बारिशों के बाद-हाल-बेहाल हुआ आम आदमी का जीवन | Jokhim News

Thursday, September 21, 2017

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बारिशों के बाद-हाल-बेहाल हुआ आम आदमी का जीवन

आपदा प्रबन्धन, सर्तकता और व्यापक जनहित के दावे करने वाली उत्तराखंड सरकार धरातल पर किस तरह काम कर रही है इसका अंदाजा मानसून के शुरूवाती दौर में लगभग दो दिन तक जमकर हुई बरसात के बाद लगाया जा सकता है। हांलाकि नयी सरकार यह दावा कर सकती है कि उसे व्यवस्थाओं को समझने व ढ़र्रे पर लाने के लिऐ कुछ वक्त चाहिए लेकिन अगर बरसात के चलते रूक से गये उत्तराखंड के जनजीवन तथा आम आदमी के नजरियें से बात करें तो जनता, सरकार के इस तर्क से संतुष्ट नही हो सकती क्योंकि सत्रह वर्ष पूर्व अस्तित्व में आये उत्तराखंड राज्य के लिऐ सड़कों में पानी के भराव, मलवा आने या फिर बादल फटने जैसे घटनाक्रम भले ही नये नहीं हो किन्तु सड़कों में सीवर लाईन डालने और अन्य निर्माण कार्याें के नाम पर ठीक बरसात से पहले सड़कों को तहस-नहस कर देने या फिर नालियों व बाजार के कूडे से ठसाठस रहने जैसे तमाम घटनाक्रम ऐसे है जिनका समय रहते व आसानी से इंतजाम किया जा सकता था। वैसे भी भाजपा आज पहली बार प्रदेश की सत्ता पर काबिज नही हुई है और न ही उसके बेनर तले चुनाव लड़कर सदन तक पहुँचे जनप्रतिनिधि नौसिखियें नेता है जिन्हें इस तरह की तमाम समस्याओं व इनके स्थायी समाधान का तरीका पता न हो लेकिन इस सबके बावजूद भारी कोताही हुई और चुनावी मंच से बड़े-बड़े वादे करने के बाद जनता को उसके हाल पर छोड़ दिया गया। कितना आश्चर्यजनक है कि प्रदेश के शिक्षा मंत्री सरकारी क्षेत्र के विद्यालयों में अध्ययनरत् छात्रों को मौसम की मार व जर्जर भवनों के खतरें से बचाने से कहीं ज्यादा जरूरी विद्यालय के शिक्षकों के लिऐ ड्रेस कोड लागू करना मान रहे है और प्रदेश के मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री को पछाड़ने के लिऐ आम पार्टी में व्यस्त है लेकिन इतनी चिन्ता किसी को नही है कि वह बरसात शुरू होने से पहले शहरी व कस्बाई इलाकों की टूटी सड़कों या फिर आधी खुली सीवर लाईन का जायजा लेकर इन्हें अस्थायी तौर पर ही सही, पाटने का काम शुरू कराये। आपदा उत्तराखंड का दुर्भाग्य है और किसानों के चेहरों पर चमक लाने वाली बारिश इस प्रदेश के हर आमोंखास को द्रवित कर देती है क्योंकि वह जानता है कि इस बरसात के चलते उसे या तो अपने तमाम कामकाज स्थगित करने होंगे या फिर अपनी जान हथेली में रखकर रोजमर्रा का सफर तय करना होगा। यात्रा के अलावा खेती-किसानी की दृष्टि से भी यह बरसात का मौसम ज्यादा फायदेमंद नही रह गया है क्योंकि आये दिन हो रही बादल फटने की घटनाओं के चलते होने वाला भूमि का कटाव न सिर्फ खेती की जमीन का बर्बाद कर रहा है बल्कि पहले से ही पलायन का दंश झेल रहे पहाड़ों में भूमिहीन व आपदाग्रस्त ग्रामीणों की संख्या बढ़ने लगी है। अनियन्त्रित तरीके से होता खनन तथा नदी-नालों के किनारों पर भू-माफिया एवं स्थानीय नेताओं की मिलीभगत से बढ़ रहे कब्जे बहते पानी को अपना रूख बदलने पर मजबूर कर रहे है और नेताओं व सरकारी हुक्मराॅनों की साजिशों का शिकार बनकर अपना सबकुछ दाँव पर लगा चुके नासमझ व भोले-भाले कब्जाधारक खुद को हर ओर से लुटा पिटा महसूस कर रहे है। अगर पहाड़ों की ओर रूख करें तो हम पाते है कि केदारनाथ में आयी आपदा के वक्त हुई भारी तबाही के निशान अभी मिटे नही है और न ही सरकारी तंत्र ने यह कोशिश ही की है कि वह नयी सड़कों के निर्माण व पुरानी सड़कों की मरम्मत के वक्त किसी ऐसी तकनीक का इंतजाम करें कि नवनिर्मित सड़कों का इस्तेमाल दो-चार बरसात झेलने तक तो किया ही जा सके। यह ठीक है कि सरकार ने सत्ता पर काबिज होते ही प्रदेश की जनता को आॅल वेदर रोड, चारधाम यात्रा मार्गो समेत तमाम पर्वतीय क्षेत्रों में रेल व राजधानी देहरादून मे मेट्रो रेल चलाने के साथ ही साथ इसे स्मार्ट सिटी बनाने जैसे कई दावे किये है लेकिन इन शुरूवाती दिनों में सरकार यह भी तय नही कर पायी है कि वह इन निर्माण कार्यो के दौरान उत्पन्न होने वाले मलवे को कैसे खपायेगी। हमने देखा है कि निर्माण कार्यों में लगी बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ अपनी निर्माण लागत को बचाने के लिऐ इस दौरान सामने आये मलवे को नदी या नालों में बहाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है और अपना झंझट कम करने के लिऐ अक्सर आजमाया जाने वाला यह नुक्सा स्थानीय निवासियों के लिऐ बड़ा सरदर्द बनता है लेकिन सरकार बड़ी-बड़ी घोषणाओं व दावों के बावजूद इस दिशा में सोचने का भी प्रयास नही कर रही है। ठीक इसी प्रकार प्रदेश के तमाम पहाड़ी व मैदानी इलाकों में मानव जनित कूड़ा सरकारी व्यवस्थाओं को तहस-नहस करने में अहम् भूमिका निभा रहा है और हमें यह कहने में कोई हर्ज नही दिखता है कि हर वर्ष लाखों करोड़ के बजट की बंदरबाँट करने वाले नगर निगम व नगर पालिकाऐं इस कूड़े को लेकर चिन्तनशील नही है। स्थानीय निवासियों से कहीं ज्यादा तादाद में तीर्थयात्रियों व पर्यटकों द्वारा प्रयुक्त किये जा रहे पाॅलीथीन व प्लास्टिक की खाली बोतले जब बरसात के पानी के साथ मिलकर पूरे वेग से धरती के किसी कोने पर टकराती है तो यकींन जानियें कि उस इलाकें की नाली या सीवर आदि के चैम्बरांे को चोक होने से रोकना आसान नही होता लेकिन हम सबकुछ जानते बूझते हुऐ भी अपने मेहमानों को इस तरह की गन्दगी फैलाने से नही रोकते क्योंकि इससे हमारा व्यवसाय प्रभावित होने का खतरा है।

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