बोल मंजूरा हल्ला बोल | Jokhim News

Monday, December 11, 2017

Select your Top Menu from wp menus

बोल मंजूरा हल्ला बोल

    पहाड़ो में लगातार बढ़ रही किसानों की आत्महत्या सम्बन्धी वारदातों को दृष्टिगत रखते हुऐ जनवादी विचारकों को तय करनी चाहिऐं एक बड़े आन्दोलन की रूपरेखा।

उत्तराखंड में किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या का सिलसिला रूकने का नाम नही ले रहा और सरकारी तंत्र इन आत्महत्याओं को नकारने व ऋण के बोझ से दबे किसानों द्वारा कि जाने वाली आत्महत्या मानने से इनकार करने के बाद अब किसानांे को उनकी औकात या हैसियत के हिसाब से कर्ज देने की बात करने लगी है। कर्ज के बोझ से कराहता किसान और खेती की लगातार बढ़ती जा रही लागत को देखते हुऐ खेती-किसानी छोड़ शहरों की ओर रूख कर मजदूरी के जरिये पेट पालते किसानों के परिवार इस देश के लिऐ कोई नयी बात नहीं है और न ही यह पहली बार है जब लगातार किसानों द्वारा आत्महत्या किये जाने की खबरें देश के लगभग हर कोने से आ रहीं है लेकिन यह आश्चर्यजनक सत्य है कि सरकारी तंत्र इस बार किसानों की समस्याओं पर पहले की तरह संजीदा नहीं है और न ही सरकार धरना-प्रदर्शन अथवा आन्दोलन कर रहे किसानों से किसी भी तरह की वार्ता करने की जल्दबाजी में दिखाई देती है कितना आश्चर्यजनक है कि किसान सड़कों पर उतरकर अपना दर्द बंया कर रहे है और सरकार समर्थक लोग इसे जीन्स, टी-शर्ट वाले लड़कों का प्रायोजित आन्दोलन बता रहे है और जब किसान नंगे बदन देश की राजधानी दिल्ली में प्रदर्शन करते है तो इसे फरार्टेदार अंग्रेजी बोलने वाले वामपंथियों का आन्दोलन कहकर जनता को गुमराह करने का प्रयास किया जाता है लेकिन कोई भी नेता या सरकार समर्थक यह बताने को तैयार नही है कि बाजार में एकाएक ही बढ़ने व कम होने वाली टमाटर, प्याज समेत तमाम तरह की तरकारियों अथवा अन्य खाद्य सामग्रियों की कीमत व किसान को मिलने वाली इन उत्पादों की कीमत के बीच का मुनाफा कहाँ जा रहा है। एक ही झटके में नोटबंदी कर इसे राष्ट्रहित में उठाया कदम बताने वाली भाजपा की नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार वर्तमान तक जनता को यह सूचना नही दे पायी है कि उसके इस फैसले के बाद बैंक में जमा हुऐ पुराने नोटो की कुल कीमत क्या थी या फिर नोटबंदी के फैसले सेे जनसामान्य को क्या-क्या फायदें हुऐं और अगर इस पूरे परिदृश्य को भारत के ग्रामीण परिवेश की नजर से देखें तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि वर्तमान में देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहा किसानों की आत्महत्या का यह सिलसिला सरकार द्वारा लागू की गयी नोटबंदी का ही दूरगामी असर है। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती के चलते बाजार में आने वाले तमाम उतार-चढ़ाव व मंदी को भंली-भांति झेल रही भारत की अर्थव्यवस्था को देश की वर्तमान सरकार ने ग्रामीणों, किसानों व घरेलू महिलाओं की कुल जमा पूँजी पर हमला कर बुरी तरह हिलाकर रख दिया है और नोटबंदी के नाम पर पूरी चालाकी के साथ इस गरीब व बेसहारा वर्ग की तमाम तरह की बचतों को बैंक में पहुँचाने के बाद सरकार न सिर्फ इस पूंजी पर कर वसूलने के कई रास्ते तलाश रही है बल्कि नोटबंदी के चलते लगभग बंदी की कगार पर पहुँच चुके तमाम छोटे उद्योगों व घरेलू काम-धंधांे के बंद हो जाने के चलते किसान, मजदूर व घरेलू महिलाऐं खुद को लुटा-पिटा महसूस कर रहे है लेकिन यकीन जानिऐं यह सब अभी शुरूवात है और नोटबंदी के ठीक आठ महिने बाद लागू की गयी जीएसटी का असर भी बाजार पर नजर आने दीजिये तो फिर हममे से भी कई लोग यह कहने लगेंगे कि उनके पास आत्महत्या अथवा सरकार के