बेमन से सुनी गयी ‘मन की बात‘ | Jokhim News

Monday, December 11, 2017

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बेमन से सुनी गयी ‘मन की बात‘

मोदी के भाषण व भाषाशैली में नही रहा पहले जैसा आकृर्षण
अपने मन की बात के जरियें शुरूवाती दौर में खूब सुर्खिया बटोरने वाले देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को शायद अंदाजा आ गया है कि देश की जनता ने उनकी बातों को तवज्जों देनी कम कर दी है और उनकी कथनी एवं करनी में साफ महसूस होने वाले फर्क को देखतेे हुऐ जनसामान्य ने उनके बारे में राय को बदलना शुरू कर दिया है। शायद यहीं वजह है कि इस बार मन की बात करते हुऐ प्रधानमंत्री मोदी ने न सिर्फ मानसून, महिला क्रिकेट, रक्षाबंधन, भ्रष्टाचार और गरीबी समेत जीएसटी जैसे तमाम मुद्दों को छूने की कोशिश की बल्कि वह अगस्त क्रान्ति दिवस और आंतकवाद व जातिवाद जैसे मुद्दों पर खुलकर बोले। हांलाकि उनकी बात-चीत या भाषण से यह नही दिखाई दिया कि वह किसी भी स्तर पर किसानों के आन्दोलन व उनकी आत्महत्या से चिन्तित है या फिर देश की राजनीति को विपक्ष से मुक्त बनाने की उनकी जिद ने न सिर्फ लोकतांत्रिक परम्पराओं से खिलवाड़ किया है बल्कि नीतियों व सिद्धान्तों के आधार पर काम करने वाली भाजपा की सूरत और सीरत भी बदल डाली है। अपने सम्बोधन में मानसून और भ्रष्टाचार का जिक्र करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के विभिन्न हिस्सों में भारी बरसात के अलावा छुटपुट बूँदा-बादी की स्थिति में नालियों का पानी सड़क पर आने या स्थानीय निकायों की खस्ता हालत की वजह से, नालियों के कूड़ें से ठसे होने की समस्या पर कुछ भी कहने से बचे तथा स्वच्छ भारत अभियान के नाम पर नेताओं, विधायकों व मन्त्रियों व द्वारा खाली फोटो खिंचवानें तक सीमित रहे कार्यक्रमों एवं सड़कों निर्माण में लगातार हो रहे भ्रष्टाचार पर भी वह कुछ कहने से बचते नजर आये। यह ठीक है कि आंतकवाद एवं जातिवादी हिंसा पर उन्होंने जनता का ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास किया और साम्प्रदायिकता भारत छोड़ो का नारा देकर न्यू इण्डिया के लिए एक नया आन्दोलन चलाने का आवहन देश की जनता विशेषकर बच्चों से किया गया लेकिन सरकार के मुखिया के तौर पर मोदी जी जनता को यह बताने से बचे कि चुनावी मोर्चे से एक सर के बदले दस आंतकियों के सर लाने सम्बन्धी उनकी घोषणाओं को पूरा क्यों नही किया गया या फिर भारतीय गणराज्य में तेजी से बढ़ रही आर्थिक असमानता, बेरोजगारी और अपराधों की बढ़ती संख्या को लेकर उनकी सरकार द्वारा पिछले तीन-चार वर्षो में क्या प्रयास किये गये। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि जातिवादी समीकरणों के आधार पर राजनैतिक सफलताऐं हासिल करते रहे कुछ चेहरें या राजनैतिक दल अपने वोट-बैंक को सहेजने के लिऐ जय भीम या दलित एकता जैसे तमाम नारों के माध्यम भय का साम्राज्य कायम करना चाहते है और पिछले कुछ दिनों में दलित बनाम स्वर्ण के संघर्ष को हवा देते हुऐ आंतक के नये पर्याय खड़े करने की कोशिशें लगातार जारी है लेकिन एक सर्वभौमिक सत्ता के नेता सदन के रूप में नरेन्द्र मोदी आम आदमी को यह समझाने में असमर्थ रहे कि उन्होंने या उनकी सरकार ने अपने तीन वर्षो के शासनकाल में सामाजिक रूप से पिछड़ी जातियों या जनसमुदायों को सक्षम बनाने के लिऐ क्या प्रयास किये या फिर मोदी सरकार के इस कार्यकाल में आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़ी जातियों को आगे बढ़ाने के लिये क्या प्रयास किया जायेगा। देश के राष्ट्रपति चुनाव में भी योग्यता के स्थान पर जाति