लोकपर्वो के आईने से हमारे त्योंहार | Jokhim News

Sunday, September 24, 2017

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लोकपर्वो के आईने से हमारे त्योंहार

रक्षाबंधन के अवसर पर बहन को रक्षा का वचन देने वाला भाई आज लाचार, बेरोजगार या फिर नशे का शिकार रक्षाबंधन के परम् पावन पर्व पर चाईनीज राखियों के विरोध में सुगबुगाते स्वरों तथा विभिन्न उद्देश्यों के साथ आयोजित किये जाने वाले राजनैतिक बंधनों के त्योहार ने इस अवसर की पवित्रता, लोकप्रियता व उद्देश्यों पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिये है तथा भारतीय रीति-रिवाज व धार्मिक आयोजनों के प्रति एक विशेष कोतुहल भरी श्रद्धा रखने वाला सम्पूर्ण विश्व का एक बड़ा हिस्सा हमारे समाज में तेजी से आ रहे इस बदलाव को आश्चर्य मिश्रित अचरज के साथ निहार रहा है। यह कहने में कोई हर्ज नही है कि भारत के परम्परागत आयोजन एवं तीज त्योंहार सामाजिक एवं पर्यारवरणीय उद्देश्यों की प्राप्ति की दिशा में विशेष योगदान देते रहे है तथा एक संकल्पित व आदर्श समाज की स्थापना में भारतीय रीति-रिवाजों की अपनी एक अलग भूमिका रही है लेकिन इधर पिछले कुछ दशकों से देखा जा रहा है कि हमारें समाज का ही एक हिस्सा अपने राजनैतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिऐ इन रीति-रीवाजों व धार्मिक आयोजनों के स्वरूप में थोड़ी हेर-फेर कर सामाजिक मूल्यों को पलीता लगा रहा है। हांलाकि धार्मिक आयोजनों व रीति-रिवाज को राजनीतिक रूप देते हुऐ परम्पराओं के सार्वजनिक रूप से आयोजन के लिऐ इसके मूल स्वरूप में समय-समय में बदलाव किया जाता रहा है और देश, काल व परिस्थितियों के अनुरूप खुद में बदलाव लाने वाले भारतीय समाज ने इसे स्वीकार भी किया है लेकिन परिवर्तन या तथ्यों से छेड़छाड़ का उद्देश्यों अगर सामाजिक लाभ या ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः‘ न होकर सत्ता के शीर्ष को प्राप्त करना मात्र हो तो इस तरह के बदलाव या फिर तीज-त्योहारों के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ को सही नही कहा जा सकता। यह ठीक है कि ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है‘ वाली तर्ज पर ब्राहमणों द्वारा समाज की रक्षा के संकल्प के साथ बांधे जाने वाले रक्षासूत्रों ने कब बहिनों द्वारा अपनी रक्षा के वचन के साथ भाईयों की कलाई पर बांधी जाने वाली रेशम की डोर का स्थान ले लिया और बाजार की जरूरतों को पूरा करते-करते यह डोर कब व कैसे विभिन्न डिजाइनों या आकार वाली राखियों में तब्दील हो गयी, पता नहीं नही चला लेकिन सामाजिक बदलाव, व्यापारिक सूझ-बूझ और बाजार की जरूरतों को ध्यान में रखते हुऐ किये, जाने वाले बदलावो के क्रम में राखी, रक्षाबंधन या फिर रक्षासूत्र के पीछे छिपी कमजोर, गरीब या फिर बेसहारा वर्ग की साधनसम्पन्न वर्ग द्वारा रक्षा किये जाने के संकल्प की मूल भावना नहीं बदली। इसके ठीक विपरीत भारत में स्थापित लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के क्रम में गठित सरकारों ने देश की जनता को अपनी-अपनी परम्पराओं व रीति-रिवाज का अनुपालन करते हुऐ धार्मिक तीज-त्योहार मनाने की आजादी तो दी लेकिन सरकारी स्तर पर किये जाने वाले धर्मनिरपेक्षता के दिखावें ने इस परम्पराओं व तीज-त्योहारों का मजाक बनाकर रख दिया। कितना आश्चर्यजनक है कि एक तरफ तो हमारा कानून व न्याय व्यवस्था सामाजिक रूप से महिलाओं को बराबरी का हक और अन्याय के खिलाफ संघर्ष की ताकत देता है तो दूसरी तरफ इसी कानून की रक्षा का दम्भ भरने वाले हमारें नीतिनिर्धारक सार्वजनिक आयोजनों में महिलाओं से राखी बंधवाते हुऐ उन्हें