जो शहीद हुऐ है उनकी | Jokhim News

Thursday, November 23, 2017

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जो शहीद हुऐ है उनकी

देश की आजादी के आन्दोलन में हर छोटी-बड़ी भूमिका महत्वपूर्ण लेकिन नही उठाया जा सकता भारत की आजादी के आन्दोलन के इतिहास को बदलने का खतरा।
अगस्त क्रान्ति दिवस की पचहत्तरवीं वर्षगांठ के अवसर पर वंदेमातरम् व भारत माता की जय के नारों की गूंज के बीच कहीं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारों की जय जयकार तथा आजादी के आन्दोलन से जुड़े अग्रणी व अनगिनत सितारों के लिऐ अपशब्द भी सुनाई पड़ रहे है और जिनका अपना कोई कोई इतिहास नही है वह इतिहास के पन्नों से खोदकर लाने का दावा करते हुऐ महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को लेकर ऐसे दावे कर रहे है कि मानवता भी शरमा कर रह जाये। हांलाकि नेता किसी एक दल या समाज के एक हिस्से का नही होता और न ही आजादी के संघर्ष को दलीय व्यवस्था के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के तहत चुनावी दंगल में भागीदारी के लिऐ हमारे नेताओं व राजनैतिक दलों ने स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास का भी बंटवारा कर लिया और राजनीति के एक हलके में यह मान लिया गया कि अगर इन्दिरा और राजीव के नाम के साथ गांधी नही जुड़ा होता तो वह व उनकी अगली पीढ़ी आज भी देश की राजनीति पर काबिज होकर प्रभावी भूमिका नहीं निभा रही होती। यह ठीक है कि आजादी के आन्दोलन में कांग्रेस की अहम् भूमिका रही या फिर यह भी कह सकते है कि आजादी के आन्दोलन वाले दौर में कांग्रेस एक राजनैतिक दल मात्र न होकर तमाम विचारधाराओ से जुड़े आन्दोलनकारियों का एक ऐसा संगम था जहाँ से उन्हें अनन्त उर्जा व जनसमर्थन प्राप्त होता रहा। मौजूदा दौर में इतिहास बदलने के ख्वाहिशमंद कुछ लोग चाहते है कि एक राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान विभिन्न विचारधाराओं को आपसी वैमनस्य त्याग कर एक मंच पर एकत्र करने वाली कांग्रेस के इतिहास को बदल लिया जाय या फिर इस इतिहास को कुछ इस तरह से लिखा जाय कि कांग्रेस का उजला पक्ष भी जनता की नजर में स्याह नजर आये लेकिन इस तरह की कोशिश करने वाले लोग यह नहीं जानते कि इतिहास से खेलने की यह कोशिश कितनी खतरनाक हो सकती है और इतिहास के गर्भ से निकलने वाले सुलगते सवाल किस हद तक आपको होंठ बंद करने के लिऐ मजबूर कर सकते है। हम यह नही कहते है कि देश की आजादी की लड़ाई के वक्त हमारे बड़े नेताओं से गलतियाँ नही हुई या फिर उनके आपसी अहम के झगड़े ने आजादी के आन्दोलन को नुकसान नही पहुँचाया लेकिन हम यह भी जानते है कि इतिहास में घुसकर उन गलतियो को ठीक नही किया जा सकता और न ही हम ऐतिहासिक दस्तावेजों में फेरबदल कर सकते है। लिहाजा सच को स्वीकारना और अगस्त क्रान्ति दिवस से लेकर स्वतंत्रता दिवस तक के तमाम घटनाक्रमों को जस का तस कबूल करना हमारी मजबूरी भी है और अहोभाग्य भी लेकिन कुछ राजनैतिक लोग व विचारधाराऐं इस सच को नही स्वीकार पाती और चरखा लेकर सूत कातते गांधी की भावनाओं को समझने के स्थान पर वह इसी अंदाज में अपने नेता या पंसदीदा चेंहरे को देखना पंसद करती है। लिहाजा सच और झूठ के बीच एक व्यापक संघर्ष शुरू हो जाता है और भगत सिंह जैसे शहीद क्रान्तिकारियों के बसंती चोले का भगवाकरण कर राजनैतिक विरासतों पर कब्जेदारी का एक नया खेल शुरू होता है। चुनावी जीत के लिऐ लौह पुरूष सरदार बल्लभ भाई पटेल के आचरण, हिम्मत व अदम्य साहस को देश की युवा पीढ़ी के लिऐ आदर्श रूप में स्थापित किये जाने की आवश्यकता के स्थान पर उनकी लौह प्रतिभा बनाने व उसकी विशालता या ऊँचाई पर चर्चा करने का काम ज्यादा महत्वपूर्ण दिखाई देने लगता है। आजादी के आन्दोलन का इतिहास हमारे पूर्वजों के अदम्य साहस और वीरता का इतिहास है तथा इतिहास के पारखी इस तथ्य को अच्छी तरह जानते है कि कुछ मनगणन्त किस्से कहानियों या फिर ऐतिहासिक घटनाक्रमों को कम-ज्यादा कर दिखाने की सोच के साथ इसे बदला नही जा सकता लेकिन देश की वर्तमान राजनैतिक परिस्थितियों के हिसाब से सत्ता के धुरन्धर खिलाड़ी अपने राजनैतिक हानि-लाभ को दृष्टिगत् रखते हुऐ इसमें बदलाव चाहते है और बदलाव की यहीं चाहत झूठ व फरेब के खेल को जन्म देती है। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि भारतीय इतिहास वैत्ताओं ने देश की आजादी के आन्दोलन का प्रमाणिक दस्तावेज बनाते वक्त महात्मा गांधी समेत कांग्रेस के उन तमाम बड़े नेताओं को विशेष तवज्जों दी है जो देश की आजादी के बाद कांग्रेस के अभिन्न अंग के रूप में आजाद भारत में गठित होने वाली सरकारों के अहम् पदो पर रहे तथा कांग्रेस के नेतृत्व में चलाये गये असहयोग आन्दोलन, नमक सत्याग्रह या फिर अहिंसा के नारे को इतिहास में ज्यादा तवज्जों दी गयी है जबकि देश की आजादी के आन्दोलन से व्यापक जनभावनाओं को जोड़ने के क्रम में सरदार भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद और सुभाष बोस समेत उन तमाम नेताओं व क्रान्तिकारी साथियों को अनदेखा नही किया जा सकता जिन्होंने आजादी के इस आन्दोलन को एक नई दिशा देने या फिर जनसामान्य के बीच आजाद भारत की ललक जगाने के लिऐ अदम्य साहस के साथ काम किया लेकिन इस सबके बावजूद इन तमाम ऐतिहासिक दस्तावेजों में कोई वैमनस्य नही दिखाई देता और न ही कोई शहीद क्रान्तिकारी अपनी शहादत से पहले यह सवाल पूछता प्रतीत होता है कि उसकी शहादत ज्यादा महत्वपूर्ण थी या फिर गांधी की गिरफ्तारी और रिहाई। इतिहास के पन्नों को टटोलने पर हम पाते है कि आजादी के जूनून में पूरा देश किस तरह से एक अधनंगे और दुबले-पतले शख्स के पीछे चल पड़ा था तथा खुद को इस शख्सियत का राजनैतिक धुर विरोधी मानने वाली आन्दोलनकारी ताकतें भी विभिन्न विषयों पर इस व्यक्ति की सलाह व आदेश को शिरोधार्य करती थी। कितना आश्चर्यमिश्रित सत्य है कि अपने जिन नेताओं को हम उनकी जाति, धर्म या फिर भाषा व क्षेत्र के आधार पर पहचानने व जानने की जिद पाले हुऐ है तथा जिन नेताओं के परस्पर राजनैतिक सम्बन्धों व आन्दोलन में भागीदारी के उद्देश्यों को लेकर हम सवाल खड़े करने से नहीं चूकते, उनका गांधी, उनकी कर्मठता और लोकप्रियता पर एक विश्वास था। शायद यहीं वजह थी कि देश की आजादी के अन्तिम दौर में हुऐ निर्णायक आन्दोलन में गांधी ही एकमात्र केन्द्र थे और इस तथ्य को व्यापक परिपेक्ष्य में कहना चाहे तो हम यह भी कह सकते है कि भारत की आजादी के आन्दोलन में गांधी एक ऐसा नाम था जो इस दौर के समस्त आन्दोलनकारियों व स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को खुद ही परिभाषित कर देता था लेकिन इस सबके बावजूद जब देश आजाद हुआ तो गांधी शब्द के मायने बदले और एक बार फिर गांधी को देश के टुकड़े होेने से बचाने व नरसंहार रोकने के लिऐ अपने अन्दर छुपी आन्दोलन की ताकत का आवहन करना पडा़, जिसका नतीजा कालान्तर मे उनकी मौत के रूप में सामने आया। गांधी की मौत, देश की आजादी के बाद भी कांग्रेस का राजनैतिक अस्तित्व बरकरार रखना या फिर सुभाष चन्द्र बोस की रहस्यमय मृत्यु और गृह मंत्री के रूप में देशभर की छोटी-बड़ी रियासतों को भारतीय गणराज्य का हिस्सा बनाने के लिऐ सरदार पटेल द्वारा किये गये विभिन्न समझौते, ऐसे ज्वलंत विषय है जो तात्कालिक परिस्थतियों व वक्त की जरूरत की देखते हुऐ उस दौर के नेताओं द्वारा लिये गये और जिन फैसलों के सहीं या गलत होने का सीधा फर्क एक ताजातरीन राष्ट्र के अस्तित्व व राजनैतिक आंकाक्षाओं को झंकझोर सकता था लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ और हमें गर्व है कि अगस्त क्रान्ति (09 अगस्त) का बिगुल फुक्ने के इन पचहत्तर वर्षो बाद हम न सिर्फ एक पूर्ण सम्प्रभुता सम्पन्न राष्ट्र है बल्कि दुनिया के सबसे बडे़ व सफल लोकतंत्र के रूप में हमें सम्पूर्ण वैश्विक परिवेश में भी मान्यता मिली हुई है।

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