खिलाफ बगावत के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। वर्तमान में देश एक ऐसी अराजकता की ओर जा रहा है जिसमें सरकारी तंत्र अपनी खामियाँ छुपाने के लिऐ जनता की समस्याओं का निराकरण करने की जगह उसे ऐसी समस्याओं के मकड़जाल में उलझाने की कोशिश करता है जिनका समाधान न हो। अगर वर्तमान व्यवस्था पर गौर करें तो हम पाते है कि गाय, गंगा और अन्य तमाम तरह के सम्प्रदायिक मुद्दों पर जोर देकर वर्तमान सरकार जनसामान्य का ध्यान उन मूल समस्याओं से हटाने की कोशिश कर रही है और किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या को कुछ इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है कि मानो इस आत्महत्या या फिर किसान आन्दोलन के मूल में किसानों द्वारा वक्त-बेवक्त लिये गये ऋण को निर्धारित समयान्तराल में चुका पाना मूल वजह न हो बल्कि उसको लगी नशे की लत या अन्य किसी किस्म की फिजूलखर्ची के चलते हालात इतने गंभीर हो गये है कि उसे अब आत्महत्या पर मजबूर होना पड़ा है जबकि हकीकत यह है कि सरकार द्वारा आठ माह पूर्व की गयी नोटबंदी ने अब आठ माह बाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तबाह करना शुरू किया है और अगर सरकारी तंत्र द्वारा समय रहते व्यवस्था को दुरूस्त करने की कोशिश नही की गयी तो यह तय है कि हालात अभी और ज्यादा खराब हो सकते है। अगर उत्तराखंड की वस्तु स्थिति पर गौर करें तो हम पाते है कि पहाड़ में खेती-किसानी की सीमित संभावनाआंे के बावजूद यहाँ का किसान सम्पन्न माना जाता रहा है क्योंकि पहाड़ के दैनिक जीवन में भोग विलास की संभावना न्यूनतम् होने के कारण उसके खर्च सीमित है। साथ ही साथ पलायन के कारण देश-विदेश तक पहुँच चुके पहाड़ी समुदाय के पास अपनी खेती को आलम्बन देने के लिऐ नौकरी व पेंशन का सहारा हमेशा से रहा है लेकिन इधर पिछले तीन सालों में निजी एवं सरकारी क्षेत्र मे घटती रोजगार की संभावना ने पहाड़ के युवा वर्ग को तो निराश किया ही है साथ ही साथ नोटबंदी के बाद तेजी से बेरोजगार होते जा रहे युवा पहाड़ में रहकर किसी भी तरह अपनी गुजर-बसर करने वाले गरीब किसानों व ग्रामीणों की आशाओं पर तुषारपात की तरह है और इस समस्या का सबसे आसान समाधान आत्महत्या या नक्सलवाद ही है। पहाड़ में किसानों की आत्महत्या का दौर शुरू हो गया है तथा समाज में शराब के बढ़ते प्रचलन से परेशान व निराश महिलाऐं लंबे समय से आन्दोलनरत् है लेकिन सरकार इन तमाम गंभीर समस्याओं को मजाक में ले रही है। आत्महत्याओं का मजाक उड़ाया जा रहा है जबकि आन्दोलनों को कांग्रेस द्वारा प्रायोजित बता कर इनकी अनदेखी की जा रही है लेकिन इस सबके समानान्तर प्रदेश के तराई वाले हिस्सों में पूववर्ती सरकारों की शह पर लगाये गये तमाम छोटे-बड़े उद्योगों तेजी के साथ मजदूर आन्दोलन भी पनप रहा है । यह तय है कि जीएसटी के परिणाम इन तमाम सिसक कर दम तोड़ने का तैयार उद्योगों में तालाबंदी के रूप में ही सामने आने है लेकिन अगर इन कल-कारखानों से वक्त-बेवक्त निकाला गया श्रमिक वर्ग, शराब की बिक्री के विरोध में आन्दोलन कर रही महिलाऐं तथा कर्ज के चलते आत्महत्या को मजबूर किसान, किन्हीं कारणों से एक बेनर के नीचे आने को मजबूर होते है तो यकीन जानियें कि आने वाला वक्त मौजूदा सरकार के लिऐ कई तरह की समस्याओं को जन्म देने वाला हो सकता है और चीन की सीमाओं से लगते उत्तराखंड में नेपाल के रास्ते घात लगाकर माहौल खराब करने की ताक में बैठे तथाकथित माओवादी इस प्रकार की तमाम समस्याओं से जूझते उत्तराखंड की जनता के आन्दोलनधर्मी विचारों का फायदा उठाने की कोशिश कर सकते है।

About The Author

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *