के अलावा देश-द्रोह व आंतकवाद से जुड़े मामलों में पकड़े जा रहे है, उसे देखते हुऐ हम यह कह सकते है कि आचरण में शुचिता व अनुशासन की बात करने वाली भाजपा किसी भी कारण से देश के अन्य राजनैतिक दलों से अलग नही है। यह ठीक है कि राजनीति में सब जायज है, वाले अंदाज में विपक्ष पर की जा रही कार्यवाही के जरियें पूर्व की सरकारों व सत्ता पर काबिज राजनैतिक दलों ने विपक्ष पर दबाव बनाया है तथा सीबीआई समेत अन्य तमाम सरकारी ऐजेन्सियों के दुरूपयोग से कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकारें भी अछूती नही रही है लेकिन मौजूदा हालातों में सत्तापक्ष ने जिस तरह विपक्ष के हाथों मात खायी है उससे यह स्पष्ट है कि कांग्रेस के दिग्गज अब धीरे-धीरे भाजपा के रणनीतिकारों की रणनीति समझने लगे है और अगर यह सिलसिला ज्यादा लम्बा चला तो कोई बड़ी बात नही है कि आगामी लोकसभा चुनावों के लिऐ मैदान में जाने से पहले ही भाजपा के तमाम हथियार भोथरंे हो जाये। हमने देखा कि भाजपा के नेताओं ने सत्ता को हासिल करने के लिऐ किस तरह भ्रष्टाचार व मंहगाई को मुद्दा बनाया और सुशासन के नारे के साथ सत्ता के शीर्ष पर पहुँची भाजपा ने किस तरह मीडिया पर अंकुश लगाने वाले अंदाज मे खबरिया चैनलों को अपने पक्ष में कर या फिर जनसामान्य की आवाज समझे जाने वाले छोटे व मझोंले समाचार पत्रों के प्रकाशन की राह में रोड़े खड़े कर सत्तापक्ष की असलियत से जुड़ी खबरें जनता तक पहुँचने से रोकने की कोशिश की। यह ठीक है कि हरियाणा में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के बेटे द्वारा एक आईएस की बेटी से की गयी छेड़छाड़ जैसे मामले को सरकारी तंत्र पूरी कोशिशों के बावजूद भी मीडिया में उछलने से नही रोक पाया लेकिन इसके लिऐ असल तौर पर दाद पीड़ित पक्ष व उसके साथ खड़ी जनता को देनी होगी जिसके विरोध व गुस्से को अनदेखा करने की हिम्मत मीडिया भी नही जुटा पाया। वरना ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओं‘ जैसे नारों के पीछे छिपे वीभत्स भाजपाई चेहरों को बेनकाब होने में थोड़ा समय और लगता तथा नमों-नमों के नशे में डूबी जनता जब तक यह समझ पाती कि आॅखिर गलती कहाँ हुई, तब तक तीर निशाने पर लग चुका होता। हांलाकि यह माना जा सकता है कि पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा विगत् में किये गये समझौतों के अनुपालन एंव अन्र्तराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप स्वीकार की गयी पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के अन्र्तगत् सरकार द्वारा जनता को सीधे तौर पर दी जा रही राहत राशि, अनुदान अथवा छूट आदि में कमी करना या फिर इसे बंद किया जाना अवश्यम्भावी है तथा पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहाराव के ही समय से लागू की गयी योजनाओं व उदारवादी अर्थव्यवस्था को अंगीकार करते वक्त ही यह तय हो गया था कि आने वाले कल में देश की जीएसटी जैसी व्यवस्थाओं से जूूझना पड़ सकता है लेकिन अपने मुंह मियाँ मिट्ठू बनने वाले अंदाज में सरकार ने तमाम पुरानी घोषणाओं व योजनाओं को कुछ इस तरह लागू किया मानो वह आम आदमी के हित में कितना बड़ा कदम उठा रही हो और सर्जिकल स्ट्राइक समेत कई तरह के जुमले गढ¬कर देश के भीतर इस तरह का माहौल बनाने की कोशिश की गयी कि मानो हमारा यह देश बस युद्ध के मोर्चे पर खड़ा ही होने वाला हो। इस तरह की तमाम आफवाहो, माहौल बनाने के अंदाज तथा सरकार के खिलाफ जाने वाली खबरों पर पूरी तरह रोक लगाने के लिऐ मीडिया के एक हिस्से पर अद्योषित रोक लगाने की कोशिश ने पूरे देश में भावनाओं का इस तरह दोहन किया कि एकबारगी तो ऐसा लगा मानो नमों-नमों का ज्वार-भाटा ही आ गया हो लेकिन धीरे-धीरे कर देश की जनता असली हालातों से रूबरू होती प्रतीत हो रही है और सरकार की कार्यशैली व उसके फैसलों पर सवाले पूछे जाने भी शुरू हो गये है। इस मौके पर कांग्रेस समेत समुचे विपक्ष को अपनी जिम्मेदारियोें का अहसास होना चाहिऐं और सत्ता के खेल में बने रहने के लिऐ उन्हे अपनी रणनीति व चुनाव लड़ने के तरीके पर भी पुर्नविचार करना चाहिऐं। हमने देखा कि राज्यसभा चुनावों के दौरान अहमद पटेल के इशारें पर कांग्रेस ने अपनी रणनीति में थोड़ा सा बदलाव किया तो भाजपा चारों खाने चित दिखार्द दी जिससे येन-केन-प्रकारेण सत्ता के शीर्ष पदो को हथियाने की जुगत में लगे भाजपाईयों को एक झटका भी लगा। यह ठीक है कि भाजपा के रणनीतिकार विपक्ष के नेताओं को पिटवाकर या फिर उनके काफिले पर पत्थर पड़वाकर यह साबित करने का प्रयास कर रहे है कि देश की अधिसंख्य जनता आज भी विपक्ष के नेताओं के विरोध में है लेकिन यकीन जानियें कि यह सिलसिला ज्यादा लम्बा चलने वाला नहीं, क्योंकि पत्थरबाजी जैसे कृत्यों को अंजाम देने के बाद भाजपा की इस मुहिम को कोई बड़ा फायदा भले ही न हुआ हो लेकिन कांग्रेस का निचले स्तर का कार्यकर्ता जो कल तक यह मान बैठा था कि उसके नेताओं में वाकई कोई दम नही बचा, आज एक बार फिर दूने उत्साह से अपने संगठन व नेता का झण्डा थाते नजर आ रहा है। लिहाजा मौजूदा केन्द्र व भाजपा शासित राज्य सरकारों की मजबूरी होगी कि वह हाल-फिलहाल में बड़े फैसले लेने से बचे और अगर ऐसा होता है तो यह उस व्यवस्था की हार होगी जिसे आधार बनाकर नरेन्द्र मोदी ने अपनी ताबड़तोड़ पारी की शुरूवात की थी। हम देख रहे है कि देश का किसान आत्महत्या कर रहा है और भाजपा की राजनैतिक रीढ़ माना जाने वाला छोटा व्यापारी जीएसटी के फेर में ऐसा उलझा है कि उसे अपनी सुध-बुध ही नहीं है। ठीक इसी प्रकार जनसामान्य बैंको द्वारा लागू किये गये तमाम प्रकार के नये प्रावधानों के जरिये शुल्क काटने से परेशान है तो गरीब व बेसहारा वर्ग यह समझ नहीं पा रहा है कि एकाएक ही बंद कर दी गयी उसे मिलने वाली छूट व अनुदान राशि किस तरह व कब तक उसके खाते में आयेगी और फिर बैंको द्वारा इस राशि का भुगतान किस आधार पर किया जाना संभव होगा। अपने वेतन भत्तों तक सीमित रहने वाला सरकारी कर्मचारी तथा कार्पोरेट सेक्टर की भाषा बोलने वाला तथाकथित संभ्रात वर्ग तेजी से बढ़ रही मंहगाई को एक समस्या तो मान रहा है लेकिन उसे इससे बहुत ज्यादा ऐतराज नही है बल्कि अगर गंभीरता से देखा जाय तो उसकी ज्यादा रूचि यह जानने में है कि तमाम तरह की कटौती करने व अनुदान राशि पर रोक लगाने के अलावा जीएसटी समेत आयकर व अन्य माध्यमों से बड़ी राशि वसूलने वाला सरकारी तंत्र इस धन का उपयोग किस तरह से करता है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि अहमद पटेल मामले में भाजपा की शह पर खुद भाजपा को ही मिली मात के बाद से राष्ट्रीय राजनीति के परिपेक्ष्य में समीकरण तेजी से बदलते हुऐ दिखाई दे रहे है और एक बार फिर दिलचस्प होते दिख रहे राजनैतिक मुकाबलों के बीच यह प्रश्न आवश्यक रूप से उठता दिख रहा है कि जीत के लिऐ आवश्यक मतप्रतिशत् को अपने साथ जोड़े रखने के लिऐ मोदी व अमित शाह की जोड़ी अब कौन सा नया पैंतरा आजमायेगी।

About The Author

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *