विरोध में उठते सुरो को साधने की साजिश | Jokhim News

Monday, December 11, 2017

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विरोध में उठते सुरो को साधने की साजिश

लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ के रूप में समाचार जगत को मजबूती देने वाले तमाम छोटे व मझोले समाचार पत्र-पत्रिकाओं पर लटक चुकी है बंदी की तलवार।
सरकार अपना दांव खेल चुकी है और सरकारी तंत्र को अपने इशारे पर नचाने का दावा करने वाला मीडिया अब पूरी तरह सरकारी रहमोकरम पर है। हांलाकि मीडिया घरानों व समाचार पत्रों के प्रकाशन पर सरकार द्वारा कोई रोक नही लगायी गयी है और न ही सरकार ऐसा कोई कानून लाने जा रही है जिसके चलते समाचारों के प्रकाशन से पूर्व तमाम सरकारी महकमों से अनुमति लिया जाना आवश्यक हो लेकिन इस सबके बावजूद न सिर्फ छोटे व मझोले समाचार पत्रों के मालिकाॅन यह मान चुके है कि उनके बैनरों पर खतरे की तलवार लटकायी जा चुकी है बल्कि बड़े बैनरो के तहत काम करने वाले तमाम बुद्धिजीवी, लेखक व खोजी पत्रकार भी यह समझ रहे है कि अब सच को जनता के सामने रखने की लड़ाई लड़ना इतना आसान नही होगा। हमने देखा कि फटाफट पत्रकारिता वाले इस दौर में समाचारों व समाचार संकलनकर्ताओं का स्तर किस तेजी से गिरा है और राजनैतिक दलों द्वारा उच्च स्तर पर की जाने वाली खरीद फरोख्त के चलते लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ माना जाने वाला पत्रकारिता का पेशा सरकार की दलाली व ब्लेकमेंलिग में तब्दील होकर रह गया है लेकिन इतना सबकुछ होने के बावजूद जनतांत्रिक व्यवस्थाओं पर विश्वास करने वाले जनवादी चिन्तक यह मानते रहे है कि सामाजिक समस्याओं व आम आदमी के हितों से जुड़े मुद्दे को सरकार तक पहुँचाने के लिऐ मीडिया एक संदेश वाहक की भांति काम करता है तथा लोकहित से जुड़े मुद्दों पर उसकी भूमिका हमेशा से जनपाक्षीय ही रही है। हालातों के मद्देनजर हम यह कह सकते है कि लाख कमियों और कमजोरियों के बावजूद देश की जनता का एक बड़ा हिस्सा आज भी सामाजिक आन्दोलनों या जन मुद्दों की आवाज सरकार के कानों तक पहुँचाने के लिऐ खबरनवीसों पर एतबार करता है और तेजी से बदल रही पत्रकारिता के इस दौर में जनता का भरोसा पूँजीपति वर्ग द्वारा चलाये जाने वाले टीवी चैनलों या बड़े औद्योगिक घरानों द्वारा छापे जा रहे समाचार पत्रों के स्थान पर स्थानीय स्तर पर प्रकाशित होने वाले छोटे व मझोले समाचार पत्रों पर बढ़ा है। इस तथ्य से भी इनकार नही किया जा सकता कि तमाम छोटे-बड़े जनान्दोलनों का दर्द सरकार तक पहुँचाने के अलावा सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार को बेनकाब करने व चुनावी समीकरणों को पलटते हुऐ जनमत को किसी पक्ष विशेष के समर्थन में प्रभावित करने में भी इन छोटे व मझोले समाचार पत्रों की भूमिका अहम् रहती है लेकिन इस सबके बावजूद विज्ञापन बाजार पर इनकी हिस्सेदारी नाम मात्र