जज्बातों की जंग में | Jokhim News

Monday, December 11, 2017

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जज्बातों की जंग में

द्वाराहाट विधायक के बयानों से मिली शराब विरोधी आन्दोलन को एक नई ऊर्जा
शराब के विरोध में क्रान्तिकारी आन्दोलन के आवहन के साथ विरोध का बिगुल फूँक रही उत्तराखंड की मातृ शक्ति के लिऐ यह हर्ष का विषय हो सकता है कि पूर्ण बहुमत के दम्भ के चलते जनपक्ष को अनदेखा कर रहे सरकारी तंत्र के भीतर से भी विरोधी आन्दोलन की सुगबुहाहट सुनाई देने लगी है और सत्तापक्ष के एक विधायक ने अपना वोट-बैंक बचाने के लिऐ या फिर जनभावनाओं से ओत-प्रोत होकर बड़े नेताओं की मिलीभगत से अपने क्षेत्र में दिये जा रहे एक बार के लाइसेंस के खिलाफ आत्मघात का ऐलान किया है। हांलाकि आरोंपो-प्रत्यारोंपो के दौर के बीच चले हाँ-नहीं के सरकारी सिलसिले को देखते हुये यह कहा जा सकता है कि सत्तापक्ष के इस विधायक को समझा बुझा कर सरकार के पक्ष में बयान देने के लिये मजबूर कर लिया जायेगा या फिर सत्ता के दम्भ में चूर पूर्ण बहुमत की सरकार अपने शेष विधायकों को डराने-धमकाने व सत्ता पक्ष की खिलाफत से रोकने के उद्देश्य से इस विद्रोही तेवर वाले विधायक को निलम्बन करने की हदों तक भी जा सकती है लेकिन इस एक घटनाक्रम के बाद यह तय हो गया है कि उत्तराखंड के कोने-कोने में बन रहे शराब बिक्री विरोधी माहौल व इस प्रकार के सरकार विरोधी कार्यक्रमों में स्थानीय स्तर पर बढ़ती जा रही महिलाओं की भागीदारी को देखते हुऐ जनप्रतिनिधियों के तेवर ढीले पड़ने लगे है और अगर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में शराब की बिक्री का विरोध कुछ लम्बा चला तो यह तय है कि या तो सरकार को इस मुद्दे पर झुकना होगा या फिर अकुलाहट व बंदिशें महसूस कर रहे कुछ जनप्रतिनिधि अपनी ही सरकार के खिलाफ बगावती तेवर अख्तियार करने को मजबूर हो जायेंगे। यह एक कटु सत्य है कि मोदी लहर में सवार होकर प्रदेश के विभिन्न लोकसभा व विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित हमारें माननीयों को चुनावों के दौरान उनकी उम्मीद से अधिक जन-समर्थन मिला है और इस तथ्य से भी इनकार नही किया जा सकता कि संघ की बंदिशो या अनुशासन से बंधे यह जनप्रतिनिधि अपने निर्वाचन क्षेत्रों में भी उस सोच व जज्बे के साथ काम नही कर पा रहे जिस जज्बे में लेकर वह कुछ ही समय पूर्व चुनाव मैदान में उतरे थे लेकिन अपने राजनैतिक भविष्य को देखते हुऐ मतदाताओं को अपने साथ जोड़कर रखने व जन समस्याओं या जनान्दोलनों को लेकर जनपक्षीय विचारधारा को सरकार के सम्मुख प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी को समझतें हुऐ इनका कुछ सरकारी फैसलों के खिलाफ मुखर होना जायज भी है और जरूरी भी वरना अगले किसी भी छोटे-बड़े चुनाव को लड़ने के लिऐ इन्हें हमेशा ही मोदी जैसे किसी नाम की जरूरत होगी। यह जरूरी नही है कि राजनीति की बिसात पर मोदी का जादू हर बार चल ही जाय और चुनाव लड़ने के लिऐ मैदान में उतरने वाले प्रत्याशियों से जनता यह सवाल न पूछे कि जिन मुद्दो को लेकर आपने व आपकी पार्टी ने पिछली बार सरकार का विरोध किया था, आज पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में होने के बावजूद उन्हीं तमाम विषयों को भारी बहुमत से सदन में पारित करने या फिर डण्डे के जोर पर लागू करने के बाद आप यह उम्मीद भी कैसे करते है कि चुनावी मोर्चे पर जनमत आपके साथ होगा। इन स्थितियों में उन नेताओं का भविष्य क्या होगा जो अपने ठीक-ठाक कैरियर को दांव पर लगाकर भाजपाई राजनीति के मैदान में कूदे है, यह सवाल उत्तराखंड में ही नही बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में मोदी