ये मेरी सरकार की हालत क्या हो गयी भगवान | Jokhim News

Sunday, September 24, 2017

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ये मेरी सरकार की हालत क्या हो गयी भगवान

चरमराती स्वास्थ्य सुविधाओं के चलते मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत भी निजी चिकित्सालयों के भरोसे चरमराती स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ उत्तराखंड के दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं द्वारा चलती हुई आपातकालीन सेवाओं मे बच्चे जनना या फिर दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में बीमार मरीजों का दवा के इंतजार में अथवा सीमित साधनों के माध्यम से अस्पताल ले जाते हुये ही दम तोड़ देना कोई नयी बात नही थी और चुनावी मोर्चे पर जमी भाजपा ने अपने प्रचार के दौरान आम आदमी की इन समस्याओं को निशानें पर भी लिया था जिसके चलते स्थानीय जनता को यह विश्वास था कि राज्य में बनी डबल इंजन सरकार सत्ता संभालते ही इन तमाम अव्यवस्थाओं को काबू में लेगी और आम आदमी को राहत महसूस होगी लेकिन हमने देखा कि राज्य के मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र में स्पष्ट दिखने वाली अवयवसथाओं का खुलासा करते हुये स्वंय लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी व वरीष्ठ राज्य आन्दोलनकारी सुशीला बलूनी को राज्य की राजधानी के सरकारी अस्पताल से हटाकर निजी अस्पतालों में भरती कर सरकार के नियन्त्रण में आम जनता की सुविधा के लिऐ चलायी जा रही स्वास्थ्य सुविधाओं की पोल खोली। हांलाकि कि इस विषय पर अलग से चर्चा की जा सकती है कि लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी तथा वरीष्ठ राज्य आन्दोलनकारी सुशीला बलूनी को सरकारी चिकित्सालयों में स्वास्थ्य लाभ के लिऐ भर्ती किये जाने के स्थान पर उन्हें निजी चिकित्सालयों में भर्ती किया जाना कितना जरूरी था लेकिन अगर आम आदमी के नजरिये से देखें तो प्रदेश में निजी चिकित्सालयों की स्थिति भी बहुत अच्छी नही है। लूट के केन्द्र बने राजधानी देहरादून समेत प्रदेश के लगभग सभी निजी चिकित्सालयों पर न तो सरकार का कोई नियन्त्रण है और न ही इन चिकित्सालयों में विभिन्न बीमारियों के इलाज व स्वास्थ्य परीक्षण के नाम पर वसूले जाने वाले शुल्क का कोई मानक तय है लेकिन इस सबके बावजूद सरकार चलाने के लिऐ जिम्मेदार तबके द्वारा सरकारी व्यवस्थाओं को हतोत्साहित करते हुये निजी चिकित्सकों को दिया जाने वाला इस तरह का प्रोत्साहन निन्दा करने योग्य है और सरकार के तौर-तरीकों से यह सिद्ध होता है कि जनता को गलफत में रखकर बहुमत हासिल करने के बाद उसे मतदाताओं की कोई चिन्ता नही है। हो सकता है कि इन दो विशिष्ट महानुभूतियों को इलाज के लिऐ सरकारी अस्पताल के स्थान पर निजी चिकित्सालय में ले जाने के संदर्भ में सरकार के समर्थक यह बयान दें कि मुख्यमंत्री के इस फैसले के पीछे पीड़ित परिवार की राय अहम् थी लेकिन उपरोक्त के अलावा सड़क दुर्घटना में घायल एक व्यक्ति को मुख्यमंत्री के काफिले को रोककर मुख्यमंत्री के ही वाहन से निजी चिकित्सालय ले जाये जाने का किस्सा भी बहुत पुराना नही है और यह तमाम घटनाक्रम यह इशारा करते है कि उत्तराखंड की नवगठित सरकार सरकारी तंत्र पर विश्वास करने की जगह व्यवस्थाओं का निजीकरण करने पर ज्यादा विश्वास कर रही है। शायद यहीं वजह है कि सरकार ने सत्ता के शीर्ष पर काबिज होते ही बिना किसी होमवर्क के राजधानी देहरादून समेत तमाम शहरी व दबाव वाले क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों के प्रमुख व विशेषज्ञ चिकित्सकों का स्थानांतरण दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में कर दिया है और मजे की बात यह है कि इन तमाम स्थानांतरित चिकित्सकों में से अधिकांश ने अभी तक अपने स्थानांतरण वाले क्षेत्रों में सेवाऐं दिया जाना प्रारम्भ ही नही किया है। यदि इनमें से कुछ चिकित्सकों या विशेषज्ञों ने नये