पलायन पर एक चिन्तन – आयोग, मंत्रालय व समिति बनाने की ओर बढ़ रहे है सरकार के कदम। | Jokhim News

Sunday, July 23, 2017

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पलायन पर एक चिन्तन – आयोग, मंत्रालय व समिति बनाने की ओर बढ़ रहे है सरकार के कदम।

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार हो रहे पलायन पर चिन्तित दिखती राज्य सरकार ने अपने सौ दिन का कार्यकाल पूरा होने के अवसर पर इस विषय में जनता से सुझाव मांगने के अलावा इस मुद्दे पर आयोग गठित करने, समिति बनाने व अलग मंत्रालय का गठन करने जैसी तमाम घोषणाऐं की है और सरकार के अंदाजेबंया व विषय की अनिवार्यता को देखते हुऐ यह लग भी रहा है कि इस विषय को गंभीरता से लिया जाना जरूरी है। हांलाकि पहाड़ से रोजगार की तलाश में मैदानी इलाकों की ओर जाने और अपनी मेहनत, ईमानदारी व मिलन सार व्यवहार के चलते पूरी जीवटता के साथ जीवन के हर संघर्ष में खरे उतरने वाले पहाड़ियों ने जीवन के हर क्षेत्र में सफलता के झण्डे गाड़े है तथा उत्तराखंड राज्य आंदोलन के वक्त देश के लगभग सभी हिस्सों के अलावा विदेशों से भी आयी राज्य गठन के समर्थन की आवाज यह साबित करती है कि आजीविका के उद्देश्य से पहाड़ के सुरम्य जीवन को छोड़कर देश ही नही बल्कि विश्व के विभिन्न कोनो में बस जाने वाले उत्तराखण्डियों के दिल में पहाड़ को लेकर जज्बात अभी भी हिलोरे मारतें है लेकिन विभिन्न राजनैतिक कारणों व राज्य की राजनीति में स्थापित नेताओं के निजी राजनैतिक समीकरणों को देखते हुऐ राज्य गठन के तत्काल बाद से वर्तमान तक राज्य में मूलभूत सुविधाओं की स्थापना अथवा राज्य के विकास के मुद्दे पर राज्य में गठित तथाकथित रूप से लोकप्रिय सरकारों ने इन तमाम प्रवासी अथवा उत्तराखंड से पलायन कर चुके मूल निवासियों से इन विषयों पर कोई मंत्रणा करने अथवा मदद लेने की जरूरत ही महसूस नही की। लिहाजा उत्तराखंड राज्य के अस्तित्व में आने के तत्काल बाद से ही इस राज्य के गठन के उद्देश्य बदल गये और स्थानीय स्तर पर प्राकृतिक संसाधनो का उपयोग करते हुऐ राज्य को एक उन्नत व सर्वसाधन सम्पन्न प्रदेश बनाने का राज्य आन्दोलनकारियों का सपना धरा का धरा रह गया। बदले उद्देश्यों के साथ न सिर्फ सरकार की प्राथमिकताऐं बदली बल्कि नवगठित सरकारों ने अपनी रणनीति और रणनीतिकार दोनों ही बदल डाले। नतीजतन राज्य के प्राकृतिक संसाधनों के प्रति चिन्तित आन्दोलनकारी सौच गौण हो गयी और विकास की योजनाओं को अमलीजामा पहनाने का जिम्मा नौकरशाही को मिला। शुरूवाती दौर में सबकुछ ठीक-ठाक चला बल्कि अगर यह कहा जाये कि पहली बार सत्ता के शीर्ष को हासिल करने वाले नेताओं ने इसका पूरा आनन्द लिया और राज्य की नौकरशाही से गठजोड़ कर राज्य के संसाधनों में संेधमारी का खेल भी खूब हुआ लेकिन लगभग डेढ़-दो दशकों के इस छोटे अन्तराल में सुदूरवर्ती पहाड़ी क्षेत्रों व ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले पहाड़ी जनसमुदाय को यह महसूस होने लगा कि राज्य गठन के बाद से ही अस्तित्व में आने वाली सरकारें उनके साथ छल कर रही है। लिहाजा मेहनतकश पहाड़ी नौजवानों ने सिर्फ रोजगार के लिऐ पहाड़ से मैदान की ओर रूख करने के अलावा अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा व अपने परिजनों को जीवन की बेहतर सुविधाऐं देने के उद्देश्य से अपने परिवारों को भी पहाड़ से विस्थापित करना शुरू कर दिया लेकिन अपनी मातृभूमि से लगाव के चलते यह विस्थापन अधिकतम् रूप से राज्य की सीमाओं के भीतर ही सीमित रहा। इन पिछले पन्द्रह-सोलह सालों में पहाड़ी जनसमुदाय की बदली इस सोच के चलते राज्य के राजनैतिक समीकरण बहुत तेजी से बदले है और पलायन के चलते खाली हो गये गांव के गांव जहां एक ओर राज्य की सीमाओं को मानव विहीन करते हुऐ राज्य की राजनीति के स्थापित नेताओं को उनकी औकात की अहसास करा रहे है वहीं दूसरी ओर राज्य की अधिकतम् विधानसभा सीटो को रखने वाले राज्य के मैदानी इलाको में न सिर्फ जनसंख्या का दबाव तेजी से बढ़ा है बल्कि मैदानी इलाकों में जातिगत् समीकरणों के आधार पर राजनीति करने वाले स्थापित नेताओं के वजूद को भी खतरा बढ़ता जा रहा है। नेताओं को असल चिन्ता इसी बात की है और मौजूदा हालातों में पलायन को लेकर उनके द्वारा व्यक्त की जा रही चिन्ता का मुख्य कारण प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में तेजी से घट रही आबादी न होकर प्रदेश में तेजी से बदल रहे राजनैतिक समीकरण है। राजनीति में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करते हुये अपने निर्वाचन क्षेत्रों को विरासत की तर्ज पर अपनी अगली पीढ़ी को सौंपने की इच्छा रखने वाले राजनीति के स्थापित खिलाड़ी प्रदेश की विधानसभा में तेजी से बदलते दिख रहे चेहरों को देखकर हैरान व परेशान है तथा अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में तेजी से बदलते दिख रहे आबादी के समीकरणों ने उन्हें मजबूर करके रख दिया है कि वह राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में हो रहे पलायन पर सार्थक चिन्तन करते हुये इसे रोकने व सुुदूर पर्वतीय क्षेत्रों के जनसंख्या घनत्व को बढ़ाने की दिशा में विचार करें। हालातों के मद्देनजर सरकारों को चाहिऐं था कि वह जनहितकारी योजनाऐं बनाते वक्त पर्वतीय क्षेत्रों की विपरीत परिस्थिति, जलवायु व उपलब्ध संसाधनों का विशेष ध्यान रखती तथा विभिन्न योजनाओं व स्वंय सेवी संगठनों के सहयोग से प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में न्यूनतम् जरूरी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाती लेकिन सरकार इन तमाम विषयों पर कोई भी योजना बनाने की जगह पहाड़ से पलायन कर चुके इस प्रदेश के मूल निवासियों से यह अनुरोध व अपेक्षा कर रही है कि वह राज्य के मैदानी क्षेत्रों में किसी भी तरह का निवेश करने के स्थान पर अपने पहाड़ी गांव या क्षेत्र पर निवेश कर उसके विकास में सहयोग करें और राजनेताओं की राजनैतिक विरासत को बचाने के लिऐ पहाड़ों से पलायन कर चुके लोग अपने उपलब्ध संसाधनों के साथ पहाड़ों की ओर दौड़ लगा दें। कोई भी जनप्रतिनिधि, नेता या फिर राजनैतिक दल देश के किसी भी हिस्से में जाकर बसने या फिर वहाँ का मतदाता बनने से आम आदमी को नही रोक सकता और यहीं नेताओं की चिन्ता का मुख्य कारण है। शायद यहीं वजह है कि आज पहाड़ों पर हो रहे पलायन के मुद्दे पर काशीपुर के विधायक हरभजन सिंह चीमा, जसपुर के विधायक अरविंद पाण्डे या फिर हरिद्वार क्षेत्र के नेता मदन कौशिक ज्यादा चिन्तित है ओर उन्हें यह स्पष्ट तौर पर दिख रहा है कि पहाड़ों से पलायन करने वाली जनसंख्या का राज्य के मैदानी इलाकों पर बढ़़ता दबाव धीरे-धीरे कर उन्हें राजनैतिक बेदखली की ओर ले जा रहा है। हालांकि यह मानने के कई कारण है कि पहाड़ो पर बेतरजीब तरीके से हुआ पलायन हमारी संस्कृति, सभ्यता व संस्कारों को भी नुकसान पहुंचा रहा है और हम जाने-अनजाने में उन तमाम सांस्कृतिक धरोहरों व तीज-त्योहारों से दूर होते जा रहे है जो हमारी संस्कृति को जीवंत बनाते हुये हमे जुझारू व प्रकृति के प्रति समर्पित नागरिक सिद्ध करते थे लेकिन इस सबके बावजूद हम यह कह सकते है कि पहाड़ों में वर्तमान समय में हो रहा पलायन इस राज्य को एक बार फिर उत्तराखंड राज्य आन्दोलकारियों की भावनाओं के अनुरूप पहाड़ी राज्य बनाने की ओर अग्रसर है और यह माने के कई कारण है कि वर्तमान में पलायन के मुद्दे पर सक्रियता दिखाने की कोशिश कर रही सरकार की छटपटापट वास्तव में अपने अस्तित्व के लिऐ संघर्ष कर रहे कुछ नेताओं की छटपटाहट का एक हिस्सा है जिसमें पहाड़ के वजूद या फिर पहाड़ी समाज की सांस्कृतिक विरासत व बोली-भाषा को लेकर चिन्ता कतई नही झलकती।

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