लहर पर सवार होकर सत्ता के शीर्ष तक पहुँचे नेताओं को परेशान किये हुऐ है और उन्हें दूर-दूर तक इसका हल नही दिखाई दे रहा। संघ की विचारधारा से सम्बद्ध भाजपा के तमाम नेता व कार्यकर्ता तो यह मानते है कि विपरीत से विपरीत परिस्थिति में संगठन उनके प्रति मददगार रहेगा और आँख मूँद कर अपने अग्रणी नेताओं व संघ के सलाह पर भाजपा संगठन व सरकार के शीर्ष पदो पर बैठाये गये तमाम दायित्वधारियों व मंत्रियों के मुखारबिंद से निकले शब्दों का अक्षरतः पालन करने पर उन्हें भी आगे बढ़ने का मौका मिलेगा लेकिन सिर्फ चुनावी जीत के लक्ष्य को हासिल करने के लिऐ बिना किसी नीति व सिद्धान्त के भाजपा में शामिल किये गये अन्य दलों के नामचीन चेंहरों को अब यह लगने लगा है कि सरकार के काम करने के तरीके व उसके द्वारा लिये जा रहे फैसलों के चलते वह अपना व्यक्तिगत् जनाधार खोते जा रहे है और यह उनके राजनैतिक भविष्य के लिऐ नुकसानदायक हो सकता है। भाजपा में संगठनात्मक स्तर पर लिये जाने वाले फैसलों के अलावा भाजपा शासित प्रदेशों व केन्द्र सरकार में भी सरकारी कामकाज के मामले में संघ का ठीक-ठाक दखल रहता है और माना जाता है कि सत्ता के शीर्ष पदो को हासिल करने के लिऐ अन्य तमाम योग्यताओं के अलावा पूर्व में संघ का स्वंयसेवक होना अपने आप में एक विशेष योग्यता है। हालातों के मद्देनजर जो नेता या मंत्री संघ की विचारधारा से जुड़ा नही है उसे कालान्तर में ही यह महसूस होने लगता है कि भाजपा की राजनीति में बने रहने के लिऐ अपना निजी जनाधार होना ही उसकी एक मात्र योग्यता हैं । इन हालातों में अगर द्वाराहाट के विधायक महेश नेगी संगठन की विचारधारा से हटकर ‘एक ऐसे बार को लाइसेंस दिये जाने का विरोध करते है जिसके विरोध में स्वंय उनके नेतृत्व में आन्दोलन किया गया था‘ तो इसे गलत कैसे कहा जा सकता है और रहा सवाल पार्टी फोरम में अपनी बात रखने का तो इस विषय में हम सिर्फ इतना ही कह सकते है कि अगर दलाली का खेल पार्टी फोरम के शीर्ष पदो पर काबिज लोगों द्वारा ही खेला जा रहा हो तो एक बेचारे विधायक के पास आत्महत्या के अलावा और क्या विकल्प बचता है। हम देख रहे है कि भाजपा केन्द्र के अलावा भी जिन राज्यों की सत्ता पर काबिज है उन तमाम राज्यों व खुद केन्द्र सरकार में भी सरकारी फैसलों में पूर्ववर्ती सरकारों विशेषकर कांग्रेस के उन तमाम फैसलों की झलक साफ दिखाई देती है जिनका कि भाजपाई विपक्ष मे रहकर हमेशा विरोध करते रहे है और एक आत्मिक दंभ के दौर से गुजर रही इन तमाम राज्यों व केन्द्र की भाजपा सरकार अपना कोई भी फैसला लेने से पहले जनपक्ष को संतुष्ट करने और विपक्ष से ताल-मेल स्थापित करते हुये अपने फैसले लागू करने के कार्यक्रम में थोड़ा-बहुत तब्दीली करने पर विश्वास नही रखती लेकिन इस सबके बावजूद भाजपा का राजनैतिक परचम तेजी से लहरा रहा है और चुनाव दर चुनाव उसकी लोकप्रियता बढ़ती दिख रही है। परिस्थितियों के मद्देनजर किन्हीं भी कारणों से भाजपा में शामिल हो चुके अन्य दलों की विचारधाराओं से जुड़े नेताओं को अक्सर यह खतरा महसूस हो रहा है कि जैसे-जैसे भाजपा मजबूत होती जायेगी वैसे-वैसे भाजपा का नीति निर्धारक संघ तमाम राजनैतिक, संवेधानिक पदो पर अपनी विचारधारा से जुड़े लोगों को बैठाने की कोशिशें तेज कर देगा। जिसका सीधा प्रभाव चुनावी मौके पर बाहर से भाजपा में शामिल हुऐ नेताओं पर पड़ना अति आवश्यक है। लिहाजा तमाम महत्वाकांक्षी नेताओं का इन परिस्थितियों के लिऐ खुद को तैयार करने तथा अपने निजी समर्थकों व स्थानीय वोट-बैंक को अपने साथ जोड़े रखने के लिऐ जरूरी है कि वह पार्टी लाइन से हटकर जनता के पक्ष में खड़े दिखाई दे।

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