व्यवस्थागत्-सुधारों के नाम पर | Jokhim News

Thursday, October 19, 2017

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व्यवस्थागत्-सुधारों के नाम पर

सरकारी कर्मचारियों व निचले स्तर के अधिकारियों के बीच छंटनी की राह तलाश रही है सरकार।
सरकार की कार्यक्षमताओं का निर्धारण करने के लिऐ जिम्मेदारी तय किये जाने का तर्क बुरा नही है और न ही इस तर्क की कसौटी पर खरा न उतर पाने वाले कर्मचारी की सेवाऐं समाप्त किये जाने सम्बन्धी किसी आदेश को गलत ठहराया जा सकता है लेकिन सवाल यह है कि इस वृहद जिम्मेदारी को लेने तथा इसके लिऐ मानक निर्धारित करने का काम कौन करेगा। हमने देखा कि उत्तराखंड समेत कुछ राज्यों की सरकारें वर्तमान में अपने कर्मचारियों के काम करने के तरीके व कार्य क्षमता को लेकर चिन्तित नजर आ रही है और इसमें सुधार लाने के उद्देश्य से पचास साल से उपर के सरकारी कर्मचारियों की कार्यक्षमताओं व कार्यदक्षता का पुर्नमूल्याकंन करते हुये उन्हें आवश्यक सेवा निवृत्ति देने जैसे फैसलों पर विचार किया जा रहा है लेकिन सरकारी कर्मचारियों की कार्यक्षमताओं को तय करने के मानक क्या होंगे और इन्हें कौन तय करेगा, इसे लेकर एक बड़े असमंजस की स्थिति है। यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि सरकारी तंत्र पर अफसरशाही पूरी तरह हावी है और ऐसे कई किस्से है जब वरीष्ठ अधिकारियों द्वारा अपने अधीनस्थों पर दबाव डालकर उन्हें गलत कार्य करने के लिऐ मजबूर किया गया है। ऐसी स्थिति में कार्यक्षमता निर्धारित करने की जिम्मेदारी नौकरशाही को दी जाती है तो इसका दुरूपयोग होना सुनिश्चित है और यह तय मानना चाहिऐं कि सरकार की यह नीति तंत्र में एक नये तरह के भ्रष्टाचार को बढ़ावा देगी लेकिन इसके ठीक विपरीत इस तरह की कोई भी जिम्मेदारी अगर नेताओं को दे दी जाय तो हालात और भी ज्यादा खराब हो सकते है क्योंकि वक्त-बे-वक्त सत्ता एवं सरकार पर सरकारी तंत्र के हावी होने का रोना रोने वाले नेताओं को जब यह अनुमान हो जायेगा कि उसकी कलम की ताकत किसी नौकरशाह की नौकरी खा सकती है तो वह उसपर हावी होकर अपना हित साधने का प्रयास जरूर करेगा जिसके परिणाम एक अलग तरह की अराजकता के रूप में सामने आयेंगे। हमने देखा है कि मीडिया की सजगता और जनता के बीच से विरोध के डर के बावजूद सत्तापक्ष के तमाम नेता एवं दायित्वधारी शीर्ष स्तर पर नौकरशाही से सांठ-गांठ कर लाखों-करोड़ो के भ्रष्टाचार को जन्म देते है और मामला खुलने की स्थिति में निचले स्तर पर कुछ कर्मचारियों अथवा अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही कर सरकार अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है। ठीक इसी तरह रिश्वतखोरी के मामलों में भी देखा गया है कि लाखों-करोड़ रूपये की हेर-फेर कर तमाम तरह की बेनामी सम्पत्ति अर्जित करने वाले नेता व वरीष्ठ नौकरशाह बहुत ही कम मामलों में कानून की गिरफ्त में आते है जबकि भ्रष्टाचार के खिलाफ तत्काल प्रभाव से कार्यवाही करने का दावा करने वाली सीबीआई या फिर स्थानीय पुलिस-विजिलेंस छोटे कर्मचारियों को रिश्वत लेेने के आरोंप में तत्काल ही जेल में डाल देती है और मजे की बात यह है कि इस तरह की रिश्वतखोरी से जुड़े तमाम मामले दस-पाँच हजार या लाख-दो लाख तक ही सीमित होते है। हम यह नही कहते कि सरकारी कामकाज में निचले स्तर पर कोई भ्रष्टाचार नही है या फिर सरकारी मशीनरी के मुख्य अंग कहलाये जाने वाले बाबू व अन्य छोटे स्तर के अफसर किसी भी तरह के भ्रष्टाचार में शामिल नही है और न ही उनकी कार्यक्षमताओं के चलते सरकारी कामकाज प्रभावित हो रहा है लेकिन यह कहना न्यायोचित है कि अधिकांश सरकारी कर्मचारी व छोेटे अधिकारी, नेताओं व वरीष्ठ नौकरशाहों के दबाव में काम करते है और सरकारी व्यवस्थाओं के तहत पचास वर्ष से अधिक आयु के कर्मचारियों को कार्यक्षमता व कार्य गुणवत्ता की जाँच के आधार पर कार्यमुक्त कर देने के आदेशों के बाद उनका दबाव बढ़ जाना