को प्रमुखता देने वाली भाजपा अपनी राजनैतिक हैसियत बनाये रखने के लिऐ न्यायालयी रोक के बावजूद पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था लागू करना चाहती है और भुखमरी से हो रही मौत या किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या के मुकाबले भाजपा के अनुसांगिक संगठनों व नेताओं के लिऐ गाय का मुद्दा महत्वपूर्ण है। ठीक इसी प्रकार महिला उत्पीड़न, बलात्कार, हत्या व अन्य अपराधों पर बहस करने की जगह सरकारी तंत्र तीन तलाक को ज्यादा तूल देता नजर आता है लेकिन देश के प्रधानमंत्री इन तमाम ज्वलंत मुद्दों व समस्याओं का जिक्र अपनी मन की बात में नही करना चाहते क्योंकि सरकार की नजर में इन तमाम छोटी-मोटी समस्याओं को कोई मोल नहीं या फिर इन तमाम समस्याओं का राजनैतिक समाधान ढ़ूढ़ते हुऐ मोदी सरकार व भाजपा के नीति निर्धारक माने जाने वाले संघ ने अपने स्वंयसेवकों को जनता की तकलीफें दूर करने की सलाह दे दी है। हम देख रहे है कि गाय के मुद्दे पर उप्रदवियों की भीड़ किसी भी किसान या पशुओं के छोटे व्यापारी पर हमलावर हो सकती है या फिर ट्रेन और बस में अकेले-दुकेले सफर करने वाले किसी जाति विशेष के नौजवान को उसके धर्म, जाति या पहनावे को चर्चा का विषय बनाते हुऐ कभी भी मारा जा सकता है तथा जोश एंव राजनैतिक उद्देश्यों से की गयी इस हत्या को जायज ठहराने के लिऐ कश्मीर से कन्याकुमारी तक आंतकवादी वारदातों में मारी जाने वाली जनता व सुरक्षा बलों की हत्या का बदला कहकर राष्ट्रवादी मुलम्मा पहनाने की कोशिश की जा सकती हैं। वंदेमातरम् व भारत माता की जय के नारों के बीच लोकतंत्र की आवाज को दबा देने तथा अपनी सहूलियत व राजनैतिक लाभ को देखते हुऐ राष्ट्रवादिता के प्रमाणपत्र बांटने का एक नया दौर आया है लेकिन अफसोस इस तरह की कोई भी बात हमारे प्रधानमंत्री के मन को परेशान नही कर रही और न ही उनके पास इतना समय है कि वह इस तरह की तमाम छोटी-बड़ी समस्याओं की वजह जानने व उनसे रूबरू होने की कोशिश भी करें। मोदी सरकार व भाजपा की विचारधारा से जुड़े लोगों के लिऐ यह खुशी का अवसर हो सकता है कि बिहार की सत्ता में भागीदारी के बाद वह केन्द्र समेत उठारह राज्यों में अपनी सरकार चला रहे है तथा उनके अम्बानी, अदानी व बाबा रामदेव जैसे समर्थक आर्थिक उपलब्धियों को लेकर दिन-दूनी-रात चैगुनी तरक्की कर रहे है लेकिन इस सबके बीच वह आम आदमी कहाँ है जिसके खाते में विदेशों मे जमा काले धन में से पन्द्रह लाख रूपये आने वाले थे या फिर जिसे भय और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने का वादा करने के बाद आप केन्द्रीय सत्ता पर काबिज हुऐ थे। मोदी के ‘मन की बात‘ से यह तमाम विषय एकदम नादारद है और वह देश की जनता को यह बताने के लिऐ भी तैयार नही है कि केन्द्रीय सत्ता पर काबिज होने के साथ ही उन्होंने अपने सांसदों के माध्यम से जिन गांवों को गोद लेने घोषणा की थी, उनकी वर्तमान में क्या स्थिति है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि सिर्फ अपने मन की बात करने वाले हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री के पास जनता के मन की बात और समस्यायें सुनने के लिऐ शायद वक्त ही नही है लेकिन उन्हें अपनी राजनैतिक चतुरता एंव वाकपटुता पर पूरा भरोसा है और भाजपा के तमाम छोटे-बड़े नेता समेत निचले स्तर के कार्यकर्ता तक यह मानने लगे है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में पहली बार विपक्ष को पूरी तरह खत्म कर मोदी एक बार और केन्द्रीय सत्ता पर कब्जेदारी की ओर बढ़ रहे है।

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