नो विजन, विदआउट रीजन | Jokhim News

Thursday, September 21, 2017

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नो विजन, विदआउट रीजन

पूरे तामझाम के साथ जनता की अदालत में प्रस्तुत हुई त्रिवेन्द्र सिंह रावत सरकार उत्तराखंड सरकार द्वारा अपने शुरूवाती सौ दिन के कामकाज का लेखा जोखा जनता की अदालत में रखने के नाम पर जो शक्ति प्रदर्शन करने की कोशिश की गयी उसकी जरूरत आॅखिर क्यों पड़ी और किन मजबूरियों के चलते एक पूर्ण बहुमत की सरकार ने अपने स्थानीय विधायकों व आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में पार्षद या अन्य पदों के दावेदारों के जरियें परेड ग्राउण्ड में भीड़ जुटाकर यह साबित करना पड़ा कि जनलोकप्रिय व देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को राजनैतिक मजबूती प्रदान करने के नाम पर विधानसभा चुनाव जीते भाजपा के जनप्रतिनिधियों की लोकप्रियता अभी घटी नही है। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि उत्तराखंड की त्रिवेन्द्र सिंह रावत के नेतृत्व वाली वर्तमान सरकार के अस्तित्व में आते ही प्रदेश भर में शुरू हुऐ शराब विरोधी आन्दोलनों और अब एक के बाद एक कर सामने आते जा रहे किसानों की आत्महत्या के मामलों से सरकार कहीं न कहीं घबरायी हुई है तथा भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी यह महसूस कर रहा है कि चुनावी मौसम में कांग्रेस विरोधी माहौल या फिर मोदी की हवा के बलबूते आश्चर्यजनक जीत हासिल करने वाले भाजपा के विधायक कई मुद्दों पर जनता के सवालों का जवाब नही दे पा रहे। हालातों के मद्देनजर जनता के बीच बढ़ रहे आक्रोश को थामने तथा नाराज जनप्रतिनिधियों को जन आंकाक्षाओं के प्रति संवेदनशील होने का सबूत देने के लिऐ यह जरूरी था कि मौजूदा सरकार के मुखिया खुद जनता के बीच उपस्थित होकर अपने कामकाज के तौर-तरीके व आगामी योजनाओं के बारे में कुछ घोषणाऐं करते लेकिन मीडिया के तीखे प्रश्नों का सामना करने से घबराने वाले त्रिवेन्द्र सिंह रावत के लिऐ यह आसान नही था कि वह पत्रकारों व कैमरामैंनो की चुभती निगाहों के सामने खुद को सहज महसूस करते। इसलिऐं विपक्ष पर दबाव बनाने की नीयत से सत्तापक्ष ने सार्वजनिक मंच के माध्यम से अपनी बात कहने का निर्णय लिया और राजधानी देहरादून के इर्द-गिर्द वाले क्षेत्रों से कार्यकर्ताओं व जनता को एकत्र कर ऐसा माहौल बनाने का प्रयास किया गया कि मानो यह भीड़ स्वतः स्फूर्त हो लेकिन एक बड़े आयोजन और पूरे सरकारी तामझाम के बावजूद, प्रदेश की जनता पर इन सौ दिनों का कामकाज कोई विशेष प्रभाव छोड़ पाया हो, ऐसा नही लगता। यह ठीक है कि सरकार समाचार पत्रों समेत मीडिया के एक बड़े हिस्से की जुबान बंद करने में सफल रही और सरकार को पहले ही छह माह की मौहलत दे चुके प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकारी कामकाज के तौर-तरीकों पर बहुत ज्यादा मीन मेख निकालने की कोशिश नही की लेकिन चलते-फिरते वाहनों में बिकती शराब और पलायन के मुद्दे पर सरकार द्वारा की जा रही बिना वजह की नुराकुश्ती समेत तमाम अन्य विषयों पर सोशल मीडिया में चर्चाऐं आम रही तथा कल तक भाजपा के पक्ष में लामबंद युवाओं के एक बड़े हिस्से ने यह माना कि मौजूदा प्रदेश सरकार जनता की उम्मीदों पर खरी उतरने की कोशिश ही नही कर रहीं । हांलाकि सरकार के पास जनता के समक्ष अपनी वाहवाही करने के लिऐ उपलब्धियों का बड़ा पिटारा था और व्यापक जनहित में अनेक घोषणाऐं कर उसने जनता को रिझाने की पूरी कोशिश की लेकिन एक भव्य आयोजन के बावजूद सरकार