की ही मानी जाती है और सरकार इन समाचार पत्रों के मालिकों व पत्रकारों के जनपक्षीय स्वरूप से अवगत् होने के कारण इन्हें ज्यादा तवज्जो नही देती जबकि सीमित संसाधनों के आधार पर प्रकाशित तमाम लघु व मझोले समाचार पत्र बड़े व्यवसायिक घरानो से व्यवसायिक दरों पर मिलने वाले विज्ञापनों से भी महरूम रहते है। इस सबके बावजूद इन समाचार पत्रों के स्वामी, सम्पादक (जो अधिकांशतः जमीन से जुड़े पत्रकार भी होते है) अपने खर्चो में कटौती करते हुये प्रकाशन को जिन्दा रखने के लिऐं दिन-रात मेहनत ही नही करते बल्कि अपने उद्देश्यों की पूर्ति व सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहने के लिऐ येन-केन-प्रकारेण अखबारी कागज आदि की व्यवस्था कर जनता तक अपनी भावनाओं व सरकार की खामियों को पहुँचाने का प्रयास करते है। हांलाकि इन तमाम छाटे व मझोले समाचार पत्रों अथवा पत्र-पत्रिकाओं के काम करने का तरीका किसी भी सरकार को पसंद नही है और न ही कोई सत्ताधारी दल यह चाहता है कि खुद को लोकतंत्र का सजग प्रहरी मानने वाले यह कलम के सिपाही अपनी जिम्मेदारी को पूरा करते हुऐ जवाबदेही पर खरे उतरें लेकिन इस सबके बावजूद वर्तमान तक केन्द्र व विभिन्न राज्यों में गठित होती रही विभिन्न राजनैतिक दलों की सरकारों ने ऐसा कोई कदम नही उठाया जो कि इन समाचार पत्रों या पत्रिकाओं को सामूहिक बंदी के दौर से गुजरना पडें। सत्ता की राजनीति करने वाले राजनेता व राजनैतिक दल यह जानते है कि सरकार में रहते हुऐ जिन समाचार पत्रों द्वारा उठाये जाने वाले मुद्दे या फिर सत्ता पर छोड़े जाने वाले व्यंग वाण उनकी परेशानी का सबब बनते है विपक्ष में रहते हुऐ इन्हीं समाचारों से उन्हें संजीवनी मिलती है। शायद यहीं वजह है कि सत्ता पर काबिज होने के बाद किसी भी राजनैतिक दल या राजनेता ने नियम-कानूनों की आड़ लेकर समाचार पत्रों पर हमलावर होने या इन्हें बंद कराने का प्रयास वर्तमान तक नही किया लेकिन इधर पिछले तीन वर्षों में केन्द्र के साथ ही विभिन्न राज्यों की सत्ता पर काबिज हुई भाजपा ने क्षेत्रीय समाचार पत्रों व इनसे जुड़े पत्रकारों को हमेशा अपना दुश्मन माना है और अपनी फाँसीवादी नीतियों व कट्टरतावादी ऐजेण्डे को आगे बढ़ाने के लिऐ उसे छोटे या मझोले समाचार पत्रो की ताकत से कहीं ज्यादा उस नेटवर्क पर विश्वास है जिसके इस्तेमाल से वह एक ही झटके में सारे देश के मन्दिरों में गणेश जी के दूध पीने की आफवाह को फैला सके। लिहाजा भाजपा के सत्ता में आने के बाद सरकारी स्तर पर मीडिया पर लगाम लगाने की जो कार्यवाही शुरू हुई उसके तहत सबके पहले तमाम छोटे-बड़े टीवी चैनलों को विज्ञापन का लालच देकर या फिर कुछ बड़े पूंजीपति घरानों के साथ मिलीभगत कर अपने पक्ष में करने की कोशिश की गयी और जो इस झांसे में नहीं आया उसपर कानून का डण्डा भी खूब चला। ठीक यहीं मंत्र कुछ बड़े समाचार पत्रों पर भी आजमाया गया और बड़े समाचार पत्र के