शादी के नाम पर – पहाड़ में जोर-शोर से चल रहा है हयूमन ट्रेफिकिंग का कारोबार। | Jokhim News

Monday, December 11, 2017

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शादी के नाम पर – पहाड़ में जोर-शोर से चल रहा है हयूमन ट्रेफिकिंग का कारोबार।

पलायन से जूझ रहे पहाड़ों में समस्यायें वैसी ही पहले से कम नही है लेकिन इस सबके बावजूद यहाँ की महिलाओं को हमेशा ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता रहा है और सामाजिक क्षेत्रों या आन्दोलनों में महिलाओं की भागीदारी के साथ ही साथ घर-बाहर की जिम्मेदारियों को लेकर उनके अहसास व समर्पण को देखते हुऐ विभिन्न जनान्दोलनों के दौरान इस वर्ग को विशेष सम्मान का पात्र माना जाता रहा है लेकिन इधर पिछले कुछ समय से लगातार पहाड़ की बहन-बेटियों को लेकर ‘हयूमन ट्रेफिकिंग‘ की खबर आ रही है और यह माना जा रहा है कि पहाड़ वासियों में देश के विभिन्न मैदानी इलाकों में जाकर कुछ करने की ललक को देखते हुऐ कुछ चालाक किस्म के धंधेबाज लोग पहाड़ी क्षेत्र की लड़कियों को शादी के नाम पर बहला-फुसला कर अपने साथ ले जा रहे है। मैदानी इलाके में जाकर खुशहाली के साथ अपना परिवार बसाकर रहने की ललक में कम समझदार ग्रामीण बिना किसी विशेष जानकारी के कुछ जानकारों के माध्यम से अपने रिश्ते लेकर आ रहे नौजवानों व अधेड़ों के साथ अपने परिवार की बेटियों को विदा कर रहे है और कुछ मामले में शादी की रस्म अदा करने के लिऐ लड़कियों के परिवारों के द्वारा पैसे लेने या फिर बिना घर वालों की जानकारी में आये ही घर से भाग जाने कि किस्से भी सामने आ रहे है लेकिन अधिकांश मामलों में यह देखा गया है कि एक बार विवाह के नाम पर पहाड़ से गयी बेटी दोबारा कभी अपने मायके की ओर रूख करती नही दिख रही है। इन हालातों में यह शक होना स्वाभाविक है कि या तो विवाह के नाम पर ठगी गयी इन बहन-बेटियों की स्थिति अपनी तथाकथित ससुराल में बंधुआ मजदूर की तरह है या फिर इन्हें विवाह के नाम से पहाड़ से ले जाकर एक स्थान से दूसरे स्थान में बेचा जा रहा है। यह दोनों ही स्थितियाँ चिन्ताजनक है और अगर गंभीरता से गौर किया जाय तो यह मुद्दा किसानों की आत्महत्या या फिर भूख के चलते हुई मौत से कहीं ज्यादा संवेदनशील है लेकिन हमारी सरकार अथवा विपक्ष का ध्यान अभी तक इस ओर नही गया है और हमारे पास ऐसे कोई आंकड़े भी उपलब्ध नही है जिनके आधार पर यह कहा जा सके कि उत्तराखंड राज्य के अस्तित्व में आने के बाद हमारे राज्य के पहाड़ी जिलों से कितनी महिलाओं को विवाह के नाम पर अनजान हाथों में सौंप दिया गया है। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि उत्तराखंड राज्य गठन के बाद प्रदेश के कस्बाई व शहरी इलाकों में मैदानी क्षेत्रों के लोगों का तेजी से आगमन हुआ है और काम धंधों की तलाश में पहाड़ी जनपदों की ओर तेजी से रूख कर रहे इन मजदूरों या अकुशल कारीगरों के अपने शहर, कस्बे या इलाके में आकर बसने अथवा काम धंधा करने का हमारे पास कोई हिसाब-किताब भी नही है। हद तो यह है कि अपनी आमद के बाद काम-धंधे का जुगाड़ करते ही यह लोग अपने तमाम भाई बन्दों को अपने इर्द-गिर्द बसाना शुरू कर देते है और कुछ ही अंतराल में स्थानीय नागरिकों से मेल-जोल बढ़ाकर अपने महजब के हिसाब से इबादत घरों का निर्माण करना इनका पहला लक्ष्य होता है लेकिन स्थानीय स्तर पर कोई भी शख्स या सरकारी ऐजेन्सी इनसे यह नही