रक्षा का वचन देने का स्ंवाग भरते है लेकिन इस सबके बावजूद समाज में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार व अपराधों में कोई कमी आती नही दिख रही बल्कि अगर महिलाओं के खिलाफ होने वाले जुर्म की फेहिस्त का सम्पूर्ण राष्ट्रीय स्तर पर आंकलन करें तो यह तथ्य आसानी से सामने आ सकता है कि महिलाओं के खिलाफ जुर्म को शह देने अथवा अपराधी का बचाव करने में वहीं तमाम राजनैतिक चेहरे ज्यादा मुस्तैदी से सक्रिय है जो अपने राजनैतिक वजूद को बचाये रखते हुए रक्षाबंधन जैसे तमाम धार्मिक व सामाजिक आयोजनों में न सिर्फ दिल खोलकर पैसा खर्च करते है बल्कि इस तरह के अवसरों का जोर-शोर से प्रचार-प्रसार करना तथा मीडिया का भरपूर उपयोग करते हुऐ हमेशा सुर्खियों में बने रहना जिनका मुख्य शौक होता है। राजनीति के पटल पर मनाये जाने वाले रक्षाबंधन जैसे तमाम तीज-त्यौहारों को लेकर लगातार बढ़ रही गहमागहमी से समाज की मानसिकता में भी तेजी से बदलाव आ रहा है और अब व्यवसायिकता में तब्दील होते जा रहे सामाजिक सम्बन्धों के बीच घर से राखी बंधाकर निकला भाई अगर चैराहे पर किसी लड़की पर फब्तियाँ कंसते दिखता है तो कोई आश्चर्य नही होता। न ही हमारी मानवता तब शर्मशार होती है जब कुछ ताकतवर व बाहुबली किस्म के लोग हमारी आंखों के सामने किसी बहन-बेटी की अस्मत को तार-तार कर देते है या फिर जनरक्षा के संकल्प से खोले गये पुलिस थानों में हैवानियत का नंगा नाच खेला जाता है। अपने-अपने घर से रक्षासूत्र पहनकर निकले तमाम कर्मवीर इस तरह के अवसरों पर मोमबत्ती जलाकर धरना-प्रदर्शन करने के अलावा और कुछ कर भी नहीं सकते क्योंकि साधनसम्पन्नों के हितों की रक्षा के लिऐ बना कानून उन्हें इससे ज्यादा कुछ करने की इजाजत ही नहीं देता लेकिन हद तो यह है कि व्यापक जनहित की रक्षा के वादे का रक्षासूत्र पहनाकर जनमत की नेेग मांगने वाले हमारे नेता व सम्मानित जनप्रतिनिधि इस तरह क अवसरों पर कतई तैंश में नही दिखते बल्कि इस एक घटनाक्रम से सबक लेते हुऐ महिला बिरादरी विशेषकर बदलाव लाने की पेरोकार लड़कियों को हदों में रहने, सलीके के वस्त्र पहनने व पुरूष वर्ग की गुलामी को ही अपना अहोभाग्य समझनें की नसीहतें दी जाती है। इन हालातों में सामूहिक रूप से रक्षाबंधन मनाने के लिऐ पार्टी की महिला कार्यकर्ताओ के साथ हँसते-खिलखिलाते फोटो खिंचवाने का क्या औचित्य, क्या इस तरह के आयोजनों में भागीदारी करने वाली महिलाएं अपने इस तथाकथित व राजनैतिक रूप से सम्पन्न भाई से नेग में अगले चुनावो की दावेदारी का टिकट मांगने तक सीमित है या फिर राजनीति के लिऐ जरूरी माने जाने वाले प्रचार-प्रसार के इस दौर ने रिश्तों को इतना कमजोर बना दिया है कि इन्हें किसी भी क्षण तोड़कर किसी अन्य स्वरूप में ढ़ाला जा सकता है। रक्षाबंधन के अवसर पर सवालों के कुछ ऐसे ही झंझावातों के बीच स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न भी उठता है कि राजनैतिक व सामाजिक रूप से बराबरी का दर्जा मांगने वाली महिलाऐं, महिला सशक्तिकरण के नारे को लेकर मचे इस शोर को दशकों बीत जाने के बावजूद भी इतनी कमजोर क्यों है कि उन्हें अपनी रक्षा के लिऐ किसी कमजोर, नशे के आदी, अय्याश या फिर मतलबपरस्त भाई के हाथ में रेशम की डोर बांधकर अपनी मदद के लिऐ गुहार लगानी पड़ती है और बेरोजगारी व आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहा एक भाई इतना निकम्मा व खुदगर्ज कैसे हो गया है कि भावनाओं से ओत-प्रोत इस सालाना मौके पर अपनी बहन के छलकते प्यार को समेट लेने के लिऐ उसकी फटी हुई जेबो में कोई जगह ही नही है।

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