मालिकों को अपने पक्ष में खड़ा करने के लिऐ सरकारी तंत्र ने मजीठिया आयोग का भी बखूबी इस्तेमाल किया लेकिन देश के लगभग हर कोने से निकलने वाले सीमित प्रकाशन संख्या वाले समाचार पत्रों व पत्रिकाओं पर इस तरह की कोई पांबदी लगाना सरकार के बस में नहीं था और न ही सरकार को यह भरोसा था कि विज्ञापनों की बरसात के जरियें इन तमाम छोटे व मझोले समाचार पत्रों की शीशे में उतारा जा सकता है क्योंकि एक तो इनकी संख्या बहुत ज्यादा थी दूसरा इन तमाम छोटे व मझोले अखबारो के मालिक, प्रकाशक व सम्पादक मंडल में अधिकाशतः ऐसे व्यक्तित्व जुड़े हुऐ थे जो अपनी खबर को ठीक ढंग से प्रकाशित न करने अथवा तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किये जाने व बड़े समाचार पत्रों के पूंजीवादी रवैय्ये से हैरान व परेशान होकर अपनी पत्रकारिता को बचाये रखने और जन सामान्य की आवाज सरकारी तंत्र तक पहुँचाने के लक्ष्य के साथ इस पेशे में उतरे थे। लिहाजा सरकार ने इन तमाम छोटे व मझोले समाचार पत्रों पर सरकार डण्डे की जोर आजमाइश करते हुऐ सबसे पहले डीएवीपी के नियमों में बदलाव करने के नाम पर इनको दिये जाने वाले विज्ञापन बंद करने की कोशिशें शुरू की जिसका तमाम मंचो पर विरोध तो हुआ लेकिन समाचार पत्रों-पत्रिकाओं के प्रकाशन पर इसका कोई विशेष फर्क नही पड़ा और पत्रों के प्रकाशकों व स्वामियों ने अपने निजी प्रयासों के बल पर अपना प्रकाशन जारी रखा। इसके बाद सरकार ने बड़ी ही चालाकी के साथ समाचार पत्रों के प्रकाशन को जीएसटी के दायरे लाकर एक साथ कई लाख लोगों को बेरोजगार करते हुऐ तमाम छोटे व मझोले समाचार पत्रों को बंद करवाने की पट-कथा लिख दी है। किसी जमाने में प्रकाशनों व समाचार पत्र के स्वामियों को रियायती दर पर दिया जाने वाला अखबारी कागज अब जीएसटी के साथ मंहगी दर पर खरीदने को मजबूर इन समाचार पत्रों के स्वामी समाचार पत्रों को मिलने वाले विज्ञापन पर भी टैक्स देने के दायरें में रखे गये है, और बाजार के हालात इतने खराब है कि समाचार पत्रों-पत्रिकाओं का मूल्य बढ़ाने अथवा गुणवत्ता में कमी लाने की बात तो सोची ही नही जा सकती। नतीजतन यह तय है कि सरकार की मर्जी के मुताबिक अधिकांश छोटे व मझोले दर्जे के समाचार पत्र या तो अपना प्रकाशन बंद कर देंगे या फिर उन्हें अपनी प्रकाशन संख्या में भारी कमी करते हुऐ इस जद्दोजहद में बने रहने का प्रयास करना होगा। अगर जनवादी विचारधारा के दृष्टिकोण से सोचे तो यह दोनों ही स्थितियाँ जनता के लिऐ ठीक नही है लेकिन फाँसीवादी विचारधारा से ओत-प्रोत सरकारी तंत्र किसी भी कीमत पर अपने विरोध में उठते सुरो को बंद करना चाहता है और कोई बड़ी बात नही है अगर आगामी दो-एक वर्षों में तमाम छोटे व मझोले समाचार पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशक, स्वामी व सम्पादक जेल के सीकंचो के पीछे दिखाई दे।

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