जनता के बीच अपना पक्ष रख पाने में पूरी तरह असफल दिखाई दी और सरकार के प्रमुख मंत्रालयों पर काबिज कुछ तथाकथित रूप से ताकतवर मंत्रियों ने भी अपने स्तर पर यह संदेश देने की पूरी कोंशिश की, कि वह इस व्यर्थ के आयोजन से कतई संतुष्ट नही है। कहा नहीं जा सकता कि सरकार को इस तरह के बेफिजूल आयोजन में सरकारी धन लुटाने की सलाह किसने दी और किसके कहने पर त्रिवेन्द्र सिंह रावत राज्य के विकास में जनप्रतिनिधियों की सहभागिता बढ़ाने के नाम पर विधायक निधि बढ़ाने जैसे फैसले ले रहे है लेकिन सरकार द्वारा विधानसभा के पटल पर रखे गये बजट व शराब बिक्री के मुद्दे पर लगातार हो रही फजीहत के बावजूद इस मद से अधिकतम् राजस्व हासिल करने की जिद के चलते किसी भी कीमत पर शराब की दुकानें खुलवाने की जद्दोजहद करती सरकारी मशीनरी को देखकर साफ तौर पर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि त्रिवेन्द्र सिंह रावत के सलाहकार उनका राजनैतिक सिनेमा ठप करना चाहते है। पिछले सत्रह वर्षों में हमने अनुभव किया कि इस नवगठित राज्य में एक के बाद एक कर कई दिग्गज नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हो चुके है कि उत्तराखंड की राजनीति के यह तमाम दिग्गज जनता की नब्ज पहचानकर जन आंकाक्षाओं पर खरा उतरने के मामले में पूरी तरह असफल रहे है और शायद यही वजह भी है कि राज्य गठन के बाद सत्ता पर काबिज रहे दोनों ही राष्ट्रीय राजनैतिक दलों ने अपने पूर्व मुख्यमंत्रियों को पुनः सत्ता की कमान सौंपने का हौसला नही किया है। हालातों के मद्देनजर हमें त्रिवेन्द्र सिंह रावत भी उसी दिशा की ओर जाते दिखाई दे रहे है और अगर जनाक्रोश, मंत्रियों व विधायकों की नाराजी या फिर किन्हीं अन्य कारणों के चलतें उन्हें सरकार के मौजूदा कार्यकाल के बीच से ही सत्ता के शीर्ष से हटाया जाता है तो यह उनके राजनैतिक भविष्य के लिऐ बहुत बेहतर नही होगा क्योंकि अन्य पूर्व मुख्यमंत्रियों की तरह त्रिवेन्द्र सिंह रावत धारा के विरूद्ध संघर्ष करते हुऐ लड़ाई में बने रहने या फिर अपनी हैसियत के अनुसार आलाकमान से मुख्यमंत्री पद के अलावा कुछ और झटक लेेने की काबिलियत नही रखते। इसलिऐं त्रिवेन्द्र सिंह रावत सरकार को चाहिऐं कि वह बेवजह की घोषणाओं व दिखावे की राजनीति से बचते हुऐ मुद्दों और जनता की जरूरतों को समझते हुऐ फैसले ले तथा राजकाज के मामले में पारदर्शिता लाते हुऐ कुछ ऐसे प्रयास किये जाये जिनसे बेरोजगारों, नौजवानों, छात्रों व महिलाओं तक यह संदेश जाये कि सरकार वाकई में व्यापक जनहित को लेकर चिन्तित है लेकिन अफसोसजनक है कि सरकार पूरी तरह से नौकरशाही के इशारें पर काम कर रही है और पिछले सत्रह वर्षों से राज्य का बेड़ा गर्क करने में लगी सरकारी कारकूनों की एक फौज आज भी शासन तंत्र के फैसलों पर हावी दिख रही है। हो सकता है कि हमारा यह अंदाजा गलत हो और पलायन जैसे मुद्दे पर जनता के विचार आमंत्रित करने के साथ ही साथ इस ज्वलंत विषय पर अलग मंत्रालय, समिति या फिर आयोग आदि के गठन की घोषणा करने वाली सरकार अन्ततोगत्वा किसी निष्कर्ष तक पहुंचकर कुछ क्रान्तिकारी उपाय जनता की अदालत में रखने व वाहवाही लूटने में सफल हो जाय लेकिन सवाल यह भी है कि क्या इन आयोगो, मंत्रालयों अथवा समितियों के फैसले आने तक सुदूरवर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में रह रही जनता दिन-ब-दिन कठिन होते जा रहे जीवन संघर्ष से टकराते हुऐ अपनी थाती को बचा कर रख पाने की हिम्मत जुटाकर रख पायेगी या नही?

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