मौसम के बदले मिजाज के साथ | Jokhim News

Thursday, October 19, 2017

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मौसम के बदले मिजाज के साथ

बढ़ सकती है उत्तराखण्डी जनमानस की समस्यायें और प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरें को देखते हुऐ स्थानीय प्रशासन को रहना होगा चुस्त-दुरूस्त
इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि उत्तराखंड का मौसम हाल-फिलहाल तक नई सरकार पर मेहरबान है और गर्मी के इस मौसम में बीच-बीच में हुई बरसात ने न सिर्फ स्थानीय जनता को गर्मी से राहत दी है बल्कि पहाड़ी जंगलों में लगने वाली आग भी मौसम की इस मेहरबानी के चलते सरकारी तंत्र के लिऐ बड़ी समस्या नही बनी है। उपरोक्त के अलावा चार धाम यात्रा सीज़न समेत पहाड़ो पर पर्यटन के लिऐ सर्वोत्तम माने जाने वाले गर्मी के इस मौसम में छुटपुट वर्षा के चलते आने वाले सामान्य व्यवधानों को छोड़कर ऐसी कोई भी बड़ी घटना या दुर्घटना सामने नही आयी है जिससे सरकार को शर्मिन्दा होना पड़े या फिर इस प्रदेश के पर्यटन व्यवसाय पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़े। हांलाकि इस अन्तराल में भी बसो के गिरने से यात्रियों के मारे जाने व हताहत होने की अनेक घटनाऐं हुई है और प्रदेश के तमाम कस्बाई क्षेत्रों व नगर पालिका या नगर निगम वाले इलाकों में छुटपुट बारिश के उपरांत ही सामने आयी असहजता की स्थिति यह साबित करने के लिऐ काफी है कि सरकार ने वर्तमान तक इस संदर्भ में कोई प्राथमिक तैयारी नही की है लेकिन नई सरकार के गठन होने की स्थिति तथा दुघर्टना रहित गुजर गये इस दौर को अनदेखा किया जा सकता है बशर्ते सरकार आगे की स्थितियों से निपटने के लिऐ तैयार दिखती हो। यह ठीक है कि मौसम विज्ञानियों के अथक प्रयासों के बावजूद भी अभी तक पहाड़ों में होने वाली अतिवृष्टि अर्थात् बादल फटने के घटनाक्रम, भूकम्प या एकाएक ही होने वाले मौसमी बदलाव का अंदाजा लगाना कठिन है और किसी आपदा अथवा अनहोनी की स्थिति में प्रकृति के कहर के चलते होने वाले नुकसान को रोक पाना लगभग असंभव है लेकिन अगर हालातों से निपटने के लिऐ कुछ प्राथमिक तैयारियाँ की जाय तो साल दर साल होने वाले इस नुकसान को कम किया जा सकता है और प्राकृतिक हालातों व मौसमी तौर-तरीकों से समझौते करके हम काफी हद तक सुकून के साथ अपना जीवन गुजार सकते है। हमने देखा है कि बरसात का मौसम शुरू होने से पहले सरकारी तंत्र हमेशा ही हालातों से मुकाबला करने के लिऐ तैयार होने के दावे करता है तथा रेड अलर्ट या मोक ड्रिल जैसे तमाम माध्यमों से खुद के सतर्क होने व विपरीत परिस्थितियों के टकराने के लिऐ तैयार होने की नुमाइश वह मीडिया व अपने हुक्मराॅनो के समक्ष करता है जबकि किसी छोटी-मोटी दुघर्टना या फिर या फिर अतिवृष्टि के अवसर पर यह दावे फेल होते नजर आते है और राहत व बचाव कार्यो के लिऐ हमेशा ही आस-पास की जनता अपने पारम्परिक संसाधनों के साथ आगे आती दिखती है। ठीक इसी प्रकार हर सड़क दुघर्टना में होने वाली जन हानि के बाद वाहनो की फिटनैस जाँच को लेकर बड़े-बड़े दावे किये जाते है तथा वाहन चालकोें के लाईसेन्सों की जाँच करते हुये उनके लिऐ प्रशिक्षण सत्र चलाने की घोषणा भी जोर-शोर से की जाती है लेकिन एक अंतराल बाद सबकुछ फिर ढर्रे पर आ जाता है और मजबूरी की मारी जनता आधे-अधूरे संसाधनों के बूते अपनी दैनिक दुश्वारियों से लड़ती दिखाई देती है। अगर हम सड़क यातायात की बात करें तो उत्तराखंड समेत तमाम पर्वतीय राज्यों के जनजीवन में सड़कों