जी रयां, जग रयां, यो दिन-यो वार…….. | Jokhim News

Thursday, September 21, 2017

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जी रयां, जग रयां, यो दिन-यो वार……..

उत्तराखंड के विकास को मद्देनजर रखते हुऐ यहाँ की लोकसंस्कृति व लोक परम्पराओं को मजबूती दिया जाना जरूरी।
आन्दोलन, धरना-प्रदर्शन और उपवास के साथ ही साथ स्थानीय कृषि उत्पादों, तीज त्योंहारों एवं परम्पराओं के माध्यम से सरकार का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने में पूरी तरह सफल उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने एक बार फिर उत्तराखंड के लोकपर्व ‘हरेला‘ को माध्यम बनाकर अपने कार्यक्रम ‘जी रयां, जग रयां‘ के आयोजन से सरकार को घेरने का प्रयास किया है। यूं तो ‘हरेला‘ उत्तराखंड की लोकसंस्कृति से जुड़ा पर्व है और स्थानीय किसान इस अवसर को वैज्ञानिक तरीकें से उपयोग करते हुऐ अपने खाद-बीज की गुणवत्ता की जाँच व फसल बुआई के लिऐ उचित तिथियों का निर्धारण करते है लेकिन बदलते वक्त के साथ पहाड़ो में तेजी से हो रहे पलायन तथा सरकारी कायदें-कानूनों के चलते खेतों पर आक्रामक होते जंगली जानवरों की बढ़ती संख्या को देखते हुऐ उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रो में खेती बीते दिनों की बात होती जा रही है। इस सबके बावजूद हरेले का लोक महत्व न सिर्फ उत्तराखंडी जनमानस के बीच बना हुआ है बल्कि मौसम के बदलते मिजाज व ग्लोबल वांर्मिग के किस्सों ने इसे और भी ज्यादा प्रासंगिक बना दिया है। हम यह कह सकते है कि विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून ) के रूप में वृक्षारोपण व पर्यावरणीय संतुलन का संदेश देने वाला अवसर, मौसम की प्रतिकूलता के चलते केवल सांकेतिक आयोजनों व बंद कमरें में होने वाली सेमीनारों तक सिमटकर रह जाता है जबकि हरेले के अवसर मानसून अपने चरम् पर होने के कारण देश के लगभग हर हिस्से में मौसम पेड़ लगाने व किसान द्वारा फसल बोने के लिऐ अनुकूल होता है। इसलिऐ पर्यावरण के प्रति जागरूक रहने का संदेश देते हुऐ वृक्षारोपण करने तथा अपने आसपास की साफ-सफाई व्यवस्था को सुदृढ़ करते हुऐ स्वच्छता अभियान चलाने या फिर त्योहारी आनन्द के साथ पहाड़ के परम्परागत् पकवानों का सेवन करने के लिऐ यह एक उचित अवसर माना जा सकता है और इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि राज्य गठन के बाद पहली बार हरीश रावत सरकार ने इस ओर ध्यान दिया जिसके चलते परम्परागत् त्योंहार हरेले को जोर-शोर व सरकारी स्तर पर मनाये जाने के चलते दो-तीन वर्षों में ही यह लोकपर्व भारतीय जनमानस के बीच एक विशेष पहचान पा गया लेकिन समय के साथ ही साथ सरकार में बदलाव आते ही सरकारी कारकूनों के काम करने के अंदाज बदल गये और पहाड़ की लोकसंस्कृति व लोकमहत्व के इस पर्व के अवसर पर होने वाले सभी सरकारी आयोजनों को ठण्डे बस्ते में डालने की तैयारी सरकारी स्तर पर शुरू हो गयी। वैसे भी उत्तराखंड की सत्ता के शीर्ष पर काबिज नौकरशाही हमेशा से इन प्रदेश की संस्कृति, भाषा एवं लोकपर्वो को नकारने का प्रयास करती रही है और सत्ता पर काबिज होने वाली राजनैतिक ताकतों में से अधिकांश ने इस नौकरशाही की हाँ में हाँ मिलाने वाले अंदाज में उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के दौरान उठे अधिकांश सवालातों को अनदेखा किया है। इन हालातों में सत्ता पर काबिज एक विकृत मानसिकता के दल से जुड़े नेताओं व सरकार के मंत्रियों से यह उम्मीद भी कैसे की जा सकती है कि वह अपने ऐजेण्डे से हटकर पहाड़ के तीज-त्योहारों अथवा परम्पराओं को मजबूत करने वाले लोकपर्वो को बढ़ावा देने का प्रयास करेगें । सत्ता पक्ष को विकृत मानसिकता वाला राजनैतिक दल कहने से हमारे भाजपाई मित्रों को कुछ बुरा जरूर लग सकता है लेकिन अगर उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के इतिहास पर गौर करें तो हम पाते है कि जिस वक्त उत्तराखंड राज्य आन्दोलन अपने चरम पर था, उस वक्त भाजपा एवं संघ से जुड़े कुछ लोगों ने उत्तराचँल प्रदेश का नारा देकर न सिर्फ इस आन्दोलन को कमजोर करने की कोशिश की बल्कि राज्य गठन के वक्त बड़ी ही चालाकी से उ.