पूछती कि खुद को दिहाड़ी मजदूर व रोज कमाकर खाने वाला हुनरबंद बताने वाले यह लोग एकाएक ही इतना धन कहाँ से ला रहे है कि पूरी चकाचैंध के साथ इनकी इबादत का इंतजाम हो सके। बात अगर यहीं तक रहती तो भी गनीमत थी और वर्तमान तक पहाड़ी जनसमुदाय इनकी आमद को शायद यह सोचकर बर्दाश्त भी करता आया कि जैसे हमारे लोग काम-धंधों की तलाश में देश-विदेश की ओर रूख कर रहे है वैसे ही कुछ अल्पशिक्षित किन्तु हुनरमंद लोग अपनी बढ़ती जनसंख्या के हिसाब से अपने लिये नये आशियाने तलाशते हुऐ पहाड़ी की शांत वादियों में बसना चाहते है लेकिन इधर पिछले कुछ समय से देखा जा रहा है कि पहाड़ पर आपराधिक वारदातों में तेजी से इजाफा हुआ है और अपने घर-परिवार के बीच पटवारी को भी आया जान डर से थर-थर कांपने वाले लोग एकाएक ही बड़े जुर्मो के साझीदार दिखाई देने लगे है। इतना ही नही, पहाड़ों में लगातार घट रही स्थानीय आबादी के बीच पुरूष वर्ग की नगण्य स्थिति को देखते हुऐ इन तमाम बाहर से आये लोगों ने स्थानीय स्तर पर महिलाओं के साथ अनुचित सम्बन्ध बनाना तथा इन्हें ब्लेकमेल करना भी शुरू कर दिया। पिछले कुछ समय में ऐसे अनेक किस्से सामने आये है जब पहाड़ की लड़कियाँ इन बाहर से आये लोगों द्वारा भगा ली गयी है और एक बार अपना घर छोड़ने के बाद इन महिलाओं या लड़कियों का कोई सुराग नही मिला है। यह भी देखने में आया है कि इन जोर-जबरदस्ती बनाये गये प्रेम सम्बन्धों का जब भी किसी महिला या युवती द्वारा विरोध गया है तो उसकी हत्या कर दी गयी या फिर उसे आत्महत्या के लिऐ मजबूर कर दिया लेकिन हमारी पुलिस या कानून व्यवस्था के पास इस तरह के जुर्मो को रोकने का कोई समाधान ही नही है और न ही कानून के रखवाले इतने सजग है कि इस तरह के घटनाक्रमों के बाद इनका पूरा खुलासा करके अपराधी को जेल भेज सके। लिहाजा पहाड़ की शांत वादियों में सतपुली जैसी घटनाऐं सामने आने लगी है और इन बाहरी लोगों की आमद को पहाड़ के लिऐ खतरनाक समझ रहा स्थानीय युवाओं का एक बड़ा हिस्सा इनकी छोटी-बड़ी गलतियों को एक साथ जोड़कर इनसे पहाड़ खाली कराने के मूड में है लेकिन मीडिया का एक हिस्सा सुनियोजित साजिश के तहत अपना अस्तित्व बचाने के लिऐ पहाड़ी जन-समुदाय द्वारा लड़ी जा रही इस जंग को धार्मिक रूप देने की कोशिश कर रहा है और सतपुली के घटनाक्रम को दो समुदायों के बीच जातीय संघर्ष की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है जबकि स्थिति इसके ठीक उलट है। यह एक बड़ा सवाल हो सकता है कि अपने दैनिक जीवन में नित नये संघर्षो से जूझ रहा पहाड़ी समुदाय अपने धर्म, संस्कृति और स्थानीय परम्पराओं पर हो रहे इस हमले से कैसे पार पा सकता है और वह कौन सा तरीका हो सकता है जिसे अमल में लाकर एक सामान्य पहाड़ी परिवार अपनी बहन-बेटियों को सुरक्षित मान सकता है। यह माना कि प्रेम विवाह में कोई बंधन नही है और उत्तराखंड का पहाड़ी जनमानस अन्र्तजातीय विवाह या दूर प्रदेशों में रिश्तेदारी करनेे के खिलाफ भी नही है लेकिन इसका तात्पर्य यह भी तो नही है कि हम विवाह के नाम पर अपने प्रदेश की बहन-बेटियो को दोजख की आग में जलने के लिऐ छोड़ देंगे और रिश्तों के नाम पर उन्हें ऐसे हाथों में सौंप दिया जायेगा जो उनके जिस्म का सौदागर साबित हो। लिहाजा हमें कोई ऐसा तरीका तलाशना ही होगा जिससे इस समस्या का कोई वाजिब समाधान तलाशा जा सके।

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