को लाइफलाईन माना जा सकता है और इनके ठीक-ठाक व चलताऊ न होने की हालत में पहाड़ की दैनिक दिनचर्या में होने वाली मुश्किलों का अनुमान लगाना कठिन नही है लेकिन उत्तराखंड के दैनिक जीवन में मुख्य राष्ट्रीय राजमार्गो का क्षतिग्रस्त होना या फिर यातायात के लिऐ बंद कर दिया जाना एक सामान्य बात है और मजे की बात यह है कि यहाँ का प्रशासन इस तरह के घटनाक्रमों को सामान्य तरीके से लेते हुये ट्रेफिक को दूसरी ओर डाईवर्ट कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेता है। विकास के नाम पर नित नयी बन रही सड़कों या फिर ग्राम सभाओं को निकटवर्ती कस्बे या शहर से जोड़ने के लिऐ निर्मित किये जाने वाले खंडजो व मंडी समिति आदि के माध्यम से बनाये जाने वाले छोटे मार्गो को जल्द पूरा करने की जल्दबाजी मंे हम तमाम तकनीकी आर्हताओं व गुणवत्ता के मानकों को पीछे छोड़ देते है। नतीजतन यह सड़के बनने से पहले ही टूटने लगती है और इनका बनाया जाना स्थानीय जनता के लिऐ फायदेमंद की जगह नुकसानदायक होने लगता है। ठीक इसी तरह अनियोजित विकास की ओर बढ़ रहे उत्तराखंड में विभिन्न सरकारी विभागों व निर्माण एजेंसियों द्वारा बिना किसी तालमेल के किया जाने वाला निर्माण कार्य जनता को राहत देने की जगह उसके लिऐ दुखदायी साबित होता है और अधिकांश मामलों मे यह देखा जाता है कि ठेकेदारों व सरकारी अधिकारियों की लापरवाही के कारण इस तरह के निर्माण कार्यो से जूझ रहे क्षेत्रों मेें तमाम छोटी-बड़ी घटनाऐं जन्म लेती रहती है। सरकारी तंत्र को चाहिऐ कि वह इन सबके बीच तालमेल स्थापित करें और जनसामान्य को राहत पहुँचायें। राज्य में नवगठित त्रिवेन्द्र सिंह रावत सरकार को इन तमाम अव्यवस्थाओं को समझकर अगले पाँच साल तक व्यापक जनहित में काम करने का मौका मिला है तथा प्रदेश की जनता द्वारा निर्णायक अंदाज में भाजपा को दिये गये समर्थन के चलते इस बार उपचुनावों की वजह से बार-बार आचार संहिता लगने के कारण विकास कार्य प्रभावित होने का खतरा भी नही है। उपरोक्त के अलावा मौसम की मेहरबानियाँ अभी तक पूरी तरह सरकार के साथ है और सरकार ने भी राजधानी देहरादून के कुछ मुख्य मार्गो से अतिक्रमण हटाने के मामले में सख्त कार्यवाहियों को अंजाम देकर अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय दिया है। इसलिऐं मौजूदा सरकार से यह उम्मीद की जा सकती है कि वह स्थानीय समस्याओं, प्राकृतिक आपदाओं व जरूरतों से तालमेल बैठाते हुऐ ऐसा कार्यक्रम बनायेगी कि अगले पाँच वर्षों में आम आदमी सड़क यातायात एवं आपदा से बचाव के मामले में खुद को सुरक्षित महसूस कर सके। इसे वाकई में काबिलेतारीफ कहा जा सकता है कि सत्ता पक्ष के बड़े नेताओं व केन्द्रीय सत्ता पर काबिज मन्त्रियों ने राज्य में भाजपा की सरकार अस्तित्व में आते ही पहाड़ों पर सुगम यातायात के लिऐ रेल लाईन बिछाये जाने व आॅल वेदर रोड बनाये जाने की घोषणा की और अगर सरकारी घोषणाओं पर यकीन करें तो आॅल वेदर रोड को तैयार कर जनता की सेवा में प्रस्तुत करने की अधिकतम् अवधि भी पाँच साल ही रखी गयी है। उम्मीद की जानी चाहिएंे कि प्रदेश की वर्तमान भाजपा सरकार अगले पाँच सालों में राज्य सरकार के अन्र्तगत् आने वाली तमाम सड़कों को भी हर मौसम में यातायात के लिहाज से विश्वसनीय एवं दुघर्टनामुक्त बनाने की दिशा में काम करेगी और राज्य में समय-असमय होने वाली प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाली मानवीय क्षति को कम किया जा सकेगा।

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