स्थानों पर कार्यभर लिया भी है तो वह या तो लंबी छुट्टी पर चले गये है या फिर संसाधनों के आभाव में कार्य किया जाना इनके लिये संभव ही नहीं हो रहा है और हम यह अच्छी तरह समझ सकते है कि जब प्रदेश की राजधानी का ही हाल इतना बुरा है तो प्रदेश के अन्य हिस्सों मे स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर क्या स्थिति होगी। यह माना जा सकता है कि कुर्सी संभालते ही मुख्यमंत्री द्वारा निजी रूचि लेकर किये गये सरकारी चिकित्सकों के स्थानांतरण के पीछे सरकार की नीयत गलत नही रही होगी और न ही कोई भी राजनैतिक व्यक्तित्व ऐसा कदम उठायेगा जिससे उसके आचरण या ईमानदारी पर प्रश्न चिन्ह खड़ा किया जाय लेकिन अगर सरकार के इस तरह के फैसलों के पीछे छिपे नौकरशाही के इशारे को समझे तो व्यवस्थाओं में किये गये इस तरह के हेर-फेर किसी बड़ी गड़बड़ी का इशारा करते है और मुख्यमंत्री कार्यालय के सर्वेसर्वा बने एक वरीष्ठ नौकरशाह द्वारा इस तरह के कार्यकलापों में व्यक्तिगत् रूचि लिये जाने के चलते किसी बड़ी गड़बड़ी की संभावना से इनकार नही किया जा सकता। यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि राजधानी देहरादून समेत प्रदेश के तमाम शहरी क्षेत्रों में खुले सरकारी चिकित्सालयों में स्थानीय ही नही बल्कि आस-पास के तमाम क्षेत्रों के मरीजों का बड़ा दबाव रहता है और इन चिकित्सालयों में कार्यरत् चिकित्सक बड़ी ही मेहनत व लगन के साथ अपनी क्षमता से कई गुना ज्यादा मरीजों की देख-रेख व इलाज कर व्यवस्थाओं को नियन्त्रण में रखने का प्रयास करते है लेकिन वर्तमान में इन तमाम बड़े अस्पतालों में अफरा-तफरी का माहौल है और स्थानीय जनता यह समझ ही नही पा रही कि वह अपनी समस्याओं को लेकर कहाँ जाये। यह ठीक है कि एक नवगठित सरकार से यह उम्मीद नही की जा सकती कि वह सत्ता के शीर्ष पर काबिज होते ही तमाम अव्यवस्थाओं को चकचोबंद कर देगी और किसी जादू के जोर पर तमाम सरकारी मशीनरी एक ही झटके में सही काम करने लगेगी लेकिन अगर सरकार का मुखिया ही अपने नियन्त्रण में आने वाली व्यवस्थाओं को अनदेखा कर निजी चिकित्सालयों की ओर दौड़ लगाने लगे तो ऐसी व्यवस्था का भगवान ही मालिक है। हमने देखा कि पूर्व में भाजपा सरकार द्वारा चिकित्सा के क्षेत्र में एक क्रान्ति के तरह प्रस्तुत की गयी आपातकालीन सेवा-108 किस तरह खस्ताहाल हालत में है और विश्व बैंक के धन से पीपीपी मोड के नाम पर तमाम निजी सेवा प्रदाताओं को दी गयी चिकित्सा क्षेत्र की सेवा व्यवस्थाओं में किस हद तक लूट हुई है लेकिन इतना सबकुछ देखने, जानने और समझने के बावजूद हम अपने काम करने के ढ़र्रे को बदलने के लिऐ तैयार नही है बल्कि दूसरी बार सरकार पर काबिज होते ही व्यापक जनहित वाली सरकार ने उन तमाम सुविधाओं को भी तहस-नहस करने की पूरी कोशिश शुरू कर दी है जो खस्ताहाल होने के बावजूद आमजन की छोटी-मोटी राहत प्रदान कर रही थी। हांलाकि अभी भी बहुत कुछ नही बिगड़ा है और बाजी सरकार के हाथ में है तथा सरकार अगर चाहे तो अपनी भूल सुधारने वाले अंदाज में व्यवस्थाओं को चकचोबंद करने की एक कोशिश कर सकती है लेकिन त्रिवेन्द्र सिंह रावत की कार्यशैली और उनके विश्वस्त सलाहकार माने जा रहे नौकरशाह ओमप्रकाश के इतिहास को देखकर ऐसा नही लग रहा कि यह जोड़ी पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा की गयी गलतियों से कुछ सबक लेते हुये अपने तात्कालिक फैसलों पर पुर्नविचार की कोशिश भी करेगी। यह ठीक है कि सरकार को सदन में पूर्ण बहुमत प्राप्त है और भाजपा के विधायकों पर लटक रहा संघ का डंडा उनपर पड़ रहे जनता के दबाव के बावजूद उन्हें अनुशासन में रहते हुये सरकार की नाकामियों पर पर्दा डालने के लिऐ मजबूर कर रहा है लेकिन यह व्यवस्थाऐं ज्यादा लंबे समय तक कायम नही रह सकती। जनतंत्र की यहीं विशेषता है और जनतांत्रिक व्यवस्थाओं में जनता की नाराजी का कहर किसी पर भी व कभी भी टूट सकता है।

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