प्र. के कुछ मैदानी इलाको को इस नवगठित राज्य में शामिल कर यहाँ की संस्कृति, सभ्यता एवं भाषा पर एक सोचा समझा हमला किया। यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के दौरान शहीद साथियों पर गोलाबारी करने या फिर मुजफ्फरनगर काण्ड को अंजाम देने वाले बुआ सिंह जैसे तमाम पुलिस अधिकारियों को भाजपा के नेताओ के संरक्षण व इनके नेतृत्व में बनने वाली सरकारों की कोताही के चलते ही सजा नही दी जा सकी जबकि उत्तराखंड राज्य आन्दोलन की चरम स्थिति से बहुत पहले ही राज्य की राजधानी के रूप में चयनित गैरसैण के स्थान पर देहरादून को स्थायी राजधानी बनाने का फैसला भी भाजपा की अन्तरिम सरकार द्वारा ही लिया गया और अगर अब वर्तमान हालातों की बात करें तो भाजपा के नीतिनिर्धारकों ने राज्य सम्पत्ति बंटवारे के नाम पर एक बार फिर इस राज्य की जनता को छल दिया है। कितना आश्चर्यजनक है कि उत्तराखंड के विकास को लेकर डबल इंजन की बात करने वाले भाजपाई नेतृत्व ने पूरी चालाकी के साथ उत्तराखंड के हिस्से में आने वाले हरिद्वार कुंभ मेला क्षेत्र समेत यहाँ की नहरों व बांधो पर उ.प्र. की दावेदारी पूरी तरह सुनिश्चित कर दी है जबकि इन क्षेत्रों में रहने वाली जनता (जो कि प्रदेश की कुल ‘जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा है और प्रदेश के संसाधनों के उपभोग के मामले में भी जिसकी ठीक-ठाक भागीदारी है।) अभी भी उत्तराखंड की वासी है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि कुछ राष्ट्रीय मुद्दों या मोदी लहर के चलते भाजपा उत्तराखंड की सत्ता पर कब्जेदारी करने में कामयाब भले ही रही हो लेकिन यहाँ के स्थानीय मुद्दों, समस्याओं, तीज-त्योहारों व परम्पराओं में भाजपा के नेताओं की कोई रूचि नही है और न ही इनकी कार्यशैली को देखकर यह प्रतीत होता है कि मौजूदा सरकार उत्तराखंड को एक पहाड़ी प्रदेश मानते हुऐ अपनी योजनाओं का निर्धारण कर रही है। इन हालातों में इस पर्वतीय प्रदेश की लोककला,संस्कृति, परम्परा व तीज-त्योंहार को बचाये रखने के लिये जरूरी है कि प्रदेश के तमाम लोक कलाकार व सामाजिक संगठन विभिन्न आयोजनों के जरिये एक मंच के नीचे आये और हमें यह कहने में कोई हर्ज नही दिखता कि अपने शासनकाल में इस दिशा में प्रयास करने वाले हरीश रावत हाल फिलहाल सत्ता की राजनीति से दूर होने के बावजूद भी इन प्रयासों में लगे हुऐ है। यह ठीक है कि हालिया विधानसभा चुनावों में दो-दो निर्वाचन क्षेत्रों से उन्हें मिली चैंका देने वाली हार उनके जननेता वाले स्वरूप पर सवालिया निशान खड़े करती है तथा प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में प्रीतम सिंह व नेता प्रतिपक्ष के रूप में इन्दिरा हृदयेश के चयनित हो जाने के बाद संगठनात्मक मामलों में भी उनकी दखलदांजी की संभावनाऐं लगातार कम होती दिख रही है लेकिन इस सबके बावजूद हरीश रावत न सिर्फ प्रदेश व कांग्रेस की राजनीति में अपनी अहमियत बनाये हुऐ है बल्कि विभिन्न आयोजनों के वक्त उनके इर्द-गिर्द जमा होने वाली निजी प्रशंसकों व समर्थको की भीड़ को देखकर उनके विरोधी भी हैरान हो जाते है कि आखिर ऐसी शख्सियत अपना चुनाव कैसे हार सकती है। खैर, वजह चाहे जो भी हो लेकिन इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि हरेला बोने के अवसर पर उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा अपने आवास पर आयोजित कार्यक्रम ‘जी रयां, जग रयां‘ के बहाने प्रदेश की राजनैतिक गलियारों में एक नयी तरह की राजनैतिक सनसनाहट भर दी गयी है और हो सकता है कि हरीश रावत के इस कार्यक्रम के बाद सरकार भी नींद से जागे व अपना फैसला बदलने को मजबूर दिखाई दे।

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