निश्चित है। लिहाजा केन्द्र अथवा राज्य की सरकारों ने अपने इस नियम का पुर्नावलोकन करना चाहिऐं और अगर इस तरह की व्यवस्था को लागू करने से सरकारी कामकाज की स्थिति में किसी भी तरह के सुधार आने की संभावना हो तो इस तरह के नियम सबसे पहले सरकार चलाने का दावा करने वाले नेताओं व वरीष्ठ नौकरशाहों पर लागू होने चाहिऐं । हमने देखा है कि हमारे नेताओं में जीवन के अन्तिम पायदान तक पहुँचनेे के बावजूद किस तरह सत्ता में बने रहने की ललक कायम रहती है और इसके लिऐ वह कितनी ही तरह के हथकण्डों का इस्तेमाल करते है। उपरोक्त के अलावा यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि एक बार चुनाव जीतने के बाद अधिकांश नेता पूरे पाँच साल तक जनता की ओर से संवेदनहीन बने रहते है और अपने निर्वाचन क्षेत्र की समस्याओं व जनान्दोलनों के प्रति दिखाई जाने वाली इस संवेदनहीनता के बावजूद कोई भी संवेधानिक ताकत उन्हें उनकी कुर्सी व पदवी से नही हटा सकती। हमने यह भी देखा है कि वरीष्ठ आईएस अधिकारी अपने उपर लगने वाले भ्रष्टाचार के तमाम आरोंपो व जन सामान्य के बीच होने वाली असामान्य चर्चाओं के बावजूद न सिर्फ लंबे समय तक अपनी कुर्सियों पर जमे रहते है बल्कि विपक्ष में रहकर इन अधिकारियों के प्रति स्पष्ट नाराजी व्यक्त करने वाले नेता सत्ता में आते ही न सिर्फ इनके प्रशंसकों की भांति काम करने लगते है बल्कि इनकी सेवाओं की समय सीमा समाप्त होने के बावजूद भी इन्हें विभिन्न आयोगों व महत्वपूर्ण कुर्सियों से नवाजते हुऐ इनकी हनक बनाये रखने का पूरा प्रयास किया जाता है। क्या यह ज्यादा बेहतर नही होता कि सरकारी कर्मियों की कार्यक्षमताओं का निर्धारण करने से पहले किसी भी राज्य अथवा सरकार के आधीन काम करने वाले आईएस अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित किये जाने के संदर्भ में नियम बनाया जाता और विभिन्न राज्यों व केन्द्र की सरकार लोकपाल जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करने के साथ ही साथ देश की जनता को अपने चुने हुऐ प्रतिनिधि वापस बुलाने का अधिकार देती लेकिन सत्ता पक्ष ने उपरोक्त संदर्भ मे किसी भी तरह का बयान जारी करने की जरूरत समझे बिना सिर्फ निचले स्तर के कर्मकारों पर कहर बरपाने की कोशिश की है। जाहिर है कि विभिन्न सरकारी कर्मचारियों के संगठन पूरी ताकत से सरकार के इस फैसले का विरोध करने उतरेंगे और जाने अनजाने में सरकारी कामकाज प्रभावित होगा। वैसे भी अगर कर्मचारियों के नजरियें से गौर करें तो यह कहना न्यायोचित होगा कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ अंगो में आने वाली शिथिलता के चलते किसी भी कर्मकार की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है लेकिन उम्र बढ़ने के साथ ही साथ होने वाला अनुभव हमेशा ही इस शिथिलता की पूर्ति कर देता है। ठीक इसी प्रकार बीमारी या किन्ही कारणों के चलते दुर्घटना में अपने शरीर का कोई अंग गवां चुके कर्मचारी के बारे में भी कहा जा सकता है कि सरकारी सेवाओं में रहते हुऐ इन हालातों तक पहुँचे लाचार व बेहसहारा कर्मचारियों को सरकार पचास साल की उम्र के बाद किसके भरोसे छोड़ना चाहती है? ऐसा लगता है कि हमारा सरकारी तंत्र धीरे-धीरे कर पूंजीवादी व्यवस्थाओं को अंगीकार करते हुऐ सरकारी खर्च को कम करने के नाम पर ‘हायर एण्ड फाॅयर‘ की नीतियाँ अपनाना चाहता है या फिर चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के पद पूरी तरह समाप्त करने के बाद सरकारी तंत्र अब धीरे-धीरे कर तृतीय श्रेणी के पदो के खात्में की ओर कदम बढ़ा रहा है और हम देख रहे है कि इन तमाम पदों पर सीधे व स्थायी नियुक्तियाँ बंद करने के बाद संविदा या ठेका कर्मचारी के रूप में इस पदों के सापेक्ष काम करने वाले कर्मकारों का हाल कितना बुरा है। लिहाजा कर्मचारी को शोषण के इस क्रम से बचाने के लिऐ कर्मचारी संगठनों ने आगे आना ही होगा।

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